IND क्रिकेटर्स के पास पैसे की कमी नहीं फिर भी सरकारी नौकरी करते है❓?Indian Cricketers #FACTS #Shorts
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राजनीतिक बहसों की गरमी में हम जो भी कहें, अपने राष्ट्रीय र अभिमान की अभिव्यक्ति में हम जितना भी जोर से चीखे, सक्रिय राष्ट्रीय सेवा के प्रति हम अत्यंत उदासीन रहते हैं, क्योंकि हमारा देशात प्रकाश से हीन है। मानव स्वभाव में निहित कंजूसी को कारण जिन्हें हमने नीचा रख छोड़ा है, उनके प्रति अन्यास-से-हम बच ही नहीं है सकते। समय-समय पर उनके नाम पर हम पैसा इकट्ठा करते हैं, लेकिन उनके हिस्से में शब्द ही आते हैं, पैसा तो अंततः हमारी पार्टी , के ही लोगों के पास पहुंचता है। संक्षेप में, जिनके पास बुद्धि, शिक्षा, समृद्धि और सम्मान है, हमारे देश के उस अत्यंत छोटे हिस्से, पाँच प्रतिशत और आबादी के अन्य पंचानवे प्रतिशत के बीच की दूरी समुंदर से भी अधिक चौड़ी है। लेखक के अनुसार हम किनके प्रति अन्याय करते हैं?
निर्देशः गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। राजनीतिक बहसों की गरमी में हम जो भी कहें, अपने राष्ट्रीय अभिमान की अभिव्यक्ति में हम जितना भी जोर से चीखें, सक्रिय राष्ट्रीय सेवा के प्रति हम अत्यंत उदासीन रहते हैं, क्योंकि हमारा देश प्रकाश से हीन है। मानव स्वभाव में निहित कंजूसी के कारण जिन्हें हमने नीचा रख छोड़ा है, उनके प्रति अन्यास से हम बच ही नहीं सकते। समय-समय पर उनके नाम पर हम पैसा इकट्ठा करते हैं, लेकिन उनके हिस्से में शब्द ही आते हैं, पैसा तो अंततः हमारी पार्टी के ही लोगों के पास पहुँचता है। संक्षेप में, जिनके पास बुद्धि, शिक्षा, समृद्धि और सम्मान है, हमारे देश के उस अत्यंत छोटे हिस्से, पाँच प्रतिशत और आबादी के अन्य पंचानवे प्रतिशत के बीच की दूरी समुंदर से भी अधिक चौड़ी है। लेखक के अनुसार हम किनके प्रति अन्याय करते हैं?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। राजनीतिक बहसों की गरमी में हम जो भी कहें, अपने राष्ट्रीय अभिमान की अभिव्यक्ति में हम जितना भी जोर से चीखें, सक्रिय राष्ट्रीय सेवा के प्रति हम अत्यंत उदासीन रहते हैं, क्योंकि हमारा देश प्रकाश से हीन है। मानव स्वभाव में निहित कंजूसी के कारण जिन्हें हमने नीचे रख छोड़ा है, उनके प्रति अन्यास से हम बच ही नहीं सकते। समय-समय पर उनके नाम पर हम पैसा इकट्ठा करते हैं, लेकिन उनके हिस्से में शब्द ही आते हैं, पैसा तो अंतत: हमारी पार्टी के ही लोगों के पास पहुँचता है। संक्षेप में, जिनके पास बुद्धि, शिक्षा, समृद्धि और सम्मान है, हमारे देश के उस अत्यंत छोटे हिस्से, पाँच प्रतिशत और आबादी के अन्य पंचानवे प्रतिशत के बीच की दूरी समुंदर से भी अधिक चौड़ी है। लेखक के अनुसार हम किनके प्रति अन्याय करते हैं?
