डाइएथिल ईथर के निर्माण की विधियाँ
1. प्रयोगशाला विधि (Laboratory method)-प्रयोगशाला में एथेनॉल के आधिक्य को सान्द्र `H_2SO_4` के साथ 413K पर गर्म करने पर डाइएथिल ईथर बनता है -
उपर्युक्त अभिक्रिया में ऐसा प्रतीत होता है कि सल्फ्यूरिक अम्ल की अल्प मात्रा, ऐल्कोहॉल की असीमित मात्रा को ईथर में परिवर्तित करने में समर्थ है। इसी कारण इस विधि को विलियमसन अविरत ईथरीकरण विधि (Williamson.s Continuous Etherification method) कहते हैं। - इस विधि से प्रयोगशाला तथा उद्योग में ईथर बनाया जाता है। एथेनॉल में सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल मिलाकर 413K तक गर्म करने पर ईथर का बनना प्रारम्भ हो जाता है। इस अभिक्रिया को इसी ताप पर निरन्तर चालू रखने के लिए एथेनॉल डालते रहते हैं। आसुत में ईथर, एथेनॉल जल तथा अम्ल होता है जिसे तनु क्षार से धोकर अम्ल अलग कर दिया जाता है। इसके पश्चात् प्रभाजी आसवन किया जाता है। अधिक वाष्पशील ईथर का आसवन हो जाता है और शेष एथेनॉल को फिर से काम में लिया जाता है। इस प्रकार यह अभिक्रिया अनवरत चल सकती है। इसी कारण इसे अविरत (सतत) ईथरीकरण विधि कहते हैं। उपर्युक्त अभिक्रिया के अनुसार एक बार-सान्द्र `H_2SO_4` मिलाकर बार-बार एथेनॉल मिलाने से अभिक्रिया अविरत (सतत) रूप में चलती रहनी चाहिए परन्तु ऐसा नहीं होता है। इसके दो कारण हैं -(a) अभिक्रिया में उत्पन्न जल, सान्द्र `H_2SO_4` को तनु कर देता है। (b) `H_2SO_4` की कुछ मात्रा एथेनॉल द्वारा अपचयित होकर सल्फर डाइऑक्साइड में परिवर्तित हो जाती है। अत: कुछ समय बाद `H_2SO_4` मिलाना पड़ता है। इस अभिक्रिया में सान्द्र `H_2SO_4` के स्थान पर बेन्जीन सल्फोनिक अम्ल `(C_6H_5 SO_3H)` लेने पर यह विधि अविरत हो जाती है क्योंकि इसके प्रयोग से `SO_2` आदि नहीं बनते हैं।
प्रयोग विधि (Experiment method)-प्रयोगशाला में ईथर का निर्माण करने के लिए एक गोल पेंदे के आसवन फ्लास्क में 100 मिली परिशुद्ध ऐल्कोहॉल लेकर इसमें उतना ही सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल धीरे-धीरे डालते हैं। सल्फ्यूरिक अम्ल डालते समय फ्लास्क को हिलाते रहते हैं और फ्लास्क को ठण्डा भी करते रहते हैं क्योकि `H_2SO_4` डालने पर काफी ऊष्मा निर्मुक्त होती है जिससे फ्लास्क टूट सकता है। फिर इस फ्लास्क को अच्छी प्रकार ठण्डा करके इसमें एक पृथक्कारी फनल, थर्मामीटर तथा संघनित्र लगा देते हैं। संघनित्र का दूसरा सिरा.ग्राही पात्र से जुड़ा रहता है। ग्राही पात्र को बर्फ मिले जल से भरी नाँद में रखा जाता है। ग्राही में एक पार्श्व नली लगी होती है जिसको एक रबड़ की नली द्वारा जल के हौज (sink) तक पहुँचा दिया जाता है। इस व्यवस्था के कारण ईथर वाष्प बर्नर की लौ से दूर रहते हैं और आग लगने का भय दूर हो जाता है। थर्मामीटर का बल्ब ऐल्कोहॉल-सल्फ्यूरिक अम्ल मिश्रण में डूबा रहता है और उपकरण को पूर्णतया वायुरोधक (air tight) बना दिया जाता है। चित्रानसार पूर्ण व्यवस्था के पश्चात आसवन फ्लास्क को बाल ऊष्मक पर 418K ताप पर गर्म किया जाता है। ईथर बनता है और इसके वाष्प जल संघनित्र द्वारा संघनित होते रहते हैं। आसुत ईथर ग्राही में एकत्रित होता जाता है। जितना ईथर ग्राही पात्र में एकत्रित होता जाता है, उतना ही ऐल्कोहॉल पृथक्कारी फनल के द्वारा अभिक्रिया मिश्रण में डाल दिया जाता है। इस प्रकार से प्राप्त आसुत द्रव ईथर में ऐल्कोहॉल, जल, सल्फ्यूरिक अम्ल आदि अपद्रव्यों की अशुद्धियाँ मिली रहती हैं।