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अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम की घटानाएं|इं...

अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम की घटानाएं|इंग्लैंड के अमेरिका मे उपनिवेश |अमेरिका को शक्तिहीन समझना |अमेरिका की इंग्लैंड से दूरी |यातायात की असुविधा |अंग्रेज सेना के अयोग्य सेनापति |जार्ज तृतीय की अयोग्यता |वांशिगटन का कुशल नेतृत्व |क्रांति का समापन |OMR

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जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। नव उदारवाद का प्रभाव हो सकता है

जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। लेखक प्रस्तुत गद्यांश के माध्यम से क्या कहना चाहता है?

जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। इतिहास के अन्त की घोषणा किसने की थी?

जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। ट्रिनिटी कॉलेज कहाँ है?

जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। टॉमस एल. फ्रिडमैन किस समाचार-पत्र में स्तम्भ लिखते थे?

जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। आकाश कपूर कहाँ रहते हैं?

जब से नव उदारवाद की बयार चली है तब से कहा जा रहा है कि सारा विश्व अमेरिकी रंग में, देर-सबेर सराबोर हो जाएगा, यानी सब मुल्कों का अमेरिकीकरण हो जाएगा। ऐसा दावा भूतपूर्व अमेरिकी विदेशमन्त्री डॉ। हेनरी किसिंगर ने 12 अक्टूबर, 1999 को आयरलैण्ड की राजधानी डब्लिन के ट्रिनिटी कॉलेज में अपने व्याख्यान के क्रम में किया : 'बुनियादी चुनौती यह है कि जिसे भूमण्डलीकरण कहा गया है, वह अमेरिका द्वारा वर्चस्व जमाए रखने सम्बन्धी भूमिका का ही दूसरा नाम है। बीते दशक के दौरान अमेरिका ने अभूतपूर्व समृद्धि हासिल की, पूँजी की उपलब्धता को व्यापक और सघन किया, नई प्रौद्योगिकियों की विविधता के निर्माण, उनके विकास और विस्तृत वितरण हेतु धन की व्यवस्था की, अनगिनत सेवाओं और वस्तुओं के बाजार बनाए। आर्थिक दृष्टि से इससे बेहतर कुछ और नहीं किया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि इन सबको देखते हुए अमेरिकी विचारों, मूल्यों और जीवन शैली को स्वीकारने के अलावा विश्व के पास कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' के स्तम्भकार टॉमस एल। फ्रिडमैन घोषणा करते दिखते हैं कि हम अमेरिकी एक गतिशील विश्व के समर्थक मुक्त बाजार के पैरोकार और उच्च तकनीक के पुजारी हैं। हम चाहते हैं कि विश्व हमारे नेतृत्व में रहे और लोकतान्त्रिक तथा पूँजीवादी बने। इतिहास के अन्त की घोषणा करने वाले फ्रांसिस फुकुयामा का मानना है कि विश्व का अमेरिकीकरण होना ही चाहिए, क्योंकि कई दृष्टियों से अमेरिका आज विश्व का सर्वाधिक उन्नत पूँजीवादी समाज है। उसके संस्थान इसी कारण बाजार की शक्तियों के तर्क संगत विकास के प्रतीक हैं। यदि बाजार की शक्तियों को वैश्वीकरण संचालित करता है, तो भूमण्डलीकरण के साथ-साथ अमेरिकीकरण अनिवार्य रूप से होगा। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' से जुड़े भारतीय मूल के टिप्पणीकार आकाश कपूर ने उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाया है। कपूर के पिता भारतीय और माँ अमेरिकी हैं। वे पले-बढ़े हैं अमेरिका में, परन्तु अरसे से पुदुचेरी (पाण्डिचेरी) में रहते हैं। उनके लेख 'न्यूयॉर्क टाइम्स' और उनके भूमण्डलीय संस्करण 'इण्टरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून' में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं। जिसका निवारण न किया जा सके, उसे कहते हैं

REVISION|आज़ादी के कारण |आपतिजनक कर |नवीन टैक्स स्टैंप ऐक्ट 1765 / Townshand ऐक्ट / चीनी क़ानून 1764 /क्वाटरीरी ऐक्ट |लेखकों एवं प्रचारकों की भूमिका |जार्ज तृतीया की निरंकुश नीतिया |क्रांति का समापन |परिणाम

निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये शिक्षा जीवन के सर्वांगीण विकास हेतु अनिवार्य है। शिक्षा के बिना मनुष्य विवेकशील और शिष्ट नहीं बन सकता। विवेक से मनुष्य में सही और गलत का चयन करने की क्षमता उत्पन्न होती है। विवेक से ही मनुष्य के भीतर उसके चहुँ ओर नित्य प्रति होते घटनाक्रमों के प्रति एक छिद्रान्वेषी दृष्टिकोण उत्पन्न होता है। शिक्षा ही मानव को मानव के प्रति मानवीय भावनाओं से पोषित करती है।शिक्षा से मनुष्य अपने परिवेश के प्रति जाग्रत होकर कर्तव्याभिमुख हो जाता है। 'स्व' से 'पर' की ओर अग्रसर होने लगता है। निर्बल की सहायता करना, दुखियों के दुःख दूर करने का प्रयास करना, दूसरों के दुःख से दु:खी हो जाना और दूसरों के सुख से स्वयं सुख का अनुभव करना जैसी बातें एक शिक्षित मानव में सरलता से देखने को मिल जाती हैं।इतिहास, साहित्य, राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शनशास्त्र इत्यादि पढ़कर विद्यार्थी विद्वान् ही नहीं बनता वरन् उसमें एक विशिष्ट जीवन दृष्टि, रचनात्मकता और परिपक्वता का सृजन भी होता है। शिक्षित सामाजिक परिवेश में व्यक्ति अशिक्षित सामाजिक परिवेश की तुलना में सदैव ही उच्च स्तर पर जीवन यापन करता है।परन्तु आज शिक्षा का अर्थ बदल रहा है। शिक्षा भौतिक आकांश की चेरी बनती जा रही है। व्यावसायिक शिक्षा के अंधानुकरण में छात्र सैद्धान्तिक शिक्षा से दूर होते जा रहे हैं। रूस की क्रान्ति, फ्रांस की क्रांति, अमेरिकी क्रांति, समाजवाद, पूँजीवाद, राजनीतिक व्यवस्था, सांस्कृतिक मूल्यों आदि की सामान्य जानकारी भी व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों को नहीं है। यह शिक्षा का विशुद्ध रोजगारकरण है। शिक्षा के प्रति इस प्रकार का संकुचित दृष्टिकोण अपनाकर विवेकशील नागरिकों का निर्माण नहीं किया जा सकता। भारत जैसे विकासशील देश में शिक्षा रोजगार का साधन न होकर साध्य हो गई है। इस कुप्रवृत्ति पर अंकुश लगाना अनिवार्य है। जहाँ मानविकी के छात्रों को पत्रकारिता, साहित्य-सृजन, विज्ञापन, जनसम्पर्क इत्यादि कोर्स भी कराए जाने चाहिए ताकि उन्हें रोजगार के लिए न भटकना पड़े वहीं व्यावसायिक कोर्स करने वाले छात्रों को मानविकी के विषय जैसे-इतिहास, साहित्य, राजनीतिशास्त्र व दर्शन आदि का थोड़ा बहुत अध्ययन अवश्य कराना चाहिए ताकि समाज को विवेकशील नागरिक प्राप्त होते रहें, तभी समाज में सन्तुलन बना रह सकेगा। छिद्रान्वेषी दृष्टिकोण से लेखक का क्या तात्पर्य है?