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KIM JONG UN - टॉयलेट लेकर क्यों घूमता है...

KIM JONG UN - टॉयलेट लेकर क्यों घूमता है ? Amezing Facts #shorts

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जिन्होंने भी बच्चों को पढ़ाने की कोशिश की है-चाहे वे माता-पिता हों या शिक्षक उनके खाते में सफलता के साथ-साथ असफलता और निराशा भी दर्ज होती है। ऐसे में एक सवाल उठता है कि आखिर इतना मुश्किल क्यों है पढ़ाना ? एक मुख्य समस्या तो यह है कि पढ़ाने वालों का विश्वास बच्चों की क्षमताओं या योग्यताओं पर काफी कम होता है। यह बात मैं यूँ ही नहीं कर रही बल्कि एक अभिभावक, एक शिक्षक और एक शिक्षक प्रशिक्षक होने के आधार पर कह रही हूँ कई बार मैं उस पाठ को लेकर बच्चों (दूसरी, तीसरी या फिर पाँचवीं) के सामने खड़ी होती हूँ जो मुझे उन्हें पढ़ाना है। मेरे पास कुछ जानकारी है जो मैं बच्चों को देना चाहती हूँ। लेकिन मैं यह जानकरी उन्हें क्यूँ देना चाहती हूँ? क्योंक मुझे लगता है कि वे इसके बारे में नहीं जानते, इसे जानने में उन्हें मजा आएगा, यह दुनिया के बारे में उनके नजरिए को विस्तृत करने में मदद करेगी, यह उन्हें बेहतर इन्सान बनने में मदद करेगी, भले ही थोड़ा-सा। लेकिन कभी-कभार पढ़ाना शुरू करने से पहले ही मेरे दिमाग में यह ख्याल बुदबुदाना शुरू कर देता है कि शायद उन्हें वह पहले से ही मालूम हो जो मैं उन्हें बताना चाहती हूँ, तो उन्हें कुछ बताने की बजाय मैं उनके सामने सवाल रख देती हूँ। बच्चों को पढ़ाने से पहले स्वयं से 'क्यों' वाला सवाल पूछना क्यों जरूरी है?

जिन्होंने भी बच्चों को पढ़ाने की कोशिश की है-चाहे वे माता-पिता हों या शिक्षक उनके खाते में सफलता के साथ-साथ असफलता और निराशा भी दर्ज होती है। ऐसे में एक सवाल उठता है कि आखिर इतना मुश्किल क्यों है पढ़ाना ? एक मुख्य समस्या तो यह है कि पढ़ाने वालों का विश्वास बच्चों की क्षमताओं या योग्यताओं पर काफी कम होता है। यह बात मैं यूँ ही नहीं कर रही बल्कि एक अभिभावक, एक शिक्षक और एक शिक्षक प्रशिक्षक होने के आधार पर कह रही हूँ कई बार मैं उस पाठ को लेकर बच्चों (दूसरी, तीसरी या फिर पाँचवीं) के सामने खड़ी होती हूँ जो मुझे उन्हें पढ़ाना है। मेरे पास कुछ जानकारी है जो मैं बच्चों को देना चाहती हूँ। लेकिन मैं यह जानकरी उन्हें क्यूँ देना चाहती हूँ? क्योंक मुझे लगता है कि वे इसके बारे में नहीं जानते, इसे जानने में उन्हें मजा आएगा, यह दुनिया के बारे में उनके नजरिए को विस्तृत करने में मदद करेगी, यह उन्हें बेहतर इन्सान बनने में मदद करेगी, भले ही थोड़ा-सा। लेकिन कभी-कभार पढ़ाना शुरू करने से पहले ही मेरे दिमाग में यह ख्याल बुदबुदाना शुरू कर देता है कि शायद उन्हें वह पहले से ही मालूम हो जो मैं उन्हें बताना चाहती हूँ, तो उन्हें कुछ बताने की बजाय मैं उनके सामने सवाल रख देती हूँ। 'आखिर इतना मुश्किल क्यों है पढ़ाना?' वाक्य को यदि हिन्दी की सामान्य वाक्य-रचना के अनुसार लिखा जाए, तो वाक्य होगा

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'कुहरा' किसका प्रतीक है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'मुट्ठियों में जुगनू दबाना' का आशय है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'दिनकर' किसका पर्यायवाची है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। यह कविता क्या प्रेरणा देती है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'सूरज' किसका प्रतीक है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'अमावस' किसका प्रतीक है?