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BIOLOGY
थायरॉइड ग्रन्थि से स्नावित होने वाले हॉर...

थायरॉइड ग्रन्थि से स्नावित होने वाले हॉर्मोनों के नाम लिखिये।

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अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ
(Endocrine Glands)
मानव शरीर में पायी जाने वाली प्रमुख अन्तःस्रावी ग्रन्थियाँ निम्नलिखित हैं -
(i) थायरॉइड ग्रन्थि, (ii) पीयूष ग्रन्थि, (iii) अधिवृक्क ग्रन्थि, (iv) पैराथायरॉइड ग्रन्थि, (v) थाइमस ग्रन्थि, (vi) लैंगरहैन्स की द्वीपिकाएँ।
I. थायरॉइड ग्रन्थि (Thyroid Gland)
यह स्वर यन्त्र के पार्श्व-अघर तल पर स्थित द्विपालिक (bilobed) ग्रन्थि है। ग्रन्थि की दोनों पालियाँ इस्थमस (isthmus) नामक पट्टी द्वारा जुड़ी होती है। ग्रन्थि का भार लगभग 25-30 ग्राम MAHAR होता है। इसकी रचना अनेक छोटे-छोटे पिण्डकों (lobules) से होती है, जो परस्परं संयोजी ऊतक द्वारा बँधे रहते हैं। प्रत्येक पिण्डक में पारदर्शी तथा कोलॉइडी (colloidal) तरल थायरोग्लोबुलिन (thyroglobulin) भरा रहता है। थायरॉइड ग्रन्थि में हॉमोन निष्क्रिय अवस्था में संगृहीत रहते हैं। थायरोग्लोबुलिन में पाए जाने वाले टायरोसीन (tyrosine) ऐमीनो अम्ल के साथ मिलकर आयोडीन ।