गद्यांश को पढ़कर प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। आसमान में मुक्का मारना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं समझा जाता। बिना लक्ष्य के तर्क करना भी बुद्धिमानी नहीं है। हमें भली-भाँति समझ लेने की आवश्यकता है, कि हमारा लक्ष्य क्या है? हम जो कुछ प्रयत्न करने जा रहे हैं वह किसके लिए हैं? साहित्य हम किसके लिए रचते हैं, इतिहास और दर्शन क्यों लिखते और पढ़ते हैं? राजनीतिक,आन्दोलन किस महान् उद्देश्य की सिद्धि के लिए करते हैं? मनुष्य ही वह बड़ी चीज़ है जिसके लिए यह सब किया करते हैं। हमारे सब प्रयत्नों का एक लक्ष्य है, मनुष्य वर्तमान दुर्गति के पंक से उद्धार पाए और भविष्य में सुख और शांति से रह सके। यह शास्त्र, ग्रंथ, कला, नृत्य, राजनीति, समाज-सुधार जंजाल-मात्र हैं, जिससे मनुष्य का भला नहीं होता। मनुष्य आज हाहाकार के भीतर त्राहि-त्राहि पुकार रहा है। हमारे राजनीतिक और समाजिक सुधार से अन्न-वस्त्र की समस्या सुलझ सकती है फिर भी मनुष्य सुखी नहीं बनेगा। उसे सिर्फ अन्न-वस्त्र से ही संतोष नहीं होगा। इसके बाद भी उसका मनुष्य बनना बाकी रह जाता है। साहित्य वही काम करता है। मनुष्य नामक प्राणी पशुओं में ही एक विकसित प्रजाति है और यदि मनुष्यता के गुण और मूल्य उसमें नही हैं तो वह मनुष्य नामक पशु ही है, मनुष्य नहीं। भोजन करना, सोना और वंश-वृद्धि जैसे काम प्रकृति के द्वारा तय है, सच्चा मानव बनने के लिए उसे जो दृष्टि चाहिए, उसे पाने में साहित्य सहायक हो सकता है। मनुष्य के लिए प्रकृति द्वारा तय कामों में नहीं है
कुछ लाख वर्ष पहले की बात है जब मनुष्य जंगली था, वनमानुष जैसा उसे नाख़ून की जरुरत थी उसकी जीवन रक्षा के लिए नाख़ून बहुत ज़रूरी थे असल में वही उसके अस्त्र थे दाँत भी थे पर नाख़ून के बाद ही उनका स्थान था उन दिनों उसे झूझना पड़ता था प्रतिद्वन्दियो को पछाड़ना पड़ता था नाख़ून उसके लिए आवश्यक अंग था फिर वह अपने अंग से बाहर की वस्तुओ का सहारा लेने लग। पत्थर के ढेले और पेड़ की डाले काम में लाने लगा (रामचन्द्रजी की वानरी सेना के पास ऐसे ही अस्त्र थे) ! उसने हड्डियों के भी हथियार बनाये! इन हड्डी के हथियार में सबसे मजबूत और सब से ऐतिहासिक था इन्द्र देव का वज्र, जो ऋषि मुनि की हड्डियों से बना था मनुष्य और आगे बढ़ा उसने धातु के हथियार बनाये जिनके पास लोहे के अस्त्र और शस्त्र थे वे विजयी हुए। देवताओ के राजा तक को मनुष्ये के राजा से इसलिए सहायता लेनी पड़ती थी क्यूंकि मनुष्ये के राजा के पास लोहे के अस्त्र थे असुरो के पास अनेक विधाये थी पर लोहे के अस्त्र नहीं थे शायद घोड़े भी नहीं थे आर्यो के पास यह दोनों चीज़े थी आर्ये विजयी हुए फिर इतिहास अपनी गति से बढ़ता गया नाग हारे सुपर्ण हारे यक्ष हारे गन्धर्व हारे असुरे हारे राक्षस हारे लोहे के अस्त्रों ने बाज़ी मार ली इतिहास आगे बढ़ा। पलीते वाली बंदूकों ने, कारतूसों ने, तोपों ने , बमो ने , बम वर्षक वायुयानों ने इतिहास को किस कीचड़ भरे घाट तक घसीटा है यह सबको मालूम है नख धर मनुष्य अब भी बढ़ रहे है अब भी प्रकृति भी मनुष्यो को उसके भीतर वाले अस्त्र से वंचित नहीं कर रही है , अब भी याद दिला देती है के तुम्हारे नाख़ून को भुलाया नहीं जा सकता। तुम वही लाख वर्ष पहले के नख - दंतावलम्वी जीव हो-पशु के साथ ही सतह पर विचरने वाले और चरने वाले। प्राचीन काल में मनुष्य को नाख़ून की आवश्यकता क्यों थी
