उच्चारण स्थान एवं उच्चारण प्रयत्न में अंतर|मूल उच्चारण स्थान बोधक तालिका|OMR|आभ्यंतर प्रयत्न बोधक ट्रिक|बाह्य प्रयत्न बोधक ट्रिक|सारांश
उच्चारण स्थान एवं उच्चारण प्रयत्न में अंतर|मूल उच्चारण स्थान बोधक तालिका|OMR|आभ्यंतर प्रयत्न बोधक ट्रिक|बाह्य प्रयत्न बोधक ट्रिक|सारांश
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उच्चारण प्रयत्न का भावार्थ |उच्चारण प्रयत्नों के मूल भेद |आभ्यंतर प्रत्यनाश्रित विरोधाभास |OMR|आभ्यंतर प्रयत्नों की प्रकृति |बाह्य प्रयत्न प्रकृति परिचय |सारांश
मूल उच्चारण स्थान बोधक तालिका |मिश्रित उच्चारण स्थान बोधक तालिका |अन्य उच्चारण स्थान बोधक तालिका |स्मरणीय नियम |OMR|स्मरणीय तथ्य |सारांश
आभ्यंतर प्रयत्न बोधक ट्रिक |बाह्य प्रयत्न बोधक ट्रिक |OMR|उच्चारण प्रयत्न आश्रित नियम |स्थान - प्रयत्न सुमेलन विधि |सारांश
उच्चारण शब्द की व्युपत्ति एवं भावार्थ |उच्चारण का भावार्थ एवं प्रक्रिया |उच्चारण स्थान संखयाश्रित स्मरणीय तथ्य |OMR|विशिष्ट तथ्य |सारांश
पतंजलि कृत महाभाषयानुसार उच्चारण स्थानों का व्यावहारिक दृष्टि से वर्गीकरण |उच्चारण में सहायक / करण संज्ञक |OMR|विविध संज्ञाश्रित स्वर भेद चक्र |सारांश
करता शब्द की व्युत्पत्ति एवं भावार्थ |कर्ता बोधक तालिका / सारणी |OMR|स्मरणीय तथ्य |सारांश
नीचे दिए गए प्रश्नो में सबसे उचित विकल्प का चयन कीजिये स्थान को इस्थान बोलना उच्चारण सम्बन्धी दोष का कोन सा प्रकार है ?
लकार परिचय |कर्ता-क्रिया-कर्म का सहसम्बन्ध |कर्ता बोधक तालिका |OMR|Summary|10 लकारों में धातु रूप निर्माण हेतु प्रयुक्त 18 तिड़ प्रत्यय|तडात्मनेपदम सूत्रानुसार 9 आत्मनेपद संज्ञक प्रत्यय
निम्नलिखित पद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये मानव के लिए विचार तथा अनुभव में जो कुछ भी श्रेष्ठ है, उदात्त है व इसका अथवा उसका नहीं है जातिगत अथवा देशगत नहीं है, वह सबका है, सारे विश्व का है। समस्त ज्ञान, विज्ञान और सभ्यता, सारी मानवता की विरासत है। पूर्व और पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के भेद, अक्षांश और देशान्तर का भेद तथा जलवायु और भौगोलिक सीमा के भेद सर्वथा निराधार हैं। सम्प्रदाय, समुदाय और जाति के नाम पर आदशौं, मूल्यों की स्थापना करना, संकीर्णता के वातावरण में मानवता के दम घोंटना-सा है। जो कुछ भी उपलब्धि है, वह चाहे जिस भू-भाग की उपज हो। महापुरुष विरोधी नहीं होते, एक-दूसरे के पूरक होते हैं। महापुरुष में अपने देश की विशेषता होती है। विवेकशील मनुष्य नम्रतापूर्वक महापुरुषों से शिक्षा ग्रहरण कर अपने जीवन को प्रकाशित करने का प्रयत्न करता है। समस्त मानवता उसके प्रति कृतज्ञ है। किन्तु अब हमें उनसे आगे बढ़ना चाहिए क्योंकि ज्ञान की इतिश्री नहीं होती। संसार एक खुली पाठशाला है, जीवन एक खुली पुस्तक है, विकास की क्रिया के मूल में मानव की पूर्ण बनने की अपनी प्रेरणा है। विकास के लिए समन्वय का भाव होना परम आवश्यक है। यदि हम विभिन्न विचारधाराओं एवं उनके जन्मदाता महापुरुषों का पूर्ण खण्डन करें तो विकास अवरुद्ध हो जायेगा। किसी धर्म विशेष या मान्यता के खूटे के साथ संकीर्ण भाव से बंधकर तथा परम्पराओं और रूढ़ियों से जकड़े हुए हम आगे नहीं बढ़ सकते। मानव को मानव रूप में सम्मानित करके ही हम जातीयता, प्रान्तीयता, क्षुद्र राष्ट्रीयता और अन्तर्राष्ट्रीयता के भेद को तोड़ सकते हैं। आज मानव, मानव से दूर हटता जा रहा है। वह भूल चुका है कि देश, धर्म और जाति के भिन्न होते हुए भी हम सर्वप्रथम मानव हैं और समान हैं तथा सभी की भावनाएं और लक्ष्य एक ही हैं। सत्ताधारी मनुष्य दूसरों को कुचलकर सुख- सुवध ाओं पर एकाधिकार कर लेना चाहता है लेकिन एक आकाश के नीचे रहने वाले इन्सान तो सब एक हैं भले ही कोई कुदाल लेकर श्रमिका का कार्य करता हो, कोई कलम लेकर दफ्तर का, किन्तु लक्ष्य एक है- समाज का अभ्युदय। मानव का नाता श्रेष्ठ नाता है। नौकर कहकर पुकारना मानो मानव का अपमान है। सहयोगी, सहायक अथवा सस्नेह उसके नाम से सम्बोधित करना मधुर है। जेल और फांसी का विध र मानवता का कलंक है। एक सीमा एक दण्ड भी आवश्यक होता है, लेकिन दण्ड का आतंक समाज को पंगु बना देता है। हमें अपराध वृत्ति का शमन करके अपराधी को शिष्ट एवं सभ्य मानव बनाना चाहिए। दया मानवता का सार है। दया छोड़कर सत्य भी सत्य नहीं है। दया प्रेरित असत्य भी व्यावहारिक सत्य नहीं है। दया धर्म मानवधर्म हैं। . प्रस्तुत गद्यांश मुख्यतः किस भावना से ओतप्रोत है?