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भिड़े का खून हों गया ?| Taarak Mehta ka ooltah chashma Paheliyan (Hindi) puzzles with answer #shorts

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हमारे देश में एक ऐसा भी युग था जब नैतिक और आध्यात्मिक विकास ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य माना जाता था। अहिंसा की भावना सर्वोपरि थी। आज पूरा जीवन-दर्शन ही बदल गया है। सर्वत्र पैसे की हाय-हाय तथा धन का उपार्जन ही मुख्य ध्येय हो गया है. भले ही धन-उपार्जन के तरीके गलत ही क्यों न हों। इन सबका असर मनुष्य के प्रतिदिन के जीवन पर पड़ रहा है। समाज का वातावरण दूषित हो गया है। इन सबके कारण मानसिक और शारीरिक तनाव-खिंचाव और व्याधियाँ पैदा हो रही हैं। आज आदमी धन के पोछे अंधाधुंध दौड़ रहा है। पाँच रूपये मिलने पर दस, दस मिलने पर सौ और सौ मिलने पर हज़ार की लालसा लिए वह इस अंधी दौड़ में शामिल है। इस दौड़ का कोई अंत नहीं। धन की इस दौड़ में सभी पारिवारिक और मानवीय संबंध पीछे छूट गए हैं। व्यक्ति सत्य-असत्य, उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय और अपने-पराए के भेद-भाव को भूल गया। उसके पास अपनी पत्नी और संतान के लिए समय नहीं। धन के लिए पुत्र का पिता के साथ, बेटी का माँ के साथ और पति का पत्नी के साथ झगड़ा हो रहा है। भाई-भाई के खून का प्यासा है। धन की लालसा व्यक्ति को जघन्य से जघन्य कार्य करने के लिए उकसा रही है। इस लालसा का ही परिणाम है कि जगह-जगह हत्या, लूट, अपहरण और चोरी-डकैती की घटनाएँ बढ़ रही हैं। इस रोगी मनोवृत्ति को बदलने के लिए हमें हर स्तर पर प्रयत्न करमे होंगे। आज पूरा जीवन दर्शन बदल गया है। उक्त कथन का आशय है __________

हमारे देश में एक ऐसा भी युग था जब नैतिक और आध्यात्मिक विकास ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य माना जाता था। अहिंसा की भावना सर्वोपरि थी। आज पूरा जीवन-दर्शन ही बदल गया है। सर्वत्र पैसे की हाय-हाय तथा धन का उपार्जन ही मुख्य ध्येय हो गया है. भले ही धन-उपार्जन के तरीके गलत ही क्यों न हों। इन सबका असर मनुष्य के प्रतिदिन के जीवन पर पड़ रहा है। समाज का वातावरण दूषित हो गया है। इन सबके कारण मानसिक और शारीरिक तनाव-खिंचाव और व्याधियाँ पैदा हो रही हैं। आज आदमी धन के पोछे अंधाधुंध दौड़ रहा है। पाँच रूपये मिलने पर दस, दस मिलने पर सौ और सौ मिलने पर हज़ार की लालसा लिए वह इस अंधी दौड़ में शामिल है। इस दौड़ का कोई अंत नहीं। धन की इस दौड़ में सभी पारिवारिक और मानवीय संबंध पीछे छूट गए हैं। व्यक्ति सत्य-असत्य, उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय और अपने-पराए के भेद-भाव को भूल गया। उसके पास अपनी पत्नी और संतान के लिए समय नहीं। धन के लिए पुत्र का पिता के साथ, बेटी का माँ के साथ और पति का पत्नी के साथ झगड़ा हो रहा है। भाई-भाई के खून का प्यासा है। धन की लालसा व्यक्ति को जघन्य से जघन्य कार्य करने के लिए उकसा रही है। इस लालसा का ही परिणाम है कि जगह-जगह हत्या, लूट, अपहरण और चोरी-डकैती की घटनाएँ बढ़ रही हैं। इस रोगी मनोवृत्ति को बदलने के लिए हमें हर स्तर पर प्रयत्न करमे होंगे। प्राचीनकाल में जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या माना गया था?

