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Class 14
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मै साहित्य को मनुष्य की दृष्‍टि से देखने...

मै साहित्य को मनुष्य की दृष्‍टि से देखने का पक्षपाती हूं। जो बाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखपेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्वीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को पर दुख कातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है। मैं अनुभव करता हूं कि हमलोग एक कठिन समय के भीतर से गुजर रहे है। आज नाना भांति के संकीर्ण स्वार्थी ने मनुष्य को कुछ ऐसा अन्धा बना दिया है कि जाति धर्म निर्विशेष मनुष्य के हित की बाल सोचना असंभव सा हो गया है। ऐसा लगा रहा है कि किसी विकट दुर्भाग्य के इंगित पर दलगत स्वार्थ के प्रेत ने मनुष्यता को दबोच लिया है। दुनिया छोटे छोटे संकीर्ण स्वार्थी के आधार पर अनेक दलों में विभक्त हो गई हैं अपने दल के बाहर का आदमी सन्देह की दृष्‍टि से देखा जाता है। उसके तप और सत्यनिष्ठा का मजाक उड़ाया जाता है। उसके प्रत्येक त्याग और बलिदान के कार्य में भी चाल का संधान पाया जाता है।
जाति धर्म निर्विशेष मनुष्य की पहचान क्या है?

A

जाति की सीमा में बद्ध, परंतु धर्म की सीमा से मुक्त

B

धर्म की सीमा में बद्ध, परंतु जाति की सीमा से मुक्त

C

जाति और धर्म की सीमा में बद्ध

D

जाति और धर्म की सीमा से मुक्त

लिखित उत्तर

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