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SOCIAL SCIENCE
18वीं सदी में मुद्रण|वाद-विवाद की संस्कृ...

18वीं सदी में मुद्रण|वाद-विवाद की संस्कृति|उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय शहतीय नए तकनिकी बदलाव|OMR

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18वीं सदी में मुद्रण|गुटेनबर्ग|उन्नीसवीं सदी का यूरोपीय साहित्य|भारत में मुद्रण का विकास|पुस्तकों की छपाई का आरंभ

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उन्नीसवी शताब्दी (1815-1914)|वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्माण|कॉर्न लॉ हटने के प्रभाव|तकनीक की भूमिका|मीट का व्यापार|उन्नीसवीं सदी का उत्तरार्ध और उपनिवेशवाद|OMR

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भाषा 'जातीय जीवन और उसकी संस्कृति की सर्वप्रधान रक्षिका है, वह उसके शील का दर्पण है, वह उसके विकास का वैभव है। भाषा जीती, और सब जीत लिया। फिर कुछ भी जीतने के लिए शेष नहीं रह जाता। विजितों का अस्तित्व मिट चलता है। विजितों के मुँह से निकली हुई विजयीजनों की भाषा उनकी दासता की सबसे बड़ी चिन्हानी है। पराई भाषा चरित्र की दृढ़ता का अपहरण कर लेती है, मौलिकता का विनाश कर देती है और नकल करने का स्वभाव बना करके उत्कृष्ट गुणों और प्रतिभा से नमस्कार करा देती है। इसीलिए, जो देश दुर्भाग्य से पराधीन हो जाते हैं, वे उस समय तक, जब तक कि वे अपना सब कुछ नहीं खो देते, अपनी भाषा की रक्षा के लिए सदा लोहा लेते रहना अपना कर्तव्य समझते हैं। अनेक यूरोपीय देशों के इतिहास भाषा-संग्राम की घटनाओं से भरे पड़े हैं। प्राचीन रोम साम्राज्य से लेकर अब तक के रूस, जर्मन, इटैलियन, आस्ट्रियन, फ्रेंच और ब्रिटिश सभी साम्राज्यों ने अपने अधीन देशों की भाषा पर अपनी विजय-वैजयंती फहरायी। भाषा-विजयी का यह काम सहज से नहीं हो गया। भाषा-समरस्थली के एक-एक इंच स्थान के लिए बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ हुई। देश की स्वाधीनता के लिए मर मिटने वाले अनेक वीर-पुंगवों के समयों में इस विचार का स्थान सदा ऊँचा रहा है कि देश की भौगोलिक सीमा की अपेक्षा मातृभाषा की सीमा की रक्षा की अधिक आवश्यकता है। वे अनुभव करते थे कि भाषा बची रहेगी तो देश का अस्तित्व और उसकी आत्मा बची रहेगी, अन्यथा फिर कहीं उसका कुछ भी पता न लगेगा। लेखक के अनुसार जातीय जीवन की रक्षिका कौन है?