समाज में विविधता|सामाजिक विभाजन और राजनीति|सामाजिक विविधता की राजनीती पर परिणाम|हासिये पर खड़े लोगों को मुख्यधारा में जोड़ने के लिए सर्कार के प्रयास|OMR
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निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये इस संसार की यही रीति है। सत्यवादी मारा जाता है। आज से सहस्त्रों वर्ष पूर्व ग्रीस देश में एक दार्शनिक रहा करता था। उसका नाम सुकरात था। उसकी बातें सीधी-सच्ची पर तीखी होती थी। समाज उन्हें सह नहीं सका और उसे कानूनी आज्ञा का पालन करते हुए विष का प्याला पीना पड़ा, इसी प्रकार तत्कालीन शासन-सत्ता तथा सामाजिक और धार्मिक दुराचारों के विरुद्ध आवाज उठाने पर ईसा को सूली पर चढ़ना पड़ा, इसी प्रकार तत्कालीन शासन-सत्ता तथा सामाजिक और धार्मिक दुराचारों के विरुद्ध आवाज उठाने पर ईसा को सूली पर चढ़ना पड़ा। सलीब पर से ईसा का यह आर्तनाद आज भी गूंज रहा है-हे प्रभु, हे पिता, तुम हमें क्यों भूल गए हो? साम्प्रदायिक विष को शान्त करने और लोगों में साम्प्रदायिक सद्भावना फैलाने के लिए गांधीजी अपने जीवन की बाजी लगाकर एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते फिरे अन्त में उन्हें गोली का शिकार होना पड़ा। इन दृष्टान्तों की पुनरावृत्ति अभी हाल ही में अमरीका में हुई है वहां के काले लोगों को उनके रंग और जाति के दुर्व्यवहारों से मुक्ति दिलाकर समाज में समुचित स्थान दिलाने को डॉ. किंग ने अहिंसक आन्दोलन खड़ा किया था। उन्होंने चाहा कि अमरीका के गोरे लोगों में हृदय परिवर्तन हो और वे नीग्रो अमरीकनों को नौकरी में और सामाजिक प्रतिष्ठा में वहीं स्थान पाने दें जो श्वेत अमरीकनों को मिलता है, लेकिन उसका भी निर्भीक सच्चाई बरतने का मूल्य अपने प्राण देकर चुकाना पड़ा। आज संसार के सामने वही पुराना प्रश्न फिर खड़ा हो गया है। क्या दुनिया में सच कहने वालों का और इंसाफ मांगने वालों को अन्त इसी प्रकार होता रहेगा? क्या आपसी विद्वेष को समाप्त करने की सम्भावना इस दुनिया में सबको पसन्द नहीं होगी? धार्मिक एवं सामाजिक दुराचारों के विरुद्ध आवाज उठाने पर किसे सूली पर चढ़ना पड़ाः
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निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये इस संसार की यही रीति है। सत्यवादी मारा जाता है। आज से सहस्त्रों वर्ष पूर्व ग्रीस देश में एक दार्शनिक रहा करता था। उसका नाम सुकरात था। उसकी बातें सीधी-सच्ची पर तीखी होती थी। समाज उन्हें सह नहीं सका और उसे कानूनी आज्ञा का पालन करते हुए विष का प्याला पीना पड़ा, इसी प्रकार तत्कालीन शासन-सत्ता तथा सामाजिक और धार्मिक दुराचारों के विरुद्ध आवाज उठाने पर ईसा को सूली पर चढ़ना पड़ा, इसी प्रकार तत्कालीन शासन-सत्ता तथा सामाजिक और धार्मिक दुराचारों के विरुद्ध आवाज उठाने पर ईसा को सूली पर चढ़ना पड़ा। सलीब पर से ईसा का यह आर्तनाद आज भी गूंज रहा है-हे प्रभु, हे पिता, तुम हमें क्यों भूल गए हो? साम्प्रदायिक विष को शान्त करने और लोगों में साम्प्रदायिक सद्भावना फैलाने के लिए गांधीजी अपने जीवन की बाजी लगाकर एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते फिरे अन्त में उन्हें गोली का शिकार होना पड़ा। इन दृष्टान्तों की पुनरावृत्ति अभी हाल ही में अमरीका में हुई है वहां के काले लोगों को उनके रंग और जाति के दुर्व्यवहारों से मुक्ति दिलाकर समाज में समुचित स्थान दिलाने को डॉ. किंग ने अहिंसक आन्दोलन खड़ा किया था। उन्होंने चाहा कि अमरीका के गोरे लोगों में हृदय परिवर्तन हो और वे नीग्रो अमरीकनों को नौकरी में और सामाजिक प्रतिष्ठा में वहीं स्थान पाने दें जो श्वेत अमरीकनों को मिलता है, लेकिन उसका भी निर्भीक सच्चाई बरतने का मूल्य अपने प्राण देकर चुकाना पड़ा। आज संसार के सामने वही पुराना प्रश्न फिर खड़ा हो गया है। क्या दुनिया में सच कहने वालों का और इंसाफ मांगने वालों को अन्त इसी प्रकार होता रहेगा? क्या आपसी विद्वेष को समाप्त करने की सम्भावना इस दुनिया में सबको पसन्द नहीं होगी? ग्रीस देश के दार्शनिक का क्या नाम थाः
