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Class 12
PHYSICS
चल कुंडली गैलवेनोमापी का सिद्धांत सहित ब...

चल कुंडली गैलवेनोमापी का सिद्धांत सहित बनावट एवं कार्य प्रणाली का वर्णन करेंI

लिखित उत्तर

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चलकुण्डली गैलवे- नोमापी-चल कुण्डली गैलवेनीमापी वैसा विद्युतीय यंत्र है, जो बहुत संवेदनशील होता है । इसमें थरावाही कुण्डली गतिशील तथा चुम्बक स्थिर (अचल) होता है । इसीलिए इस गैलवेनोमापी को चल कुण्डली गैलवेनोमापी कहते हैं । यह विद्युत परिपथों में प्रवाहित सूक्ष्मतम थारा की भी सूचना प्रदान करने की क्षमता रखता है।
बनावट-चित्रानुसार चल कुण्डली गैलवेनोमापी में पतले विद्युतरोधी ताँबे के तार की अनेक लपेटों की संख्या वाली एक आयताकार कुण्डली C होती है, जिसके सिरे को फॉस्फर ब्राँज के पतले तार F द्वारा जोड़कर एक प्रबल स्थायी नाल-चुम्बक के अवतल ध्रुव खण्डों के बीच निलम्बित होता है।

कुण्डली नर्म लोहे का एक समाक्ष बेलन A पर लपेटा रहता है । कुण्डली बेलन के गिर्द घूम सकती है ऐसी व्यवस्था रहती है । अवतल शव-खण्ड एवं बेलन के । कारण चित्रानुसार त्रैज्य चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है । उस स्थिति में कुण्डली । से प्रवाहित धारा उसकी उदग्र भुजाओं पर उत्पन्न होने वाले बल सभी स्थितियों में कुण्डली के समतल पर अभिलम्बवत् होते हैं । कुण्डली का दूसरा सिरा पेंचों द्वारा जुड़ा होता है । पूरा यंत्र एक चिपटे बेलनाकार बक्से में बंद रहता है जो कि तीन समतलकारी पेंचों सहित भारी वृत्ताकार आधार पर आधारित होता है। कुण्डली के छोटे कोण के घूर्णन को लैंप तथा स्केल व्यवस्था द्वारा मापा जाता है। इसके लिए क्रॉस तार युक्त एक अवतल या समतल दर्पण M निलम्बन तार से जुड़ा होता है । प्रकाश स्रोत से प्रकाश दर्पण पर काँच की खिड़की द्वारा आपतित कराया जाता है तथा परावतित प्रकाश को पारदर्शी, मिमी. में अंशांकित मीटर स्केल पर क्रॉस तार युक्त स्पॉट के रूप में अवलोकित किया जाता है।
कार्यविधि-सर्वप्रथम वृत्ताकारं आधार में लगे तीनों समतलकारी पेंचों की सहायता से चल कुण्डली गेलवेनोमापी को समतल बना लिया जाता है जिससे नरम लोहे के कोड तथा ध्रुव-खण्ड के किसी भाग से बिना स्पर्श किये हुए कुण्डली स्वतंत्रतापूर्वक लटकती रहती है । उसके बाद निलम्बन शीर्ष को लैम्प एवं स्केल व्यवस्था द्वारा समुचित दिशा में समायोजित करके प्रकाश के स्पॉट को शून्य स्केल पर लाया जाता है तथा उसे कुछ भी ऐंठन पर विचलित होने की स्थिति में समायोजित कर लिया जाता है । धारा के कुण्डली में प्रवाहित होने पर निलम्बन तार में चुम्बकीय बल आघूर्ण के अनुभव होने से कुछ ऐंठन (मरोड़) होता है जो कि सैम्प एवं स्केल व्यवस्था के पारदर्शी स्केल पर स्पॉट के रूप में फोकस होता है, अर्थात विक्षेपित मरोड़ कोण स्पॉट के रूप में प्रदर्शित होता है, जिसे नोट कर लिया जाता है।
सिद्धांत-जब किसी धारा प्रवाहित कुण्डली को विद्युतीय क्षेत्र में रखा जाता है तो एक बल उत्पन्न होता है जिसकी दिशा फ्लेमिंग के दायें हाथ के अनुसार होती है। इस बल के कारण होने वाले विक्षोभ की मात्रा के आधार पर थारा का मान ज्ञात किया जाता है।
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