सम्पर्क विधि द्वारा सल्फ्यूरिक अम्ल का औद्योगिक निर्माण
सिद्धान्त-शुद्ध तथा शुष्क `SO_2` तथा वायु का मिश्रण उचित उत्प्रेरक की उपस्थिति में संयोग करके सल्फर डाइऑक्साइड बनाता है। `SO_2` सान्द्र `H_2SO_4` में अवशोषित होने पर ओलियम में परिवर्तित हो जाती है। यह जल से संयोग करके सल्फ्यूरिक अम्ल बनाती है।
`2So_2 + O_2 iff 2SO_3 + 45.2` किलोकैलोरी
`SO_3 + H_2SO_4 to H_2S_2O_7`
`H_2S_2O_7 + H_2O to 2H_2SO_4`
उत्प्रेरक-इस अभिक्रिया में तप्त प्लैटिनीकृत ऐस्बेस्टॉस, प्लैटिनीकृत मैग्नीशियम सल्फेट या बैनेडियम पेन्टाऑक्साइड `(V_2O_5)` उत्प्रेरक के रूप में काम में लाए जाते हैं। आजकल `V_2O_5` एक उत्तम उत्प्रेरक के रूप में प्रयुक्त होता है। अधिकतम `SO_2` प्राप्ति के लिए अनुकूल दशाएँ-(1) `SO_2` तथा वायु का मिश्रण शुद्ध व शुष्क होना चाहिए, अन्यथा उत्प्रेरक धूल के कण तथा Assoया Asus के कारण निष्क्रिय हो जाता है। (2) `O_2` की मात्रा अधिक होनी चाहिए ताकि `SO_2` पूर्णरूपं से `SO_3` में बदल जाए। (3) क्योंकि यह अभिक्रिया ऊष्माक्षेपी है, इसलिए उत्प्रेरक का ताप कम-से-कम `(450-500^@C)` रखना चाहिए। (4) क्योंकि अभिक्रिया के पश्चात् आयतन में कमी आती है, इसलिए गैसों का दाब अधिक-से-अधिक होना चाहिए।
प्रक्रम-इस प्रक्रम में उपकरण के विभिन्न भागों में होने वाली प्रमुख क्रियाएँ निम्नलिखित हैं-
(1) पाइराइट बर्नर-इसमें गन्धक या आयरन पाइराइट को वायु में जलाकर सल्फर डाइऑक्साइड बनाई जाती है। (2) धूल कक्ष-धूल कक्ष में प्रवेश करने वाले गैसीय मिश्रण में `SO_2` एवं `O_2` के अतिरिक्त गन्धक, धूल के कण, आसीनियस ऑक्साइड की अशुद्धियाँ होती हैं। इस कक्ष में ऊपर से.भाप भेजी जाती है। भाप धूल के कणों पर जम जाती है तथा धूल के कण- भारी होकर नीचे बैठ जाते हैं। (3) शीतलक पाइप-ये लेड़ के बने पाइप होते हैं। इनमें से गैसीय मिश्रण को प्रवाहित करने पर यह `100^@C` तक ठण्डा हो जाता है। (4)धावन कक्ष-ठण्डे गैसीय मिश्रण को ऊपर से गिरती हुई पानी की बौछार से धोया जाता प्लैटिनीकृत ऐस्बेस्टॉस है। यहाँ पर धूल के कण और जल में विलेय अशुद्धियाँ दूर हो जाती हैं। यहाँ से गैस को शुष्कन कक्ष में भेजा जाता है। (5) शुष्कन कक्ष-इसमें ऊपर से सान्द्र `H_2 SO_4` गिराया जाता है, जो ऊपर उठते हुए नम गैसीय मिश्रण को सुखा देता है। (6) आर्सेनिक शुद्धिकारक कक्ष-इस कक्ष में आर्द्र `Fe (OH)_3` रखा होता है। जब शुष्क एवं शुद्ध गैसीय मिश्रण शोधक में प्रवेश करता है तो Fe(OH), उसमें उपस्थित आर्सेनिक की अशुद्धियों को अवशोषित कर लेता है। (7) परीक्षण बॉक्स-इस बॉक्स में आर-पार तीव्र प्रकाश की किरणें भेजी जाती हैं, जिससे गैसीय मिश्रण में उपस्थित धूल के कण चमकने लगते हैं। पारदर्शक दिखाई देने वाला गैसीय मिश्रण धूल से पूर्णतया मुक्त होता है (8) सम्पर्क कक्ष-इस कक्ष में लोहे की नलियों में प्लैटिनीकृत ऐस्बेस्टॉस या `V_2O_5` उत्प्रेरक भरा होता है। इसका ताप `450-500^@C` रखा जाता है, जब शुष्क व शुद्ध `SO_2` और वायु का मिश्रण उत्प्रेरक की नलियों में प्रवेश करता है तो `SO_2` ऑक्सीकृत होकर `SO_3` बनाती है।
`2SO_2 + O_2 iff 2SO_3`
(9) अवशोषक स्तम्भ-सम्पर्क कक्ष में बनी `SO_3` को अवशोषक स्तम्भ में भेजा जाता है, जिसमें क्वार्ट्स के टुकड़े भरे होते हैं। यहाँ 97-98% सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल प्राप्त होता है। `SO_3` के अवशोषण से सान्द्र `H_2SO_4` सधूम सल्फ्यूरिक अम्ल में परिवर्तित हो जाता है, जिसे ओलियम (oleum) कहते हैं।
`H_2SO_4 + SO_2 toH_2S_2O_7`
ओलियम में आवश्यक मात्रा में पानी मिलाकर सान्द्र अम्ल प्राप्त किया जाता है।
`H_2S_2O_7 +H_2O to 2H_2SO_4`