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BIOLOGY
मानव में होने वाले यौन संचारित रोगों का ...

मानव में होने वाले यौन संचारित रोगों का वर्णन कीजिए।

लिखित उत्तर

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अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ
(Endocrine Glands)
कशेरुकी जन्तुओं में शरीर की विभिन्न क्रियाओं का नियन्त्रण-नियमन, तन्त्रिका तन्त्र (nervous system) के अतिरिक्त अन्तःस्रावी तन्त्र द्वारा होता है। अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से हॉर्मोन्स स्रावित होते हैं। ये अपने स्राव को रुधिर परिसंचरण में छोड़ देती हैं।
एड्रीनल ग्रन्थि की संरचना तथा कार्य
(Structure and Functions of Adrenal Gland)
वृक्कों के ऊपरी भाग से लगी टोपी सदृश, रचना होती है, जिसे अधिवृक्क ग्रन्थि (adrenal gland) कहते हैं। प्रत्येक ग्रन्थि का भार लगभग 4-6 ग्राम होता है। प्रत्येक प्रन्थि के दो भाग होते हैं-बाहरी भाग वल्कुट या कॉर्टेक्स (cortex) तथा भीतरी भाग मध्यांश या मेडुला (medulla) कहलाता है।

अधिवृक्क वल्कुट की उत्पत्ति भ्रूण के मीसोडर्म से होती है। यह ग्रन्थि का लगभग 80-90% भाग बनाता है। वल्कुटीय भाग कोलेस्ट्रॉल का उपयोग करके लगभग 50 हॉर्मोन्स का संश्लेषण करता है। इनमें से 7-8 हॉर्मोन्स सक्रिय रूप से विभिन्न क्रियाओं को नियन्त्रित करते हैं। ये हॉर्मोन्स स्टेरॉयड प्रकृति के होते हैं। अधिवृक्क वल्कुट से स्रावित हॉर्मोन्स को निम्नलिखित तीन समूहों में बाँटते हैं
1. ग्लूकोकॉर्टिकोस्टेरॉयड्स (Glucocorticosteroids)-यह स्टेरॉयड हॉर्मोन्स का समूह है जिसमें कॉर्टिसोल (cortisol) तथा कॉर्टिकोस्टेरॉन (corticosterone) मुख्य हैं। ग्लूकोकॉर्टिकोएड के निम्नलिखित कार्य हैं
(i) शरीर में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा वसा उपापचय का नियन्त्रण करना।
(ii) रुधिर में ग्लूकोस, वसा अम्ल तथा ऐमीनो अम्लों की मात्रा को बढ़ाना।
(iii) ग्लूकोकॉर्टिकोस्टेरॉयड्स प्रदाह क्रियाओं (inflammation reactions) को रोकते हैं, अर्थात् प्रदाह विरोधी (anti-inflammatory) की तरह कार्य करते हैं। ये दर्द एवं सूजन को कम करते हैं।
(iv) ग्लूकोकॉर्टिकोस्टेरॉयड्स प्रतिरक्षी तन्त्र पर भी निषेधात्मक प्रभाव (suppressive effect) डालते हैं। ये प्रतिरक्षी प्रतिक्रियाओं को रोकते हैं। अत: अंगों के प्रत्यारोपण, एलर्जी तथा गठिया रोग उपचार में इनका प्रयोग किया जाता है।
(v) ये हॉर्मोन्स रुधिर में लाल रुधिराणुओं की संख्या को बढ़ाते हैं और श्वेत रुधिरांणुओं की संख्या को कम करते हैं।
(vi) ये कोलेजन तन्तुओं के निर्माण को कम करते हैं।
(viii) ये शरीर में पानी एवं इलेक्ट्रोलाइट्स के वितरण को नियन्त्रित करते हैं और जल एवं लवण सन्तुलन को बनाए रखते हैं।
2. मिनरलोकॉर्टिकोस्टेरॉयड्स (Mineralocorticosteroids)—यह स्टेरॉयड हॉर्मोन्स का समूह है जिनमें ऐल्डोस्टेरॉन (aldosterone) तथा डिऑक्सीकॉर्टिकोस्टेरॉन (deoxycorticosterone) मुख्य हैं। इनको लवण प्रतिधारक (salt Fetaining) हॉर्मोन भी कहते हैं। इन हॉर्मोन्स के निम्नलिखित कार्य हैं
(i) ये रुधिर में खनिज आयनों जैसे सोडियम, पोटैशियम, क्लोराइड आदि की मात्रा का नियन्त्रण करते हैं।
(ii) ये वृक्क में सोडियम तथा क्लोराइड आयनों का पुनरावशोषण बढ़ाते हैं।
(iii) ये मूत्र में पोटैशियम की मात्रा को बढ़ाते हैं।
3. एड्रीनल लिंग हॉर्मोन्स (Adrenal Sex Hormones)-अधिवृक्क का वल्कुट भाग कुछ मात्रा में नर व मादा लिंग हॉर्मोन्स (एस्ट्रोजेन एवं एन्ड्रोजेन) भी स्रावित करता है। इन हॉर्मोन्स का सावण स्त्री व पुरुष दोनों में ही होता है। ये हॉमोन्स यौन व्यवहार तथा बाह्य .जनन अंगों के विकास को प्रभावित करते हैं।
(i) एन्ड्रोजेन (Androgens)-ये नर लिंग हॉर्मोन्स हैं। सूक्ष्म मात्रा में ये स्त्रियों में पेशियों के विकास में सहायता करते हैं।
