Home
Class
DN_SHORTS
? दुनिया की 3 सबसे अजीबो गरीब सजाएं | #s...

? दुनिया की 3 सबसे अजीबो गरीब सजाएं | #shorts #actonfact #ytshorts

Promotional Banner

Similar Questions

Explore conceptually related problems

बच्चे और खिलौने का सम्बन्ध सदैव से ही रहा है। हम यह भी कह सकते हैं कि खिलौनों के बिना हम बच्चों की दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकते। चाहे हम बच्चों को खिलौने खरीदकर दें या न दें, बच्चे अपने लिए किसी-न-किसी चीज (चाहे वे टूटे-फूटे डिब्बे हों या इसी तरह की अन्य सामग्री) को खिलौने की शक्ल दे ही देते हैं। बच्चों को एकदम छुटपन से ही मुँह से या खिलौनों से अजीबों गरीब आवाजें निकालकर हम बहलाते हैं और बच्चे बहल भी जाते हैं। यही बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, खुद भी चीजों को जोड़-तोड़कर खिलौने बनाने में अपनी रचनात्मक ऊर्जा का खूब इस्तेमाल करते हैं। इसलिए भी यह जरूरी हो जाता है कि बच्चों की इस रचनात्मक ऊर्जा को उभारने के लिए उन्हें भरपूर मौके दिए जाएँ। पहले हम गौर करें कि बच्चे अपने रोजमर्रा के जीवन में कौन-कौन-सी चीजें बनाते हैं? इसके लिए अगर हम अपने अतीत में गोता लगाएँ और अपने बचपन की दुनिया में झाँके, तो तरह-तरह के खिलौनों का खजाना हमारी स्मृति में से निकलकर आता है-ढेर सारी माचिस की खाली डिब्बियों को बिल्कुल सरल तरीके से जोड़कर बनती रेलगाड़ी, कागज से बनाई जाने वाली ढेरों चीजें जैसे नाव, हवाई जहाज, तितली, नाग आदि क्या-क्या नहीं बनाते थे इन सब से। बच्चों की रचनात्मक ऊर्जा को उभारने के लिए

बच्चे और खिलौने का सम्बन्ध सदैव से ही रहा है। हम यह भी कह सकते हैं कि खिलौनों के बिना हम बच्चों की दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकते। चाहे हम बच्चों को खिलौने खरीदकर दें या न दें, बच्चे अपने लिए किसी-न-किसी चीज (चाहे वे टूटे-फूटे डिब्बे हों या इसी तरह की अन्य सामग्री) को खिलौने की शक्ल दे ही देते हैं। बच्चों को एकदम छुटपन से ही मुँह से या खिलौनों से अजीबों गरीब आवाजें निकालकर हम बहलाते हैं और बच्चे बहल भी जाते हैं। यही बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, खुद भी चीजों को जोड़-तोड़कर खिलौने बनाने में अपनी रचनात्मक ऊर्जा का खूब इस्तेमाल करते हैं। इसलिए भी यह जरूरी हो जाता है कि बच्चों की इस रचनात्मक ऊर्जा को उभारने के लिए उन्हें भरपूर मौके दिए जाएँ। पहले हम गौर करें कि बच्चे अपने रोजमर्रा के जीवन में कौन-कौन-सी चीजें बनाते हैं? इसके लिए अगर हम अपने अतीत में गोता लगाएँ और अपने बचपन की दुनिया में झाँके, तो तरह-तरह के खिलौनों का खजाना हमारी स्मृति में से निकलकर आता है-ढेर सारी माचिस की खाली डिब्बियों को बिल्कुल सरल तरीके से जोड़कर बनती रेलगाड़ी, कागज से बनाई जाने वाली ढेरों चीजें जैसे नाव, हवाई जहाज, तितली, नाग आदि क्या-क्या नहीं बनाते थे इन सब से। अनुच्छेद में इस बात की ओर संकेत किया गया है कि

बच्चे और खिलौने का सम्बन्ध सदैव से ही रहा है। हम यह भी कह सकते हैं कि खिलौनों के बिना हम बच्चों की दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकते। चाहे हम बच्चों को खिलौने खरीदकर दें या न दें, बच्चे अपने लिए किसी-न-किसी चीज (चाहे वे टूटे-फूटे डिब्बे हों या इसी तरह की अन्य सामग्री) को खिलौने की शक्ल दे ही देते हैं। बच्चों को एकदम छुटपन से ही मुँह से या खिलौनों से अजीबों गरीब आवाजें निकालकर हम बहलाते हैं और बच्चे बहल भी जाते हैं। यही बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, खुद भी चीजों को जोड़-तोड़कर खिलौने बनाने में अपनी रचनात्मक ऊर्जा का खूब इस्तेमाल करते हैं। इसलिए भी यह जरूरी हो जाता है कि बच्चों की इस रचनात्मक ऊर्जा को उभारने के लिए उन्हें भरपूर मौके दिए जाएँ। पहले हम गौर करें कि बच्चे अपने रोजमर्रा के जीवन में कौन-कौन-सी चीजें बनाते हैं? इसके लिए अगर हम अपने अतीत में गोता लगाएँ और अपने बचपन की दुनिया में झाँके, तो तरह-तरह के खिलौनों का खजाना हमारी स्मृति में से निकलकर आता है-ढेर सारी माचिस की खाली डिब्बियों को बिल्कुल सरल तरीके से जोड़कर बनती रेलगाड़ी, कागज से बनाई जाने वाली ढेरों चीजें जैसे नाव, हवाई जहाज, तितली, नाग आदि क्या-क्या नहीं बनाते थे इन सब से। खिलौने बच्चों की ... . को बढ़ाते हैं।

