फांसी❌देते वक़्त?कैदी के कान?️मैं क्या कहता है जल्लाद amazing fact Execute Facts #Shorts #Anandfacts
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दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। यह कविता क्या प्रेरणा देती है?
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'कुहरा' किसका प्रतीक है?
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'मुट्ठियों में जुगनू दबाना' का आशय है
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'दिनकर' किसका पर्यायवाची है?
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'सूरज' किसका प्रतीक है?
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 11 सामने कुहरा घना है और मैं सूरज नहीं हूँ क्या इसी अहसास में जाऊँ या जैसा भी हूँ नन्हा-सा इक दीया तो हूँ क्यों न उसी की उजास में जाऊँ? हर आने वाला क्षण मुझे यही कहता है अरे भई, तुम सूरज तो नहीं हो और मैं कहता हूँ न सही सूरज एक नन्हा दीया तो हूँ जितनी भी है तो मुझ में उसे लेकर जिया तो हूँ। कम-से-कम मैं उनमें तो नहीं जो चाँद दिल के बुझाए बैठे हैं हर रात को अमावस बनाए बैठे है उड़ते फिर रहे थे, जो जुगनू आँगन में उन्हें भी मुट्ठियों में दबाए बैठे हैं। 'अमावस' किसका प्रतीक है?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। हैरानी की बात यह है कि मेरी दलील मित्रों के हलक से नहीं उतरती थी, तब मैं उनसे कहता था- 'साहित्य की हर विधा को हर तरह की लेखनी को मैं बतौर चुनौती स्वीकार करता हूँ। आम आदमी से लेकर खास आदमी तक के हृदय को छूना कोई मामूली बात नहीं होती। यह तो आप भी स्वीकार करेंगे, क्योंकि यह काम सिर्फ रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ ही कर पाते हैं।' मेरी यह दलील रामबाण सिद्ध होती थी, वे सारे मित्र सोच में पड़ जाते थे, क्योंकि वे केवल किसी भी एक वर्ग के लिख पाते थे- 'मास' के लिए 'क्लास' के लिए। उनके दायरे सौमित थे। लेकिन मैं दायरों के बाहर का शख्स हूँ। शायद इसी कारण मैं आपसे खुलकर अंतरंग बातें भी कर सकता हूँ। बात कहानी की रचना-प्रक्रिया से आरंभ की थी। तब मैं 'ओ.हेनरी' की एक कहानी पढ़ता था और भीतर दो नई कहानियों के बीज अपने आप पड़ जाते थे। न कोई मशक्कत, न कोई गहरी सोच। यह प्रोसेस मेरे लिए उतना ही आसान था जितना कि कैरम का खेल। फिर भी ये रचनाएँ कहानी के शिल्प में कहानी विधा के अंतर्गत लिखी गई पुख्ता किस्सागोई हैं। पर यह किस्सागोई जिंदगी से अलग नहीं हो सकती। लेखक के लेखन की क्या खास बात है?
मेरे मकान के आगे 'चौराहे पर ढाबे के आगे फुटपाथ पर खाना खाने वाले लोग बैठते हैं-रिक्शेवाले, मजदूर, फेरीवाले, कबाड़ी वाले...! आना-जाना लगा ही रहता है। लोग कहते हैं "आपको बुरा नहीं लगता? लोग सड़क पर गन्दा फैला रहे हैं और आप इन्हें बरदाश्त कर रहे है? इनके कारण पूरे मोहल्ले की आबोहवा खराब हो रही है।" मैं उनकी बातों को हल्के में ही लेता हूँ। मुझे पता है कि यहाँ जो लोग जुटते है वे गरीब लोग होते हैं। अपने काम-धाम के बीच रोटी खाने चले आते हैं और खाकर चले जाते हैं। ये आमतौर पर बिहार से आए गरीब ईमानदार लोग हैं जो हमारे इस परिसर के स्थायी सदस्य हो गए हैं। ये उन अशिष्ट अमीरों से भिन्न है, जो साधारण-सी बात पर भी हंगामा खड़ा कर देते हैं। लोगों के पास पैसा तो आ गया पर धनी होने का शऊर नहीं आया। अधजल गगरी छलकत जाए की तर्ज पर इनमें दिखावे की भावना उबाल खाती है। असल में यह दावा हमें भी अपने माहौल से जोड़ता है। मैं लेखक हूँ तो क्या हुआ? गांव के एक सामान्य घर से आया हुआ व्यक्ति हूँ। बचपन में गाँव-घरों की गरीबी देखी है और भोगी भी है। खेतों की मिट्टी में रमा हूँ, वह मुझमें रमी है। आज भी उस मिट्टी को झाडझूड़ कर भले ही शहरी बनने की कोशिश करता हूँ, बन नहीं पाता। वह मिट्टी बाहर से चाहे न दिखाई दे, अपनी महक और रसमयता से वह मेरे भीतर बसी हुई है। इसीलिए मुझे मिट्टी से जुड़े ये तमाम लोग भाते हैं। इस दुनिया में कहा-सुनी होती है, हाथापाई भी हो जाती है लेकिन कोई किसी के प्रति गाँठ नहीं बाँधता। दूसरे-तीसरे ही दिन परस्पर हँसते-बत्तियाते और एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होते दिखाई पड़ते हैं। ये सभी कभी-न-कभी एक-दूसरे से लड़ चुके हैं लेकिन कभी इसकी प्रतीति नहीं होती कि ये लड़ चुके हैं। कल के गुस्से को अगले दिन धूल को तरह झाड़कर फेंक देते हैं। 'गाँठ बाँधना' का अर्थ है
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