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BIOLOGY
पीयूष ग्रन्थि द्वारा स्त्रावित होने वाले...

पीयूष ग्रन्थि द्वारा स्त्रावित होने वाले विभिन्न हॉर्मोन्स के नाम तथा कार्यों का वर्णन कीजिए।

लिखित उत्तर

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पीयूष ग्रन्थि
(Pituitary Gland)
यह ग्रन्थि अग्रमस्तिष्क के पश्च अधर तल पर ऑप्टिक कियाज्मा (optie chiasma) के ठीक पीछे एक वृन्त की सहायता से स्फीनॉइड अस्थि (sphenoid bone) के गर्त सेला टर्सिका (sella turcica) में स्थित होती है। इस ग्रन्थि द्वारा उत्पन्न अधिकांश हॉर्मोन्स अन्य अन्तःस्रावी ग्रन्थियों के स्रावण को नियन्त्रित करते हैं। अत: इसे मास्टर ग्रन्थि (mastergland) कहते हैं। मनुष्य की पीयूष ग्रन्थि के मध्य पिण्ड के अविकसित होने के कारण इसके दो मुख्य भाग होते हैं
I. अग्र पिण्ड (Anterior lobe or Adenohypophysis) तथा
II. पश्च पिण्ड (Posterior lobe or Neurohypophysis)
1. अग्र पिण्ड तथा उससे उत्पन्न होने वाले हॉर्मोन्स (Adenohypophysis and its Hormones) यह पीयूष ग्रन्थि का लगभग 75% भाग बनाता है। इसको पुनः दो भागों में बाँट सकते हैं--पार्स डिस्टेलिस तथा पार्स इण्टरमीडिया -
1. अग्रपिण्ड के पार्स डिस्टेलिस (pars distalis) से निम्नलिखित हॉर्मोन्स या नियन्त्रक तत्त्व (regulatory factors) का स्रावण होता है -