बच्चे और खिलौने का सम्बन्ध सदैव से ही रहा है। हम यह भी कह सकते हैं कि खिलौनों के बिना हम बच्चों की दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकते। चाहे हम बच्चों को खिलौने खरीदकर दें या न दें, बच्चे अपने लिए किसी-न-किसी चीज (चाहे वे टूटे-फूटे डिब्बे हों या इसी तरह की अन्य सामग्री) को खिलौने की शक्ल दे ही देते हैं। बच्चों को एकदम छुटपन से ही मुँह से या खिलौनों से अजीबों गरीब आवाजें निकालकर हम बहलाते हैं और बच्चे बहल भी जाते हैं। यही बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, खुद भी चीजों को जोड़-तोड़कर खिलौने बनाने में अपनी रचनात्मक ऊर्जा का खूब इस्तेमाल करते हैं। इसलिए भी यह जरूरी हो जाता है कि बच्चों की इस रचनात्मक ऊर्जा को उभारने के लिए उन्हें भरपूर मौके दिए जाएँ। पहले हम गौर करें कि बच्चे अपने रोजमर्रा के जीवन में कौन-कौन-सी चीजें बनाते हैं? इसके लिए अगर हम अपने अतीत में गोता लगाएँ और अपने बचपन की दुनिया में झाँके, तो तरह-तरह के खिलौनों का खजाना हमारी स्मृति में से निकलकर आता है-ढेर सारी माचिस की खाली डिब्बियों को बिल्कुल सरल तरीके से जोड़कर बनती रेलगाड़ी, कागज से बनाई जाने वाली ढेरों चीजें जैसे नाव, हवाई जहाज, तितली, नाग आदि क्या-क्या नहीं बनाते थे इन सब से। बच्चे और खिलौने का ....... सदैव से ही रहा है।

बच्चे और खिलौने का सम्बन्ध सदैव से ही रहा है। हम यह भी कह सकते हैं कि खिलौनों के बिना हम बच्चों की दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकते। चाहे हम बच्चों को खिलौने खरीदकर दें या न दें, बच्चे अपने लिए किसी-न-किसी चीज (चाहे वे टूटे-फूटे डिब्बे हों या इसी तरह की अन्य सामग्री) को खिलौने की शक्ल दे ही देते हैं। बच्चों को एकदम छुटपन से ही मुँह से या खिलौनों से अजीबों गरीब आवाजें निकालकर हम बहलाते हैं और बच्चे बहल भी जाते हैं। यही बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, खुद भी चीजों को जोड़-तोड़कर खिलौने बनाने में अपनी रचनात्मक ऊर्जा का खूब इस्तेमाल करते हैं। इसलिए भी यह जरूरी हो जाता है कि बच्चों की इस रचनात्मक ऊर्जा को उभारने के लिए उन्हें भरपूर मौके दिए जाएँ। पहले हम गौर करें कि बच्चे अपने रोजमर्रा के जीवन में कौन-कौन-सी चीजें बनाते हैं? इसके लिए अगर हम अपने अतीत में गोता लगाएँ और अपने बचपन की दुनिया में झाँके, तो तरह-तरह के खिलौनों का खजाना हमारी स्मृति में से निकलकर आता है-ढेर सारी माचिस की खाली डिब्बियों को बिल्कुल सरल तरीके से जोड़कर बनती रेलगाड़ी, कागज से बनाई जाने वाली ढेरों चीजें जैसे नाव, हवाई जहाज, तितली, नाग आदि क्या-क्या नहीं बनाते थे इन सब से। निम्नलिखित में से कौन-सी चीज बच्चे के लिए दूरबीन बन सकती है?