(ii) एस्ट्रोजेन (Estrogen)-यह मादा लिंग हॉर्मोन है। मादा में जनन अंगों के विकास में सहायक है। सूक्ष्म मात्रा में पुरुष में वसा संश्लेषण में सहायक होता है।
अधिवृक्क मज्जा के हॉर्मोन्स
(Hormones of Adrenal Medulla)
यह अधिवृक्क ग्रन्थि का लगभग 10% भाग बनाता है। इसकी उत्पत्ति भ्रूण के एक्टोडर्म से होती है। यह भाग वास्तव में अनुकम्पी तन्त्रिका तन्त्र का विस्तार होता है। इससे दो प्रमुख हॉर्मोन्स स्रावित होते हैं ये ऐमीनो अम्ल टाइरोसिन के व्युत्पन्न होते हैं
1. एड्रीनेलीन या एपिनेफ्रीन (Adrenaline or Epinephrine) - यह मज्जा भाग का मुख्य हॉर्मोन है। यह हॉमोन शरीर को संकटकालीन परिस्थितियों का सामना करने के लिए तैयार करता है। अत: इसे संकटकालीन हॉर्मोन या 3F (Fight, Flight, Fright) हॉर्मोन भी कहते हैं।
कार्य (Functions)-इसके निम्नलिखित कार्य हैं (1) यह हृदय स्पंदन दर तथा रुधिर दाब को बढ़ाता है।
(2) यह श्वसन की दर तथा आधारीय उपापचय दर (B.M.R.) को बढ़ाता है।
(3) यह श्वास नली की पेशियों में शिथिलन (dilation) करके श्वसन को सुगम बनाता है।
(4) यह नेत्र की पुतलियों को फैलाता है।
(5) यह त्वचा में रोंगटे खड़े (goose flesh) कर देता है।
(6) इससे रक्त का थक्का बनने का समय घट जाता है।
(7) इससे यह रक्त में पोषक पदार्थों की मात्रा को बढ़ाता है।
2. नॉरएड्रीनलीन या नॉरएपिनेफ्रीन (Naradrenaline or Norepinephrine)-नॉरएड्रीनेलीन भी रुधिर दाब बढ़ाता है, किन्तु यह रुधिर दाब परिधीय रुधिर वाहिनियों में संकुचन के कारण बढ़ाता है। रुधिर वाहिनियों को संकुचित करके रक्त प्रवाह तथा मात्रा दोनों को घटाकर शरीर में सामान्य परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है।
एड्रीनल ग्रन्थि के वल्कुट से हॉर्मोन्स के अल्पस्रावण से निम्नलिखित रोग होते हैं-.
1. एडीसन रोग (Addison.s Disease)-ग्लूकोकॉर्टिकोस्टेरॉयड्स के अल्पसाव से निर्जलीकरण के कारण रुधिर दाब घट जाता है। सोडियम एवं जल का उत्सर्जन अधिक हो जाता है। मिलैनिन वर्णक की अधिकता से त्वचा कॉस्य वर्ण की हो जाती है। पेशियाँ शिथिल हो जाती हैं।
2. हाइपोग्लाइसीमिया (Hypoglycemia) ग्लूकोकॉर्टिकोस्टेरॉयड्स की कमी से रुधिर में ग्लूकोस की मात्रा कम हो जाती है। पेशियाँ, मस्तिष्क, यकृत आदि की क्रियाएँ शिथिल हो जाती हैं। उपापचय दर कम हो जाती है, शरीर का ताप कम हो जाता है।
3. कॉन्स रोग (Conn.s Disease)-मिनरलोकॉर्टिकोस्टेरॉयड्स (mineralocorticosteroids) की कमी से सोडियम व पोटैशियम सन्तुलन बिगड़ जाता है। तन्त्रिका नियन्त्रण बिगड़ जाता है। पेशियों में अकड़न आ जाती है और मनुष्य की मृत्यु हो जाती है।
एड्रीनल वल्कुट से हॉर्मोन्स के अतिस्रावण से निम्नलिखित रोग हो जाते हैं
1. कुशिंग रोग (Cushing.s Disease) यह रोग ग्लूकोकॉर्टिकोस्टेरॉयड्स तथा मिनरलोकॉर्टिकोस्टेरॉयड्स को अधिकता से होता है। इसके फलस्वरूप वक्ष भाग में बसा का असामान्य जमाव हो जाता है। ओस्टियोपोरोसिस (osteoporosis) होने लगती है। प्रोटीन अपचयन (protein catabollism) बढ़ जाता है। पेशियाँ शिथिल हो जाती है। शरीर में जल तथा सोडियम का जमाव अधिक हो जाता है। रुधिर दाब बढ़ जाता है। स्त्रियों के चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ उग आती है। इस रोग को कुशिंग सिण्ड्रोम कहते हैं।
2. एड्रीनल विरिलिज्म (Adrenal Virilism)-नर लिंग हॉर्मोन का अधिक स्राव होने से स्त्रियों में पुरुषोचित लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं जैसे-आवाज भारी हो जाना, चहरे पर दाढ़ी-मूंछ का उग आना आदि। इसे एड्रीनोलैंगिक सिण्ड्रोम या एड्रीनल विरिलिज्म कहते हैं। लड़कों में बाल्यावस्था में नर लिंग हॉर्मोन्स की अधिकता से समय से पूर्व लैंगिक परिपक्वन हो जाता है।
3. हाइपरग्लाइसीमिया (Hyperglycemia)-एड्रीनल हॉमोंन को अधिकता से रुधिर में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है। , इससे मधुमेह हो सकता है।
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