(i) सोमैटोट्रॉफिक या वृद्धि हॉर्मोन (Somatotrophic or Growth Hormone : STH or GH)-शरीर की उचित वृद्धि के लिए यह हॉमोन आवश्यक है। यह एक प्रोटीन हॉर्मोन है, जो 191 ऐमीनो अम्लों.की श्रृंखला से बना होता है। यह प्रोटीन संश्लेषण को बढ़ावा देता है और ऊतकों (tissues) के क्षय (breakdown) को रोकता है। यह हड्डियों तथा पेशियों की वृद्धि के रासायनिक समन्वय तथा एकीकरण लिए आवश्यक होता है। 18 वर्ष की आयु से पूर्व इसके अतिस्त्रावण से शरीर आनुपातिक रूप से भीमकाय (giant) हो जाता है तथा इसके अल्पस्त्रावण से बौना (dwarf or midget) रह जाता है। ये बौने मानसिक रूप से विकसित परन्तु नपुंसक (sterile) होते हैं। इस लक्षण को एटिओलिसिस (ateolisis) भी कहते हैं। सक्रिय वृद्धिकाल के बाद (18वर्ष के बाद) इसकी उचित मात्रा शरीर के उचित तथा नियमित चलते रहने (कमजोरी न होने देने) में सहायक है। वृद्धि पूर्ण होने के पश्चात् वृद्धि हॉर्मोन के अतिस्त्रावण से शरीर बेडौल, भीमकाय तथा कुरूप हो जाता है (इस उम्र में हड्डियों की लम्बाई में वृद्धि सम्भव नहीं है, हड्डियों की मोटाई बढ़ जाती है)। इस रोग को अग्रातिकायता (acromegaly) कहते हैं। कभी-कभी कशेरुक दण्ड के झुक जाने से कुबड़ापन (hunchback) भी हो जाता है। प्रौढ़ावस्था में हॉर्मोन के अल्पस्त्रावण से व्यक्ति जल्द ही वृद्ध हो जाता है। इस रोग को साइमन्ड (Simimond.s) रोग कहते हैं।
(ii) जनन ग्रन्थि प्रेरक हॉर्मोन (Gonadotropic Hormorie : GTH)-ये जनन ग्रन्थि तथा इससे सम्बन्धित अंगों की क्रियाशीलता को प्रभावित करते हैं। ये लैंगिक परिपक्वता के लिए आवश्यक होते हैं।
(a) पुटिका प्रेरक हॉर्मोन (Follicle Stimulating Hormone : FSH)—यह एक ग्लाइकोप्रोटीन है। पुरुषों में शुक्रजनन नलिकाओं (seminiferous tubules) में शुक्रजनन (spermatogenesis) तथा स्त्रियों में ग्राफियन पुटिकाओं (Graafian follicles) की वृद्धि, अण्डजनन (oogenesis) तथा एस्ट्रोजेन्स (estrogens) के लावण को प्रेरित करता है।
(b) ल्यूटीनाइजिंग हॉर्मोन (Luteinizing Hormone: LH) - यह अण्डाशय में पुटिका के फटने के बाद बने पीत पिण्ड (corpus luteum) की क्रिया पर नियन्त्रण रखता है। पुरुषों में, यह हॉर्मोन वृषणों में अन्तराली या लेडिग कोशिकाओं (interstitial cells or cells of Leydig) को हॉर्मोन स्रावण के लिए प्रेरित करता है। यह स्त्रियों में एस्ट्रोजन (estrogen) तथा पुरुषों में एण्ड्रोजन (androgen) के सावण को नियन्त्रित करता है। ये हॉर्मोन्स जनदों की क्रियाशीलता को नियन्त्रित करते हैं। यह हॉर्मोन 11-12 वर्ष की उम्र के बाद ही बनना प्रारम्भ होता है।
(c) प्रोलैक्टिन या मैमोट्रॉपिक हॉर्मोन (Prolactin or mammotropic Hormone : PLH or MTH)-यह गर्भकाल में स्तनों की वृद्धि तथा दुग्ध लावण को प्रेरित करता है। यह 198 ऐमीनो अम्लों से बना पॉलीपेप्टाइड हॉर्मोन है।
(iii) थायरोट्रॉपिन या थायरॉइड प्रेरक हॉर्मोन (Thyrotropin or Thyroid Stimulating Hormone : TSH)-थाइरॉइड ग्रन्थि (thyroid gland) को क्रियाशील बनाए रखता है, ताकि उचित मात्रा में थायरॉक्सिन (thyroxin) हॉर्मोन स्रावित होता रहे। यह एक ग्लाइकोप्रोटीन हॉर्मोन है।
(iv) एडीनोकॉर्टिकोट्रॉपिन (Adrenocorticotropin or Adrenocorticotropic Hormones : ACTH)—यह अधिवृक्क ग्रन्थियों (adrenal glands) के वल्कुट भाग (cortical part) के स्राव को प्रभावित करता है। यह पॉलिपेप्टाइड हॉर्मोन है। इसकी कमी से अधिवृक्क ग्रन्थि की वृद्धि प्रभावित होती है।
2. पार्स इण्टरमीडिया (pars intermedia) से मिलैनोसाइट प्रेरक हॉर्मोन (MSH) सावित होता है। यह रंगा कोशिकाओं (melanophores) में मिलैनिन (melanin) रंगा वर्णकों को फैलाकर त्वचा को रंग प्रदान करने का कार्य करता है। यह 13 ऐमीनो अम्ल से बना एक पॉलिपेप्टाइड हॉर्मोन होता है। मनुष्य में यह हॉर्मोन त्वचा में चकत्ते पड़ने तथा तिल बनने को प्रेरित . करता है।
II. पश्च पिण्ड तथा इससे उत्पन्न होने वाले हॉर्मोन्स
(Neurohypophysis and Its Hormones)
यह हॉर्मोन्स का संश्लेषण नहीं करता। यह हाइपोथैलेमस में बने दो प्रमुखं हॉर्मोन्स को एकत्र करके उनका स्रावण करता है। ये दो हॉर्मोन्स निम्नलिखित हैं -
1. वैसोप्रेसिन या प्रतिमूत्रक हॉर्मोन या पिट्रैसिन.(Vasopressin or Antidiuretic Hormone : ADH) - यह हॉर्मोन, वृक्क नलिकाओं (uriniferous tubules) के दूरस्थ पिण्ड (distal lobe) तथा संग्रह नलिकाओं (Collecting tubules) को जल अवशोषण क्षमता को बढ़ाता है। इस कारण इसे मूत्ररोधी हॉर्मोन (antidiuretic hormone) कहते हैं। यह एक पॉलिपेप्टाइड हॉमोंन है। ADH की कमी से मूत्र की मात्रा बढ़ जाती है। यह रोग उदकमेह (diabetes insipidus) कहलाता है। ADH की अधिकता से मूत्र गाढ़ा तथा रुधिर पतला हो जाता है। इसके फलस्वरूप उच्च रक्तदाब (high blood pressure) हो जाता है ।
2. ऑक्सिटोसिन या पिटोसिन (Oxytocin or Pitoein)-बच्चे के जन्म से पूर्व गर्भाशय.की पेशियों को संकुचन के लिए प्रेरित कर प्रसव पीड़ा उत्पन्न करता है। बाद में गर्भाशय को सामान्य अवस्था में लाने में सहायक है। दुग्ध स्रावण (lactation) को प्रेरित करता है। यह एक पॉलिपेप्टाइड हॉर्मोन है।
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