इस घटना ने विज्ञानिको के भी होश उड़ा दिए | Most Horrifying Natural Phenomena In The World- TEF Ep 129
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हेवल घाटी के गाँववासियों ने चीड़ के पेड़ों के हो रहे विनाश के विरुद्ध जुलूस निकाले। घास-चारा लेने जा रही महिलाओं ने इन पेड़ों से लीसा टपकाने के लिए लगाए गए लोहे निकाल दिए व उनके स्थान पर मिट्टी की मरहम-पट्टी कर दी। महिलाओं ने पेड़ों का रक्षा-बंधन भी किया। आरंभ से ही लगा कि वृक्ष बचाने में महिलाएं आगे आएँगी। वन कटने का सबसे अधिक कष्ट उन्हीं को उठाना पड़ता है, क्योंकि घास-चारा लाने के लिए उन्हें और दूर जाना पड़ता है। कठिन स्थानों से घास-चारा एकत्र करने में कई बार उन्हें बहुत चोट लग जाती है। वैसे भी पहाड़ी रास्तों पर घास-चारा का बोझ लेकर पाँच-दस किमी या उससे भी ज्यादा चलना बहत कठिनावही जाता है। इस आंदोलन की बात ऊँचे अधिकारियों तक पहुंची तो । उन्हें लीसा प्राप्त करने के तौर-तरीकों की जाँच करवानी पड़ी। जाँच से स्पष्ट हो गया कि बहुत अधिक लीसा निकलने के लालच में चीड़ के पेड़ों को बहुत नुकसान हुआ है। इन अनुचित तरीकों पर रोक लगी। चीड़ के घायल पेड़ों को आराम मिला एक नया जीवन मिला। पर तभी खबर मिली कि इस इलाके के बहुत से पेड़ों को.कटाई के लिए नीलाम किया जा रहा है। लोगों ने पहले तो अधि' व कारियों को ज्ञापन दिया कि जहाँ पहले से ही घास-चारे का संकट है, वहाँ और व्यापारिक कटान न किया जाए। जब अधिकारियों ने दु गाँववासियों की मांग पर ध्यान न देते हुए नरेन्द्रनगर में नीलामी की ग घोषणा कर दी, तो गाँववासी जुलूस बनाकर वहाँ नीलामी का विरोध करते हुए पहुँच गए। वहां एकत्र ठेकेदारों से/ हवेल घाटी की . महिलाओं ने कहा, ''आप इन पेड़ों को काटकर हमारी रोजी-रोटी मत छीनो। पेड़ कटने से यहां बाढ़ व भू-स्खलन का खतरा भी बढ़ जाएगा।" कुछ ठेकेदारों ने तो वास्तव में वह बात मानी पर कुछ अन्य ठेकेदारों ने अद्वानी और सलेत के जंगल. खरीद लिए। महिलाओं ने पेड़ों का रक्षा-बंधन क्यों किया?
हेवल घाटी के गाँववासियों ने चीड़ के पेड़ों के हो रहे विनाश के विरुद्ध जुलूस निकाले। घास-चारा लेने जा रही महिलाओं ने इन पेड़ों से लीसा टपकाने के लिए लगाए गए लोहे निकाल दिए व उनके स्थान पर मिट्टी की मरहम-पट्टी कर दी। महिलाओं ने पेड़ों का रक्षा-बंधन भी किया। आरंभ से ही लगा कि वृक्ष बचाने में महिलाएं आगे आएँगी। वन कटने का सबसे अधिक कष्ट उन्हीं को उठाना पड़ता है, क्योंकि घास-चारा लाने के लिए उन्हें और दूर जाना पड़ता है। कठिन स्थानों से घास-चारा एकत्र करने में कई बार उन्हें बहुत चोट लग जाती है। वैसे भी पहाड़ी रास्तों पर घास-चारा का बोझ लेकर पाँच-दस किमी या उससे भी ज्यादा चलना बहत कठिनावही जाता है। इस आंदोलन की बात ऊँचे अधिकारियों तक पहुंची तो । उन्हें लीसा प्राप्त करने के तौर-तरीकों की जाँच करवानी पड़ी। जाँच से स्पष्ट हो गया कि बहुत अधिक लीसा निकलने के लालच में चीड़ के पेड़ों को बहुत नुकसान हुआ है। इन अनुचित तरीकों पर रोक लगी। चीड़ के घायल पेड़ों को आराम मिला एक नया जीवन मिला। पर तभी खबर मिली कि इस इलाके के बहुत से पेड़ों को.