कुछ लाख वर्ष पहले की बात है जब मनुष्य जंगली था, वनमानुष जैसा उसे नाख़ून की जरुरत थी उसकी जीवन रक्षा के लिए नाख़ून बहुत ज़रूरी थे असल में वही उसके अस्त्र थे दाँत भी थे पर नाख़ून के बाद ही उनका स्थान था उन दिनों उसे झूझना पड़ता था प्रतिद्वन्दियो को पछाड़ना पड़ता था नाख़ून उसके लिए आवश्यक अंग था फिर वह अपने अंग से बाहर की वस्तुओ का सहारा लेने लग। पत्थर के ढेले और पेड़ की डाले काम में लाने लगा (रामचन्द्रजी की वानरी सेना के पास ऐसे ही अस्त्र थे) ! उसने हड्डियों के भी हथियार बनाये! इन हड्डी के हथियार में सबसे मजबूत और सब से ऐतिहासिक था इन्द्र देव का वज्र, जो ऋषि मुनि की हड्डियों से बना था मनुष्य और आगे बढ़ा उसने धातु के हथियार बनाये जिनके पास लोहे के अस्त्र और शस्त्र थे वे विजयी हुए। देवताओ के राजा तक को मनुष्ये के राजा से इसलिए सहायता लेनी पड़ती थी क्यूंकि मनुष्ये के राजा के पास लोहे के अस्त्र थे असुरो के पास अनेक विधाये थी पर लोहे के अस्त्र नहीं थे शायद घोड़े भी नहीं थे आर्यो के पास यह दोनों चीज़े थी आर्ये विजयी हुए फिर इतिहास अपनी गति से बढ़ता गया नाग हारे सुपर्ण हारे यक्ष हारे गन्धर्व हारे असुरे हारे राक्षस हारे लोहे के अस्त्रों ने बाज़ी मार ली इतिहास आगे बढ़ा। पलीते वाली बंदूकों ने, कारतूसों ने, तोपों ने , बमो ने , बम वर्षक वायुयानों ने इतिहास को किस कीचड़ भरे घाट तक घसीटा है यह सबको मालूम है नख धर मनुष्य अब भी बढ़ रहे है अब भी प्रकृति भी मनुष्यो को उसके भीतर वाले अस्त्र से वंचित नहीं कर रही है , अब भी याद दिला देती है के तुम्हारे नाख़ून को भुलाया नहीं जा सकता। तुम वही लाख वर्ष पहले के नख - दंतावलम्वी जीव हो-पशु के साथ ही सतह पर विचरने वाले और चरने वाले। इनमे से किस ऋषि की हड्डियों से हथियार बनाया गया था ?
कुछ लाख वर्ष पहले की बात है जब मनुष्य जंगली था, वनमानुष जैसा उसे नाख़ून की जरुरत थी उसकी जीवन रक्षा के लिए नाख़ून बहुत ज़रूरी थे असल में वही उसके अस्त्र थे दाँत भी थे पर नाख़ून के बाद ही उनका स्थान था उन दिनों उसे झूझना पड़ता था प्रतिद्वन्दियो को पछाड़ना पड़ता था नाख़ून उसके लिए आवश्यक अंग था फिर वह अपने अंग से बाहर की वस्तुओ का सहारा लेने लग। पत्थर के ढेले और पेड़ की डाले काम में लाने लगा (रामचन्द्रजी की वानरी सेना के पास ऐसे ही अस्त्र थे) ! उसने हड्डियों के भी हथियार बनाये! इन हड्डी के हथियार में सबसे मजबूत और सब से ऐतिहासिक था इन्द्र देव का वज्र, जो ऋषि मुनि की हड्डियों से बना था मनुष्य और आगे बढ़ा उसने धातु के हथियार बनाये जिनके पास लोहे के अस्त्र और शस्त्र थे वे विजयी हुए। देवताओ के राजा तक को मनुष्ये के राजा से इसलिए सहायता लेनी पड़ती थी क्यूंकि मनुष्ये के राजा के पास लोहे के अस्त्र थे असुरो के पास अनेक विधाये थी पर लोहे के अस्त्र नहीं थे शायद घोड़े भी नहीं थे आर्यो के पास यह दोनों चीज़े थी आर्ये विजयी हुए फिर इतिहास अपनी गति से बढ़ता गया नाग हारे सुपर्ण हारे यक्ष हारे गन्धर्व हारे असुरे हारे राक्षस हारे लोहे के अस्त्रों ने बाज़ी मार ली इतिहास आगे बढ़ा। पलीते वाली बंदूकों ने, कारतूसों ने, तोपों ने , बमो ने , बम वर्षक वायुयानों ने इतिहास को किस कीचड़ भरे घाट तक घसीटा है यह सबको मालूम है नख धर मनुष्य अब भी बढ़ रहे है अब भी प्रकृति भी मनुष्यो को उसके भीतर वाले अस्त्र से वंचित नहीं कर रही है , अब भी याद दिला देती है के तुम्हारे नाख़ून को भुलाया नहीं जा सकता। तुम वही लाख वर्ष पहले के नख - दंतावलम्वी जीव हो-पशु के साथ ही सतह पर विचरने वाले और चरने वाले। इनमे से किस धातु के बने हथियार मनुष्य के राजा के पास थे, जिस कारणवश देवताओ के राजा को उनसे सहायता माँगनी पड़ती थी?
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