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शाहरुख खान...

शाहरुख खान

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विविध प्रांत हैं अपनी-अपनी भाषा के अभिमानी हम, पर इन सबसे पहले दुनियावालो हिन्दुस्तानी हम। रहन-सहन में, खान-पान में, भिन्न भले ही हों कितने, इस मिट्टी को देते आए, मिल-जुलकर कुरबानी हम। सदियों से कुचले लाखों तूफान हमने पद तल से, आज झुके कुछ टकराकर तो कल लगते फिर जागे से। अंडमन से कश्मीर भले ही दूर दिखाई दे कितना, पर हर प्रांत जुड़ा है अपना अगणित कोमल धागों से। जिस ओर बढ़ाए पग हमने, हो गई उधर भू नव मंगला आजाद वतन के बाशिंदे, हर चरण हमारा है बादल।। समास की दृष्टि से शेष से भिन्न पद है

विविध प्रांत हैं अपनी-अपनी भाषा के अभिमानी हम, पर इन सबसे पहले दुनियावालो हिन्दुस्तानी हम। रहन-सहन में, खान-पान में, भिन्न भले ही हों कितने, इस मिट्टी को देते आए, मिल-जुलकर कुरबानी हम। सदियों से कुचले लाखों तूफान हमने पद तल से, आज झुके कुछ टकराकर तो कल लगते फिर जागे से। अंडमन से कश्मीर भले ही दूर दिखाई दे कितना, पर हर प्रांत जुड़ा है अपना अगणित कोमल धागों से। जिस ओर बढ़ाए पग हमने, हो गई उधर भू नव मंगला आजाद वतन के बाशिंदे, हर चरण हमारा है बादल।। “सदियों से कुचले लाखों तूफान हमने पद तल से" कथन में तूफान का भाव है -

विविध प्रांत हैं अपनी-अपनी भाषा के अभिमानी हम, पर इन सबसे पहले दुनियावालो हिन्दुस्तानी हम। रहन-सहन में, खान-पान में, भिन्न भले ही हों कितने, इस मिट्टी को देते आए, मिल-जुलकर कुरबानी हम। सदियों से कुचले लाखों तूफान हमने पद तल से, आज झुके कुछ टकराकर तो कल लगते फिर जागे से। अंडमन से कश्मीर भले ही दूर दिखाई दे कितना, पर हर प्रांत जुड़ा है अपना अगणित कोमल धागों से। जिस ओर बढ़ाए पग हमने, हो गई उधर भू नव मंगला आजाद वतन के बाशिंदे, हर चरण हमारा है बादल।। 'अंडमान से कश्मीर' हैं, भारत में

विविध प्रांत हैं अपनी-अपनी भाषा के अभिमानी हम, पर इन सबसे पहले दुनियावालो हिन्दुस्तानी हम। रहन-सहन में, खान-पान में, भिन्न भले ही हों कितने, इस मिट्टी को देते आए, मिल-जुलकर कुरबानी हम। सदियों से कुचले लाखों तूफान हमने पद तल से, आज झुके कुछ टकराकर तो कल लगते फिर जागे से। अंडमन से कश्मीर भले ही दूर दिखाई दे कितना, पर हर प्रांत जुड़ा है अपना अगणित कोमल धागों से। जिस ओर बढ़ाए पग हमने, हो गई उधर भू नव मंगला आजाद वतन के बाशिंदे, हर चरण हमारा है बादल।। हम भारतीय जिधर भी अपने कदम बढ़ाते हैं वहाँ

विविध प्रांत हैं अपनी-अपनी भाषा के अभिमानी हम, पर इन सबसे पहले दुनियावालो हिन्दुस्तानी हम। रहन-सहन में, खान-पान में, भिन्न भले ही हों कितने, इस मिट्टी को देते आए, मिल-जुलकर कुरबानी हम। सदियों से कुचले लाखों तूफान हमने पद तल से, आज झुके कुछ टकराकर तो कल लगते फिर जागे से। अंडमन से कश्मीर भले ही दूर दिखाई दे कितना, पर हर प्रांत जुड़ा है अपना अगणित कोमल धागों से। जिस ओर बढ़ाए पग हमने, हो गई उधर भू नव मंगला आजाद वतन के बाशिंदे, हर चरण हमारा है बादल।। “पैर शब्द का समानार्थी नहीं है?

विविध प्रांत हैं अपनी-अपनी भाषा के अभिमानी हम, पर इन सबसे पहले दुनियावालो हिन्दुस्तानी हम। रहन-सहन में, खान-पान में, भिन्न भले ही हों कितने, इस मिट्टी को देते आए, मिल-जुलकर कुरबानी हम। सदियों से कुचले लाखों तूफान हमने पद तल से, आज झुके कुछ टकराकर तो कल लगते फिर जागे से। अंडमन से कश्मीर भले ही दूर दिखाई दे कितना, पर हर प्रांत जुड़ा है अपना अगणित कोमल धागों से। जिस ओर बढ़ाए पग हमने, हो गई उधर भू नव मंगला आजाद वतन के बाशिंदे, हर चरण हमारा है बादल।। कविता के अनुसार विविधताओं के बीच भी हम एक है, क्योंकि सबसे पहले हम