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भारत-चीन युद्ध 1962|चीन द्वारा एकतरफा यु...

भारत-चीन युद्ध 1962|चीन द्वारा एकतरफा युद्ध-विराम की घोषणा के कारण |भारत पाकिस्तान युद्ध 1965|संयुक्त राष्ट्र संघ हस्तक्षेप |युद्ध के परिणाम |ताशकन्द समझौता |ताशकन्द समझौते की शर्ते |OMR

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द इंटर वॉर इकोनॉमिक|युद्ध काल की अर्थव्यवस्था|युद्ध के बाद के सुधार|युद्ध के बाद के समझौते|ब्रेटन वुड्स इंस्टिच्यूशन|युद्ध के बाद के शुरुआती साल|उपनिवेशों का अंत और आजादी|OMR

द इंटर वॉर इकोनॉमिक|युद्ध काल की अर्थव्यवस्था|युद्ध के बाद के सुधार|युद्ध के बाद के समझौते|ब्रेटन वुड्स इंस्टिच्यूशन|युद्ध के बाद के शुरुआती साल|उपनिवेशों का अंत और आजादी|OMR

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 14 साक्षी है इतिहास हमी पहले जागे है जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं। शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं? कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे हैं। हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का भी हृदया फिर एक बार हे विश्व तुम, गाओ भारत की विजय ।। कहाँ प्रकाशित नहीं रहा है तेज हमारा दलित कर चुके शत्रु सदा हम पैरों द्वारा। बताओ तुम कौन नहीं जो हमसे हारा पर शरणागत हुआ कहाँ, कब हमें न प्यारा बस युद्ध मात्र को छोड़कर, कहाँ नहीं हैं हम सदय फिर एक बार हे विश्व! तुम गाओ भारत की विजय कवि किसे भारत की जय-जयकार करने को कह रहा है?