बच्चे और खिलौने का सम्बन्ध सदैव से ही रहा है। हम यह भी कह सकते हैं कि खिलौनों के बिना हम बच्चों की दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकते। चाहे हम बच्चों को खिलौने खरीदकर दें या न दें, बच्चे अपने लिए किसी-न-किसी चीज (चाहे वे टूटे-फूटे डिब्बे हों या इसी तरह की अन्य सामग्री) को खिलौने की शक्ल दे ही देते हैं। बच्चों को एकदम छुटपन से ही मुँह से या खिलौनों से अजीबों गरीब आवाजें निकालकर हम बहलाते हैं और बच्चे बहल भी जाते हैं। यही बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, खुद भी चीजों को जोड़-तोड़कर खिलौने बनाने में अपनी रचनात्मक ऊर्जा का खूब इस्तेमाल करते हैं। इसलिए भी यह जरूरी हो जाता है कि बच्चों की इस रचनात्मक ऊर्जा को उभारने के लिए उन्हें भरपूर मौके दिए जाएँ। पहले हम गौर करें कि बच्चे अपने रोजमर्रा के जीवन में कौन-कौन-सी चीजें बनाते हैं? इसके लिए अगर हम अपने अतीत में गोता लगाएँ और अपने बचपन की दुनिया में झाँके, तो तरह-तरह के खिलौनों का खजाना हमारी स्मृति में से निकलकर आता है-ढेर सारी माचिस की खाली डिब्बियों को बिल्कुल सरल तरीके से जोड़कर बनती रेलगाड़ी, कागज से बनाई जाने वाली ढेरों चीजें जैसे नाव, हवाई जहाज, तितली, नाग आदि क्या-क्या नहीं बनाते थे इन सब से। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं

बच्चे और खिलौने का सम्बन्ध सदैव से ही रहा है। हम यह भी कह सकते हैं कि खिलौनों के बिना हम बच्चों की दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकते। चाहे हम बच्चों को खिलौने खरीदकर दें या न दें, बच्चे अपने लिए किसी-न-किसी चीज (चाहे वे टूटे-फूटे डिब्बे हों या इसी तरह की अन्य सामग्री) को खिलौने की शक्ल दे ही देते हैं। बच्चों को एकदम छुटपन से ही मुँह से या खिलौनों से अजीबों गरीब आवाजें निकालकर हम बहलाते हैं और बच्चे बहल भी जाते हैं। यही बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, खुद भी चीजों को जोड़-तोड़कर खिलौने बनाने में अपनी रचनात्मक ऊर्जा का खूब इस्तेमाल करते हैं। इसलिए भी यह जरूरी हो जाता है कि बच्चों की इस रचनात्मक ऊर्जा को उभारने के लिए उन्हें भरपूर मौके दिए जाएँ। पहले हम गौर करें कि बच्चे अपने रोजमर्रा के जीवन में कौन-कौन-सी चीजें बनाते हैं? इसके लिए अगर हम अपने अतीत में गोता लगाएँ और अपने बचपन की दुनिया में झाँके, तो तरह-तरह के खिलौनों का खजाना हमारी स्मृति में से निकलकर आता है-ढेर सारी माचिस की खाली डिब्बियों को बिल्कुल सरल तरीके से जोड़कर बनती रेलगाड़ी, कागज से बनाई जाने वाली ढेरों चीजें जैसे नाव, हवाई जहाज, तितली, नाग आदि क्या-क्या नहीं बनाते थे इन सब से। 'अतीत में गोता लगाने का अर्थ है

बच्चे और खिलौने का सम्बन्ध सदैव से ही रहा है। हम यह भी कह सकते हैं कि खिलौनों के बिना हम बच्चों की दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकते। चाहे हम बच्चों को खिलौने खरीदकर दें या न दें, बच्चे अपने लिए किसी-न-किसी चीज (चाहे वे टूटे-फूटे डिब्बे हों या इसी तरह की अन्य सामग्री) को खिलौने की शक्ल दे ही देते हैं। बच्चों को एकदम छुटपन से ही मुँह से या खिलौनों से अजीबों गरीब आवाजें निकालकर हम बहलाते हैं और बच्चे बहल भी जाते हैं। यही बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते हैं, खुद भी चीजों को जोड़-तोड़कर खिलौने बनाने में अपनी रचनात्मक ऊर्जा का खूब इस्तेमाल करते हैं। इसलिए भी यह जरूरी हो जाता है कि बच्चों की इस रचनात्मक ऊर्जा को उभारने के लिए उन्हें भरपूर मौके दिए जाएँ। पहले हम गौर करें कि बच्चे अपने रोजमर्रा के जीवन में कौन-कौन-सी चीजें बनाते हैं? इसके लिए अगर हम अपने अतीत में गोता लगाएँ और अपने बचपन की दुनिया में झाँके, तो तरह-तरह के खिलौनों का खजाना हमारी स्मृति में से निकलकर आता है-ढेर सारी माचिस की खाली डिब्बियों को बिल्कुल सरल तरीके से जोड़कर बनती रेलगाड़ी, कागज से बनाई जाने वाली ढेरों चीजें जैसे नाव, हवाई जहाज, तितली, नाग आदि क्या-क्या नहीं बनाते थे इन सब से। 'बचपन' शब्द ......." शब्द है।

There is a box of cuboid shape. The smallest side of box is 20 cm and largest side is 40 cm. Which of the following can be volume (in cm^3 ) of the box? घनाभ आकार का शक बक्सा है। बक्से की सबसे छोटी भुजा 20 से.मी. तथा सबसे बड़ी भुजा 40 से.मी. है। निम्नलिखित मे से बक्से का आयतन (से.मी.^3 में) क्या हो सकता है?