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राष्ट्रीय भावना के अभ्युदय एवं विकास के ...

राष्ट्रीय भावना के अभ्युदय एवं विकास के लिए भाषा भी एक प्रमुख तत्व है। मानव समुदाय अपनी संवदेनाओं, भावनाओं एवं विचारों की अभिव्यक्ति हेतु भाषा का साधन अपरिहार्यतः अपनाता है। इसके अलावा उसके पास कोई अन्य विकल्प नहीं है। दिव्य-ईश्वरीय आनन्दानुभूति के संबंध में भले ही कबीर ने 'गूंगे कैरी शर्करा उक्ति का प्रयोग किया था, पर इससे उनका लक्ष्य शब्द रूपा के महत्व को नकारना नहीं था। प्रत्युक्त उन्होंने भाषा को 'बहता नीर' कहकर भाषा की गरिमा प्रतिपादित की थी। विद्वानों की मान्यता है कि भाषा तत्व राष्ट्र के हित के लिए अत्यावश्यक है। जिस प्रकार किसी एक राष्ट्र के भू-भाग की भौगोलिक विविधताएं तथा उसके पर्वत, सागर, सरिताओं आदि की बाधाएं उस राष्ट्र के निवासियों के परस्पर मिलने-जुलने में अवरोध सिद्ध हो सकती है, उसी प्रकार भाषागत विभिन्नता से भी उनके पारस्परिक संबंधों में निर्बाधता नहीं रह पाती। आधुनिक विज्ञान युग में यातायात एवं संचार के साधनों की प्रगति से भौगोलिक बाधाएं अब पहले की तरह बाधित नहीं करतीं। इसी प्रकार यदि राष्ट्र की एक संपर्क भाषा का विकास हो जाए तो पारस्परिक संबंधों के गतिरोध काफी सीमा तक समाप्त हो सकते हैं।
'गूंगे केरी शर्करा से कबीर का अभिप्रेत है कि ब्रह्मानंद की अनुभूति है

A

अत्यंत मधुर होती है।

B

अभिव्यक्ति के लिए कसमसाती है।

C

अनिर्वचनीय होती है।

D

मौनव्रत से प्राप्त होती है।

लिखित उत्तर

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