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कोरोना के बाद ब्लैक फंगस का कहर शुरू हुआ...

कोरोना के बाद ब्लैक फंगस का कहर शुरू हुआ | Black Fungus Kya Hai | Black Fungus Symptoms | #facttechz

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A can do 40% of a work in 6 days and B can do 30% of the same work in 3 days. They started the work together but B left after 2 days and A continued to work. In how many days was the entire work completed ? A किसी कार्य का 40% भाग 6 दिनों में तथा B इसी कार्य का 30% भाग 3 दिनों में पूरा कर सकता है | उन्होंने एक साथ कार्य शुरू किया लेकिन 2 दिनों के बाद B हट गया और A ने कार्य जारी रखा | पूरा कार्य कितने दिनों में समाप्त हुआ ?

25 persons can complete a work in 60 days. They started the work. 10 people left the work after x days. If the whole work was completed in 80 days, then what is the value of x ? 25 व्यक्ति किसी कार्य को 60 दिनों में पूरा कर सकते हैं | उन्होंने कार्य शुरू किया | x दिनों के बाद 10 लोगों ने कार्य छोड़ दिया | यदि पूरा कार्य 80 दिनों में पूरा हुआ, तो x का मान ज्ञात करें |

मेरे बड़े भाई साहब मुझसे पाँच साल बड़े थे, लेकिन केवल तीन दरजे आगे। उन्होंने भी उसी उम्र में पढ़ना शुरू किया था, जब मैंने शुरू किया, लेकिन तालीम जैसे महत्त्वपूर्ण मामले में वह जल्दबाजी से काम लेना पसंद नहीं करते थे, इस भवन की बुनियाद खूब मज़बूत डालना चाहते थे, जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुखता न हो तो मकान कैसे पायेदार बने। मैं छोटा था, वह बड़े थे। मेरी उम्र नौ साल की थी, वे चौदह साल के थे। उन्हें मेरी निगरानी का पूरा और जन्मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इस बात में थी कि मैं उनके हुक्म को कानून समझू। वह स्वभाव के बड़े अध्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कॉपी पर, कभी किताब के हाशियों पर, चिड़ियो, कुत्तों, बिल्लियों की डालते थे। कभी एक ही शायरी को बार-बार सुंदर अक्षरों में नकल करते थे। कभी ऐसी शब्द-रचना करते जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्य। जैसे एक बार उनकी कॉपी पर मैंने इबारत देखी-स्पेशल, अमीना, भाइयों-भाईयो, भाई-भाई, श्रीयुत् राधेश्याम--इनके बाद आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने बहुत चेष्टा की कि इस पहेली का कोई हल निकालूँ, लेकिन असफल रहा ओर उनसे पूछने का साहस न हुआ। वे नवीं कक्षा में थे, मैं पाँचवी में। उनकी रचनाओं को समझना मेरे लिए छोटा मुँह और बड़ी बात थी। 'सामंजस्य' शब्द का समानार्थी है।

मेरे बड़े भाई साहब मुझसे पाँच साल बड़े थे, लेकिन केवल तीन दरजे आगे। उन्होंने भी उसी उम्र में पढ़ना शुरू किया था, जब मैंने शुरू किया, लेकिन तालीम जैसे महत्त्वपूर्ण मामले में वह जल्दबाजी से काम लेना पसंद नहीं करते थे, इस भवन की बुनियाद खूब मज़बूत डालना चाहते थे, जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुखता न हो तो मकान कैसे पायेदार बने। मैं छोटा था, वह बड़े थे। मेरी उम्र नौ साल की थी, वे चौदह साल के थे। उन्हें मेरी निगरानी का पूरा और जन्मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इस बात में थी कि मैं उनके हुक्म को कानून समझू। वह स्वभाव के बड़े अध्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कॉपी पर, कभी किताब के हाशियों पर, चिड़ियो, कुत्तों, बिल्लियों की डालते थे। कभी एक ही शायरी को बार-बार सुंदर अक्षरों में नकल करते थे। कभी ऐसी शब्द-रचना करते जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्य। जैसे एक बार उनकी कॉपी पर मैंने इबारत देखी-स्पेशल, अमीना, भाइयों-भाईयो, भाई-भाई, श्रीयुत् राधेश्याम--इनके बाद आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने बहुत चेष्टा की कि इस पहेली का कोई हल निकालूँ, लेकिन असफल रहा ओर उनसे पूछने का साहस न हुआ। वे नवीं कक्षा में थे, मैं पाँचवी में। उनकी रचनाओं को समझना मेरे लिए छोटा मुँह और बड़ी बात थी। 'तालीम' शब्द है

मेरे बड़े भाई साहब मुझसे पाँच साल बड़े थे, लेकिन केवल तीन दरजे आगे। उन्होंने भी उसी उम्र में पढ़ना शुरू किया था, जब मैंने शुरू किया, लेकिन तालीम जैसे महत्त्वपूर्ण मामले में वह जल्दबाजी से काम लेना पसंद नहीं करते थे, इस भवन की बुनियाद खूब मज़बूत डालना चाहते थे, जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुखता न हो तो मकान कैसे पायेदार बने। मैं छोटा था, वह बड़े थे। मेरी उम्र नौ साल की थी, वे चौदह साल के थे। उन्हें मेरी निगरानी का पूरा और जन्मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इस बात में थी कि मैं उनके हुक्म को कानून समझू। वह स्वभाव के बड़े अध्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कॉपी पर, कभी किताब के हाशियों पर, चिड़ियो, कुत्तों, बिल्लियों की डालते थे। कभी एक ही शायरी को बार-बार सुंदर अक्षरों में नकल करते थे। कभी ऐसी शब्द-रचना करते जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्य। जैसे एक बार उनकी कॉपी पर मैंने इबारत देखी-स्पेशल, अमीना, भाइयों-भाईयो, भाई-भाई, श्रीयुत् राधेश्याम--इनके बाद आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने बहुत चेष्टा की कि इस पहेली का कोई हल निकालूँ, लेकिन असफल रहा ओर उनसे पूछने का साहस न हुआ। वे नवीं कक्षा में थे, मैं पाँचवी में। उनकी रचनाओं को समझना मेरे लिए छोटा मुँह और बड़ी बात थी। उम्र में पांच साल का और पढ़ाई में दो कक्षाओं का अंतर बताता है कि

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