(i) ट्राइआयोडोथायरोनीन (triiodothyronine, `T_3` )
(ii) थायरॉक्सिन या टेट्राआयोडोथायरोनीन (thyroxin or tetraiodothyronine) तथा
(iii) थायरोकैल्सिटोनिन (thyrocalcitonin)|
थायरॉइड ग्रन्थि के स्रावण में मुख्य रूप से थायरॉक्सिन (thyroxin) होता है। यह हॉर्मोन्स शरीर की उपापचयी (metabolic) क्रियाओं का नियमन तथा नियन्त्रण करता है। इस हॉर्मोन्स के मुख्य कार्य निम्नलिखित हैं
(1) यह शरीर में आधारीय उपापचय दर (basal metabollic rate-BMR) बढ़ाता है।
(2) यह शरीर में कोशिका विभेदन (cell differentiation) के लिए आवश्यक है।
(3) यह शरीर में ग्लूकोस की खपत बढ़ाता है।
(4) यह हृदय स्पंदन की दर को बढ़ाता है तथा प्रोटीन संश्लेषण दर में वृद्धि करता है।
(5) यह उभयचरों में परिवर्द्धन के समयं भेकशिशु में कायान्तरण (metemorphosis) को प्रेरित करता है। इसके अभाव में भेकशिश में कायान्तरण नहीं होता। ये लार्वा अवस्था में ही जनन करने लगते हैं। ऐसे लार्वा को एक्सोलोटल लार्वा (axoloti larva) कहते हैं।
(6) थायरोकैल्सिटोनिन पैराथॉमोंन की भाँति कैल्सियम तथा फॉस्फोरस उपापचय को नियन्त्रित करता है। इन हॉर्मोन्स को कमी (अल्प स्त्रावण) से निम्नलिखित रोग हो जाते हैं
1. जड़वामनता या क्रिटिनिज्म (Cretinism)-बाल्यावस्था में इन हॉर्मोन्स की कमी से शरीर की उपापचयी क्रियाएँ मन्द पड़ जाती हैं, शरीर कमजोर होने लगता है, हदयं-गति मन्द हो जाती है, मानसिक सुस्ती बढ़ती है, त्वचा मोटी तथा झुरौंदार हो जाती है। पेट निकल आता है, व्यक्ति का शारीरिक तथा मानसिक विकास भली-भाँति नहीं हो पाता तथा जननांग अल्पविकसित होते हैं। ऐसे बच्चे अल्पबुद्धि वाले बौने (dwarf) होते हैं। इस रोग को जड़वामनता (eretinism) कहते हैं।
2. मिक्सिडीमा (Myxoedema)-वयस्क अवस्था में थायरॉक्सिन का अल्पत्रावण होने से मिक्सिडीमा (myxoedema) रोग हो जाता है। इसमें शरीर का विकास तो सामान्य होता है, लेकिन समय से पूर्व बुढ़ापे के लक्षण प्रदर्शित होते हैं। रुधिर दाब कम हो जाता है। मांसपेशियाँ शिथिल हो जाती हैं, जनन क्षमता कम हो जाती है।
3. सामान्य घेघा (Simple Goiter)-थायरॉइड ग्रन्थि से हॉर्मोन्स की उचित मात्रा स्रावित न होने से ग्रन्थि स्वयं फूलकर बड़ी हो जाती है। इस रोग को घेघा (goiter) कहते हैं। आयोडीन की उचित मात्रा का उपयोग करने से रोग को नियन्त्रित किया जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में जहाँ पानी में आयोडीन की कमी होती है, वहाँ के अधिकांश व्यक्ति पेंघा रोग से पीड़ित होते हैं। व्यक्ति को भोजन में प्रतिदिन 100-200 माइक्रोग्राम आयोडीन की आवश्यकता होती है। इसके लिए आयोडीन युक्त नमक का प्रयोग करना चाहिए।
4. एक्सोफ्थैल्मिकं ग्वायटर (Exophthalmic Goiter)-हॉमोन्स के अतिस्त्रावणं (hypersecretion) से , उपापचयी क्रियाएँ तीव्र हो जाती हैं। अनावश्यक ऊर्जा के कारण थकान अनुभव होती है। नेत्र उभर आते हैं। नेत्रों के पीछे श्लेष्म एकत्र हो जाने से नेत्र गोलक बाहर की ओर उभर आते हैं। इस रोग को एक्सोफ्थैल्मिक ग्वायंटर कहते हैं।
II. लैंगरहैन्स के द्वीप (Islets.of Langerhans)
अग्न्याशय (pancreas) एक मिश्रित ग्रन्थि (mixed gland) है। इसके अग्न्याशयिक पिण्डक (pancreatic Iobules) पाचक रस स्रावित करते हैं। यह प्रन्थि का बहिःस्त्रावी (exocrine) भाग होता है। इनके बीच-बीच में कुछ विशेष प्रकार की. कोशिकाओं के समूह होते हैं। इन कोशिकाओं के समूहों को लैंगरहैन्स के द्वीप (islets of Langerhans) कहते हैं। ये अन्तःस्रावी कोशिकाएँ होती है। लैंगरहैन्स के द्वीप में तीन प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं.-20%a-कोशिकाएं, 70%p-कोशिकाएँ तथा 5% डेल्टा कोशिकाएँ। तथा-कोशिकाओं से क्रमशः ग्लूकैगॉन (glucagon) तथा इन्सुलिन (insulin) नामक हॉमोन्स सावित होते हैं। डेल्टा (1) कोशिकाओं से सोमैटोस्टैनिन (Somatostatin) हॉर्मोन स्रावित होता है जो शरीर में काबोहाइड्रेट्स के उपापचय (metabolism) में महत्त्वपूर्ण नियामक का. कार्य करते हैं।
इन्सुलिन (Insulin) के कार्य-इन्सुलिन के निम्नलिखित कार्य हैं
(1) यह ग्लूकोस उपापचय का नियमन करता हैं। रुधिर में शर्करा की सामान्य मात्रा (लगभग 0.1%) को सामान्य बनाए रखता है।
(2) यह आवश्यकता से अधिक ग्लूकोस (रक्त शर्करा) से ग्लाइकोजन संश्लेषण (ग्लाइकोजेनेसिस-glycogenesis) एवं इसके संचय को प्रेरित करता है।
(3) यह वसा संश्लेषण को प्रेरित करता है।
(4) यह कोशिकाओं में आधारीय उपापचय दर को प्रभावित करता है।
मधुमेह (Diabetes mellitus)-इन्सुलिन के अल्पस्त्रावण के कारण शरीर की कोशिकाएँ रुधिर शर्करा का उपयोग नहीं कर पाती, इस कारण रुधिर में शर्करा की मात्रा बढ़ जाती है। रक्त तथा मूत्र में ग्लूकोस की मात्रा 300-500 मिग्रा प्रति 100 मिली रक्त हो जाने पर मधुमेह रोग होता है। अधिक मूत्रस्रावण के कारण निर्जलीकरण (dehydration) होने लगता है। ग्लूकोस के अभाव में वसाओं के अधिक, उपयोग होने के कारण कीटोनकाय (ketone bodies) बनने लगते हैं। इसे कीटोसिस (ketosis) कहते हैं। कीटोन-काय के कारण रुधिर की अम्लीयता बढ़ जाती है, बेहोशी की स्थिति हो जाती है। उचित उपचार के अभाव में मृत्यु हो जाती है।
हाइपोग्लाइसीमिया (Hypoglycemia)-इन्सुलिन के अतिस्त्रावण के कारण शरीर की कोशिकाएँ रुधिर से अधिक मात्रा में ग्लूकोसं लेने लगती हैं, जिससे तन्त्रिका कोशिकाओं को शर्करा कम.मात्रा में उपलब्ध होती है, इसे हाइपोग्लाइसीमिया (hypoglycemia) कहते हैं। इससे थकावट तथा ऐंठन महसूस होती है। उपवास या.शारीरिक परिश्रम के समय इन्सुलिन शरीर में प्रविष्ट करने पर मूर्छा की अवस्था आ जाती है, इसे इन्सुलिन आघात (insulin shock) कहते हैं।
ग्लूकैगॉन (Glucagon) के कार्य-ग्लूकैगॉन के निम्नलिखित कार्य हैं
(1) यह यकृत में वसा तथा प्रोटीन से ग्लूकोस संश्लेषण को प्रेरित करता है।
(2) वसा विखण्डन को प्रेरित करता है।
(3) यह रुधिर में शर्करा की मात्रा को बनाए रखने में सहायता करता है।
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