संसार के सभी देशों में शिक्षित व्यक्ति की सबसे पहली पहचान यह होती है। कि वह अपनी मातृभाषा में दक्षता से काम कर सकता है। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जिसमें शिक्षित व्यक्ति वह समझा जाता है, जो अपनी मातृभाषा में दक्ष हो या न हो, किन्तु अंग्रेज़ी में जिसकी दक्षता असंदिग्ध हो। संसार के अन्य देशों में सुसंस्कृत व्यक्ति वह समझा जाता है, जिसके घर में । अपनी भाषा की पुस्तकों का संग्रह हो और जिसे बराबर यह पता रहे कि उसकी भाषा के अच्छे लेखक और कवि कौन हैं तथा समय-समय पर उनकी कौन-सी कृतियाँ प्रकाशित हो रही हैं? भारत में स्थिति दूसरी है। यहाँ घर में प्रायः साज-सज्जा के आधुनिक उपकरण तो होते हैं, किन्तु अपनी भाषा की कोई पुस्तक नहीं होती है। यह दुर्वस्था भले ही किसी ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, किन्तु वह सुदशा नहीं है दुर्वस्था ही है। इस दृष्टि से भारतीय भाषाओं के लेखक केवल यूरोपीय और अमेरिकी लेखकों से ही हीन नहीं हैं, बल्कि उनकी किस्मत चीन, जापान के लेखकों की किस्मत से भी खराब है, क्योंकि इन सभी लेखकों की कृतियाँ वहाँ के अत्यन्त सुशिक्षित लोग भी पढ़ते हैं। केवल हम ही नहीं हैं, जिनकी पुस्तकों पर यहाँ के तथाकथित शिक्षित समुदाय की दृष्टि प्राय: नहीं पड़ती। हमारा तथाकथित उच्च शिक्षित समुदाय जो कुछ पढ़ना चाहता है, उसे अंग्रेजी में ही । पढ़ लेता है यहाँ तक उसकी कविता और उपन्यास पढ़ने की तृष्णा भी अंग्रेजी की कविता और उपन्यास पढ़कर ही समाप्त हो जाती है और उसे यह जानने की इच्छा नहीं होती कि शरीर से वह जिस समाज का सदस्य है उसके मनोभाव उपन्यास और काव्य में किस अदा से व्यक्त हो रहे हैं। भारतीय भाषाओं के साहित्य के प्रति समाज के किस वर्ग में अरुचि की भावना है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 14 साक्षी है इतिहास हमी पहले जागे है जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं। शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं? कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे हैं। हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का भी हृदया फिर एक बार हे विश्व तुम, गाओ भारत की विजय ।। कहाँ प्रकाशित नहीं रहा है तेज हमारा दलित कर चुके शत्रु सदा हम पैरों द्वारा। बताओ तुम कौन नहीं जो हमसे हारा पर शरणागत हुआ कहाँ, कब हमें न प्यारा बस युद्ध मात्र को छोड़कर, कहाँ नहीं हैं हम सदय फिर एक बार हे विश्व! तुम गाओ भारत की विजय 'पहले जागे हैं' का भाव है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 14 साक्षी है इतिहास हमी पहले जागे है जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं। शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं? कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे हैं। हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का भी हृदया फिर एक बार हे विश्व तुम, गाओ भारत की विजय ।। कहाँ प्रकाशित नहीं रहा है तेज हमारा दलित कर चुके शत्रु सदा हम पैरों द्वारा। बताओ तुम कौन नहीं जो हमसे हारा पर शरणागत हुआ कहाँ, कब हमें न प्यारा बस युद्ध मात्र को छोड़कर, कहाँ नहीं हैं हम सदय फिर एक बार हे विश्व! तुम गाओ भारत की विजय 'हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का हृदय' से हमारी किस विशेषता का बोध होता है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 14 साक्षी है इतिहास हमी पहले जागे है जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं। शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं? कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे हैं। हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का भी हृदया फिर एक बार हे विश्व तुम, गाओ भारत की विजय ।। कहाँ प्रकाशित नहीं रहा है तेज हमारा दलित कर चुके शत्रु सदा हम पैरों द्वारा। बताओ तुम कौन नहीं जो हमसे हारा पर शरणागत हुआ कहाँ, कब हमें न प्यारा बस युद्ध मात्र को छोड़कर, कहाँ नहीं हैं हम सदय फिर एक बार हे विश्व! तुम गाओ भारत की विजय हमारी दयालुता प्रकट होती है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 14 साक्षी है इतिहास हमी पहले जागे है जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं। शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं? कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे हैं। हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का भी हृदया फिर एक बार हे विश्व तुम, गाओ भारत की विजय ।। कहाँ प्रकाशित नहीं रहा है तेज हमारा दलित कर चुके शत्रु सदा हम पैरों द्वारा। बताओ तुम कौन नहीं जो हमसे हारा पर शरणागत हुआ कहाँ, कब हमें न प्यारा बस युद्ध मात्र को छोड़कर, कहाँ नहीं हैं हम सदय फिर एक बार हे विश्व! तुम गाओ भारत की विजय 'हमारे आगे सबका जाग्रत होना' का भाव है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 14 साक्षी है इतिहास हमी पहले जागे है जाग्रत सब हो रहे हमारे ही आगे हैं। शत्रु हमारे कहाँ नहीं भय से भागे हैं? कायरता से कहाँ प्राण हमने त्यागे हैं। हैं हमीं प्रकम्पित कर चुके, सुरपति तक का भी हृदया फिर एक बार हे विश्व तुम, गाओ भारत की विजय ।। कहाँ प्रकाशित नहीं रहा है तेज हमारा दलित कर चुके शत्रु सदा हम पैरों द्वारा। बताओ तुम कौन नहीं जो हमसे हारा पर शरणागत हुआ कहाँ, कब हमें न प्यारा बस युद्ध मात्र को छोड़कर, कहाँ नहीं हैं हम सदय फिर एक बार हे विश्व! तुम गाओ भारत की विजय 'शत्रु' शब्द का विपरीतार्थक है