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BIOLOGY
हमारे शरीर में होने वाली किसी प्रतिवर्ती...

हमारे शरीर में होने वाली किसी प्रतिवर्ती क्रिया का रेखाचित्र बनाकर वर्णन कीजिए।

लिखित उत्तर

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प्रतिवर्ती क्रिया (Reflex Action)
बहुत-सी क्रियाएँ बाहरी उद्दीपनों की अनुक्रिया (response) के रूप में होती हैं। इन्हें प्रतिवर्ती क्रियाएँ (reflex actions) कहते हैं। इन क्रियाओं का. सर्वप्रथम वर्णन मार्शल हाल (Marshall Hall, 1833) ने किया था। स्वादिष्ट भोजन देखते ही मुख में लार आ जाना, काँटा चुभते ही पैर का झटके के साथ उठ जाना, तेज प्रकाश में पुतली का सिकुड़ जाना तथा अन्धेरे में पुतली का फैल जाना, छींकना, खाँसना आदि सभी प्रतिवर्ती क्रियाएँ हैं। ये क्रियाएँ मेरुरज्जु से नियन्त्रित होती हैं। मस्तिष्क निकाल देने पर भी ये चलती रहती हैं। अतः प्रतिवर्ती क्रिया किसी उद्दीपन के प्रति अंग या अंगों के तन्त्र द्वारा तीव्र गति से की जाने वाली स्वचालित.अनुक्रिया है जिसके संचालन में मस्तिष्क भाग नहीं लेता। बेस्ट तथा टेलर (Best & Taylor) के अनुसार, संवेदी अंगों द्वारा ग्रहण किए गए बाह्य तथा आन्तरिक उद्दीपनों के प्रति अनैच्छिक तथा स्वचालित अनुक्रिया प्रतिवर्ती क्रिया कहलाती है। ये क्रियाएँ बिना सोचे विचारे होती हैं।
प्रतिवर्ती क्रियाएँ निम्नलिखित दो प्रकार की होती हैं -
1. अप्रतिबन्धित प्रतिवर्ती क्रियाएँ (Unconditioned or Inborn Reflex Action)-ये प्रतिवर्ती क्रियाएँ जन्मजात होती हैं, जैसे-तेज प्रकाश पड़ने पर पुतली का सिकुड़ना, छींकना, खाँसना आदि।
2. प्रतिबन्धित प्रतिवर्ती क्रियाएँ. (Conditioned Reflex Action)-ये क्रियाएँ नियमित प्रशिक्षण या अधिगम (learning) से होती हैं। प्रारम्भ में इनका नियन्त्रण मस्तिष्क द्वारा होता है, बाद में इन क्रियाओं का नियन्त्रण मेरुरज्जु द्वारा होने लगता हैं, जैसे—साइकिल चलाना, नाचना, टाइपिंग, तैरना, स्वादिष्ट भोजन को देखकर मुँह में पानी आना आदि।
मेरु तन्त्रिकाएँ (spinal nerve) मेरुरज्जु (spinal cord) से निकलती हैं। प्रत्येक मेरु तन्त्रिका दो मूलों (roots) से बनती है—पृष्ठ मूल (dorsal root) तथा अधर मूल (ventral root)| पृष्ठ मूल में संवेदी तन्तु तथा अधर मूल में प्रेरक तन्तु होते हैं।

.संवेदी अंगों में तन्त्रिका तन्तु होते हैं। ये तन्तु उद्दीपन को ग्रहण कर संवेदी तन्तुओं द्वारा रीद रज्जु तक पहुँचाते हैं। इसके फलस्वरूप मेरुरज्जु से अनुक्रिया के लिए आदेश प्रेरक तन्तुओं द्वारा, सम्बन्धित मांसपेशियों या ग्रन्थियों में पहुंचता है और अंग. अनुक्रिया करता है। इस प्रकार संवेदी अंगों से, संवेदनाओं.का, संवेदी तन्तुओं द्वारा मेरुरज्जु तक आने तथा मेरुरज्जु से प्रेरणा के रूप में अनुक्रिया करने वाले अंग की मांसपेशियों तक पहुँचने के मार्ग को प्रतिवर्ती चाप (reflex arc) तथा होने वाली क्रिया को प्रतिवर्ती क्रिया (reflex action) कहते हैं। यह क्रिया एक निश्चित मार्ग से होकर होती है |
प्रतिवर्ती चाप में सम्मिलित संरचनाएँ-(i) संवेदी अंग-जैसे त्वचा, नेत्र, कर्ण आदि, (ii) संवेदी न्यूरॉन- मेरु तन्त्रिका के पृष्ठ मूल में स्थित, (iii) सहबन्धक न्यूरॉन (association neuron)-मेरुरज्जु के धूसर द्रव्य में स्थित छोटे द्विध्रुवीय न्यूरॉन जो संवेदी तथा चालक न्यूरॉन को जोड़ते हैं, (iv) चालक न्यूरॉन मेरुरज्जु की अधर मूल में स्थित तथा (v) कार्यकर अंग (effectors)-मांसपेशियाँ, ग्रन्थियाँ आदि जो तन्त्रिकीय प्रेरणा के अनुरूप कार्य करते हैं।
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