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये इस संसार की यही रीति है। सत्यवादी मारा जाता है। आज से सहस्त्रों वर्ष पूर्व ग्रीस देश में एक दार्शनिक रहा करता था। उसका नाम सुकरात था। उसकी बातें सीधी-सच्ची पर तीखी होती थी। समाज उन्हें सह नहीं सका और उसे कानूनी आज्ञा का पालन करते हुए विष का प्याला पीना पड़ा, इसी प्रकार तत्कालीन शासन-सत्ता तथा सामाजिक और धार्मिक दुराचारों के विरुद्ध आवाज उठाने पर ईसा को सूली पर चढ़ना पड़ा, इसी प्रकार तत्कालीन शासन-सत्ता तथा सामाजिक और धार्मिक दुराचारों के विरुद्ध आवाज उठाने पर ईसा को सूली पर चढ़ना पड़ा। सलीब पर से ईसा का यह आर्तनाद आज भी गूंज रहा है-हे प्रभु, हे पिता, तुम हमें क्यों भूल गए हो? साम्प्रदायिक विष को शान्त करने और लोगों में साम्प्रदायिक सद्भावना फैलाने के लिए गांधीजी अपने जीवन की बाजी लगाकर एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते फिरे अन्त में उन्हें गोली का शिकार होना पड़ा। इन दृष्टान्तों की पुनरावृत्ति अभी हाल ही में अमरीका में हुई है वहां के काले लोगों को उनके रंग और जाति के दुर्व्यवहारों से मुक्ति दिलाकर समाज में समुचित स्थान दिलाने को डॉ. किंग ने अहिंसक आन्दोलन खड़ा किया था। उन्होंने चाहा कि अमरीका के गोरे लोगों में हृदय परिवर्तन हो और वे नीग्रो अमरीकनों को नौकरी में और सामाजिक प्रतिष्ठा में वहीं स्थान पाने दें जो श्वेत अमरीकनों को मिलता है, लेकिन उसका भी निर्भीक सच्चाई बरतने का मूल्य अपने प्राण देकर चुकाना पड़ा। आज संसार के सामने वही पुराना प्रश्न फिर खड़ा हो गया है। क्या दुनिया में सच कहने वालों का और इंसाफ मांगने वालों को अन्त इसी प्रकार होता रहेगा? क्या आपसी विद्वेष को समाप्त करने की सम्भावना इस दुनिया में सबको पसन्द नहीं होगी? विष का प्याला सुकरात को क्यों पीना पड़ा
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये इस संसार की यही रीति है। सत्यवादी मारा जाता है। आज से सहस्त्रों वर्ष पूर्व ग्रीस देश में एक दार्शनिक रहा करता था। उसका नाम सुकरात था। उसकी बातें सीधी-सच्ची पर तीखी होती थी। समाज उन्हें सह नहीं सका और उसे कानूनी आज्ञा का पालन करते हुए विष का प्याला पीना पड़ा, इसी प्रकार तत्कालीन शासन-सत्ता तथा सामाजिक और धार्मिक दुराचारों के विरुद्ध आवाज उठाने पर ईसा को सूली पर चढ़ना पड़ा, इसी प्रकार तत्कालीन शासन-सत्ता तथा सामाजिक और धार्मिक दुराचारों के विरुद्ध आवाज उठाने पर ईसा को सूली पर चढ़ना पड़ा। सलीब पर से ईसा का यह आर्तनाद आज भी गूंज रहा है-हे प्रभु, हे पिता, तुम हमें क्यों भूल गए हो? साम्प्रदायिक विष को शान्त करने और लोगों में साम्प्रदायिक सद्भावना फैलाने के लिए गांधीजी अपने जीवन की बाजी लगाकर एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते फिरे अन्त में उन्हें गोली का शिकार होना पड़ा। इन दृष्टान्तों की पुनरावृत्ति अभी हाल ही में अमरीका में हुई है वहां के काले लोगों को उनके रंग और जाति के दुर्व्यवहारों से मुक्ति दिलाकर समाज में समुचित स्थान दिलाने को डॉ. किंग ने अहिंसक आन्दोलन खड़ा किया था। उन्होंने चाहा कि अमरीका के गोरे लोगों में हृदय परिवर्तन हो और वे नीग्रो अमरीकनों को नौकरी में और सामाजिक प्रतिष्ठा में वहीं स्थान पाने दें जो श्वेत अमरीकनों को मिलता है, लेकिन उसका भी निर्भीक सच्चाई बरतने का मूल्य अपने प्राण देकर चुकाना पड़ा। आज संसार के सामने वही पुराना प्रश्न फिर खड़ा हो गया है। क्या दुनिया में सच कहने वालों का और इंसाफ मांगने वालों को अन्त इसी प्रकार होता रहेगा? क्या आपसी विद्वेष को समाप्त करने की सम्भावना इस दुनिया में सबको पसन्द नहीं होगी? 'आर्तनाद' का सही अर्थ क्या है।
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