कटाई के लिए नीलाम किया जा रहा है। लोगों ने पहले तो अधि' व कारियों को ज्ञापन दिया कि जहाँ पहले से ही घास-चारे का संकट है, वहाँ और व्यापारिक कटान न किया जाए। जब अधिकारियों ने दु गाँववासियों की मांग पर ध्यान न देते हुए नरेन्द्रनगर में नीलामी की ग घोषणा कर दी, तो गाँववासी जुलूस बनाकर वहाँ नीलामी का विरोध करते हुए पहुँच गए। वहां एकत्र ठेकेदारों से/ हवेल घाटी की . महिलाओं ने कहा, ''आप इन पेड़ों को काटकर हमारी रोजी-रोटी मत छीनो। पेड़ कटने से यहां बाढ़ व भू-स्खलन का खतरा भी बढ़ जाएगा।" कुछ ठेकेदारों ने तो वास्तव में वह बात मानी पर कुछ अन्य ठेकेदारों ने अद्वानी और सलेत के जंगल. खरीद लिए। वन काटने का सबसे अधिक कष्ट महिलाओं को क्यों उठाना पड़ता है?
हेवल घाटी के गाँववासियों ने चीड़ के पेड़ों के हो रहे विनाश के विरुद्ध जुलूस निकाले। घास-चारा लेने जा रही महिलाओं ने इन पेड़ों से लीसा टपकाने के लिए लगाए गए लोहे निकाल दिए व उनके स्थान पर मिट्टी की मरहम-पट्टी कर दी। महिलाओं ने पेड़ों का रक्षा-बंधन भी किया। आरंभ से ही लगा कि वृक्ष बचाने में महिलाएं आगे आएँगी। वन कटने का सबसे अधिक कष्ट उन्हीं को उठाना पड़ता है, क्योंकि घास-चारा लाने के लिए उन्हें और दूर जाना पड़ता है। कठिन स्थानों से घास-चारा एकत्र करने में कई बार उन्हें बहुत चोट लग जाती है। वैसे भी पहाड़ी रास्तों पर घास-चारा का बोझ लेकर पाँच-दस किमी या उससे भी ज्यादा चलना बहत कठिनावही जाता है। इस आंदोलन की बात ऊँचे अधिकारियों तक पहुंची तो । उन्हें लीसा प्राप्त करने के तौर-तरीकों की जाँच करवानी पड़ी। जाँच से स्पष्ट हो गया कि बहुत अधिक लीसा निकलने के लालच में चीड़ के पेड़ों को बहुत नुकसान हुआ है। इन अनुचित तरीकों पर रोक लगी। चीड़ के घायल पेड़ों को आराम मिला एक नया जीवन मिला। पर तभी खबर मिली कि इस इलाके के बहुत से पेड़ों को.कटाई के लिए नीलाम किया जा रहा है। लोगों ने पहले तो अधि' व कारियों को ज्ञापन दिया कि जहाँ पहले से ही घास-चारे का संकट है, वहाँ और व्यापारिक कटान न किया जाए। जब अधिकारियों ने दु गाँववासियों की मांग पर ध्यान न देते हुए नरेन्द्रनगर में नीलामी की ग घोषणा कर दी, तो गाँववासी जुलूस बनाकर वहाँ नीलामी का विरोध करते हुए पहुँच गए। वहां एकत्र ठेकेदारों से/ हवेल घाटी की . महिलाओं ने कहा, ''आप इन पेड़ों को काटकर हमारी रोजी-रोटी मत छीनो। पेड़ कटने से यहां बाढ़ व भू-स्खलन का खतरा भी बढ़ जाएगा।" कुछ ठेकेदारों ने तो वास्तव में वह बात मानी पर कुछ अन्य ठेकेदारों ने अद्वानी और सलेत के जंगल. खरीद लिए। चीड़ के पेड़ों को किससे बहुत नुकसान हो रहा था?
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