Home
Class 10
PHYSICS
विद्युत जनित्र का नामांकित आरेख खींचकर इ...

विद्युत जनित्र का नामांकित आरेख खींचकर इसका मूल सिद्धान्त तथा कार्यविधि स्पष्ट कीजिए।

लिखित उत्तर

Verified by Experts

प्रत्यावर्ती धारा डायनमो अथवा विद्युत जनित्र-प्रत्यावर्ती धारा डायनमो एक ऐसा यन्त्र है जो यान्त्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है। इसका कार्य फैराडे के विद्युत-चुम्बकीय प्रेरण के क्षेत्र चुम्बक सिद्धान्त पर निर्भर है।
सिद्धान्त-जब किसी बन्द कुण्डली को किसी शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र में तेजी से घुमाया जाता है तो उसमें से होकर गुजरने वाले चुम्बकीय क्षेत्र रेखाओं में लगातार परिवर्तन होता रहता है, जिसके कारण कुण्डली में एक विद्युत धारा प्रेरित हो जाती है। कुण्डली को घुमाने में किया गया कार्य ही कुण्डली में विद्युत ऊर्जा के रूप में परिणत हो जाता है। संरचना-इसके मुख्य भाग निम्नलिखित हैं-
(i) क्षेत्र चुम्बक-यह एक शक्तिशाली चुम्बक (N-S) होता है। इसका आयताकार कार्य शक्तिशाली चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न करना है, जिसमें कुण्डली घूमती कुण्डली है। इसके द्वारा उत्पन्न चुम्बकीय क्षेत्र की बल-रेखाएँ N से 5 की ओर सपी वलय जाती हैं।
(iii) आर्मेचर-यह एक आयताकार कुण्डली a b c d होती है, जो कच्चे लोहे के क्रोड पर पृथक्कित ताँबे के तार को लपेटकर बनाई जाती है। इसमें ताँबे के फेरों की संख्या अधिक होती है। इस कुण्डली को क्षेत्र चुम्बक के ध्रुव खण्डों NS के बीच तेजी से घुमाया जाता है। आर्मेचर कुण्डली को घुमाने के लिए स्टीम टरबाइन, वाटर टरबाइन, पेट्रोल इंजन आदि का उपयोग किया जाता है।
(iii) सी वलय (Slip Rings)-कुण्डली पर लिपटे तार के दोनों सिरे धातु दो छल्लों `S_(1)` व `S_(2)` से जुड़े रहते हैं तथा आर्मेचर के साथ-साथ घूमते हैं। इनको सी वलय कहते हैं। ये छल्ले परस्पर तथा धुरा दण्ड से पृथक्कित रहते हैं।
(iv) बुश (Brush)-सी वलय `S_(1), S_(2)` सदैव ताँबे की बनी दो पत्तियों b व by को स्पर्श करते रहते हैं, जिन्हें ब्रश कहते हैं। ये बुश स्थिर रहते हैं तथा इनका सम्बन्ध उस बाह्य परिपथ से कर देते हैं, जिसमें विद्युत धारा भेजनी होती है।
कार्यविधि-माना कि कुण्डली a b c d दक्षिणावर्त दिशा में घूम रही है, जिससे भुजा c d नीचे जा रही है तथा भुजा a b ऊपर की ओर आ रही है। फ्लेमिंग के दाएं हाथ के नियमानुसार, इन भुजाओं में प्रेरित धारा की दिशा चित्रानुसार होगी। अतः बाह्य परिपथ में धारा `S_(1)` से जाएगी तथा `S_(2)` से वापस आएगी। जब कुण्डली अपनी ऊर्ध्वाधर स्थिति से गुजरेगी, तब भुजा a b नीचे आएगी तथा c d ऊपर की ओर जाने लगेगी। इसी कारण, a b तथा c d में धारा की दिशाएँ पहले से विपरीत हो जाएँगी। इस प्रकार की धारा को प्रत्यावर्ती धारा कहते हैं, क्योंकि प्रत्येक आधे चक्कर के बाद बाह्य परिपथ में धारा की दिशा बदल जाती है।
बुशों का कार्यताँबे की दो पत्तियाँ `b_(1)` व `b_(2)` सपी वलयों से जुड़ी रहती हैं। इन पत्तियों को ब्रुश कहते हैं। ये घूमने वाली कुण्डली का बाह्य परिपथ में सम्पर्क बनाए रखती हैं।
Promotional Banner