हमारे देश में एक ऐसा भी युग था जब नैतिक और आध्यात्मिक विकास ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य माना जाता था। अहिंसा की भावना सर्वोपरि थी। आज पूरा जीवन-दर्शन ही बदल गया है। सर्वत्र पैसे की हाय-हाय तथा धन का उपार्जन ही मुख्य ध्येय हो गया है. भले ही धन-उपार्जन के तरीके गलत ही क्यों न हों। इन सबका असर मनुष्य के प्रतिदिन के जीवन पर पड़ रहा है। समाज का वातावरण दूषित हो गया है। इन सबके कारण मानसिक और शारीरिक तनाव-खिंचाव और व्याधियाँ पैदा हो रही हैं। आज आदमी धन के पोछे अंधाधुंध दौड़ रहा है। पाँच रूपये मिलने पर दस, दस मिलने पर सौ और सौ मिलने पर हज़ार की लालसा लिए वह इस अंधी दौड़ में शामिल है। इस दौड़ का कोई अंत नहीं। धन की इस दौड़ में सभी पारिवारिक और मानवीय संबंध पीछे छूट गए हैं। व्यक्ति सत्य-असत्य, उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय और अपने-पराए के भेद-भाव को भूल गया। उसके पास अपनी पत्नी और संतान के लिए समय नहीं। धन के लिए पुत्र का पिता के साथ, बेटी का माँ के साथ और पति का पत्नी के साथ झगड़ा हो रहा है। भाई-भाई के खून का प्यासा है। धन की लालसा व्यक्ति को जघन्य से जघन्य कार्य करने के लिए उकसा रही है। इस लालसा का ही परिणाम है कि जगह-जगह हत्या, लूट, अपहरण और चोरी-डकैती की घटनाएँ बढ़ रही हैं। इस रोगी मनोवृत्ति को बदलने के लिए हमें हर स्तर पर प्रयत्न करमे होंगे। किस दौड़ को अंतहीन माना गया है?

हमारे देश में एक ऐसा भी युग था जब नैतिक और आध्यात्मिक विकास ही जीवन का वास्तविक लक्ष्य माना जाता था। अहिंसा की भावना सर्वोपरि थी। आज पूरा जीवन-दर्शन ही बदल गया है। सर्वत्र पैसे की हाय-हाय तथा धन का उपार्जन ही मुख्य ध्येय हो गया है. भले ही धन-उपार्जन के तरीके गलत ही क्यों न हों। इन सबका असर मनुष्य के प्रतिदिन के जीवन पर पड़ रहा है। समाज का वातावरण दूषित हो गया है। इन सबके कारण मानसिक और शारीरिक तनाव-खिंचाव और व्याधियाँ पैदा हो रही हैं। आज आदमी धन के पोछे अंधाधुंध दौड़ रहा है। पाँच रूपये मिलने पर दस, दस मिलने पर सौ और सौ मिलने पर हज़ार की लालसा लिए वह इस अंधी दौड़ में शामिल है। इस दौड़ का कोई अंत नहीं। धन की इस दौड़ में सभी पारिवारिक और मानवीय संबंध पीछे छूट गए हैं। व्यक्ति सत्य-असत्य, उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय और अपने-पराए के भेद-भाव को भूल गया। उसके पास अपनी पत्नी और संतान के लिए समय नहीं। धन के लिए पुत्र का पिता के साथ, बेटी का माँ के साथ और पति का पत्नी के साथ झगड़ा हो रहा है। भाई-भाई के खून का प्यासा है। धन की लालसा व्यक्ति को जघन्य से जघन्य कार्य करने के लिए उकसा रही है। इस लालसा का ही परिणाम है कि जगह-जगह हत्या, लूट, अपहरण और चोरी-डकैती की घटनाएँ बढ़ रही हैं। इस रोगी मनोवृत्ति को बदलने के लिए हमें हर स्तर पर प्रयत्न करमे होंगे। 'जघन्य' शब्द का अर्थ नहीं है