Strange Dream Facts नींद में ऐसा करे फिर देखे आपका दिमाग़ हिल जाएगा ये Facts देख के #Shorts
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साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। लेखक खेती के साथ-साथ लिखने का काम भी क्यों कर रहा है।
साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। लेखक को दिसंबर से लगाव है, क्योंकि:
साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। शब्दों का कौन सा जोड़ शेष से भिन्न है?
साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। “किसान' से बना 'किसानी' शब्द है:
साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। स्वार्थ को ताक पर रखकर जीते है:
साल के जिस माह से मुझे अधिक लगाव है, वह दिसंबर ही है। इस महीने की कोमल धूप मुझे मोह लेती है, लेकिन तभी एहसास होता है कि यह साल भी बीतकर विगत हो जाएगा. ठीक उसी तरह, जैसे- धरती मैया के आँचल में न जाने कितनी सदियाँ, कितने बरस दुबककर छिपे बैठे हैं। फिर सोचता हूँ, तो लगता है कि हर किसी के जीवन बनने में ऐसे ही न जाने कितने 12 महीने होंगे। इन्हीं महीनों के पल-पल को जोड़कर हम आप सब अपने जीवन को संवारते-बिगाड़ते हैं! किसानी करते हुए हमने पाया कि एक किसान चार-चार महीने में एक जीवन जीता हैं। शायद ही किसी पेशे में जीवन को इस तरह टुकड़ों में जिया जाता होगा। चार महीने में हम एक फसल उपजा लेते हैं और इन चार महीनों के सुख दुख को फसल काटते ही मानो भूल जाते है। हमने कभी बाबूजी के मुख से सुना था कि किसान ही केवल ऐसा जीव है, जो स्वार्थ को ताक पर रखकर जीता है। इनके पीछे उनका तर्क होता था कि फसल मोने के बाद किसान इस बात की परवाह नहीं करता है कि फसल अच्छी होगी या बुरी। वह सब कुछ मौसम के हवाले कर जीवन के अगले चरण की तैयारी में जुट जाता है। किसानी करते हुए जो एहसास हो रहा है, उसे लिखता जाता हैं। इस आशा के साथ कि किसानी का कोई परित्यक्त भाव से न देखे। अंतिम महीने में जैसे-जैसे किसान मक्का, आलू और सरसों में डूबे पड़े हैं। इस आशा के साथ कि आने वाल नए साल में इन फसलों से नए जीवन को नए सलीके से सजाया सँवारा जाएगा। किसान अपने सुख-दुख को कब भूल जाता है?
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये थकान के कारण राजा को नींद आने लगी। इतने में किसी की कर्कश ध्वनि से उसकी नींद टूट गई। राजा को वहाँ कोई दिखाई न दिया। तभी उसे उसी कर्कश वाणी में सुनाई दिया,"पकड़ो, पकड़ो यह व्यक्ति जो सोया है, राजा है इसके गले में मोतियों की माला है। इसके पास अनेक आभूषण-अलंकार हैं लूट लो, सब लूट लो। इसे मारकर झाड़ी में डाल दो।" राजा यह सुनकर हड़बड़ा गया। उसने उठकर देखा कि सामने पेड़ की डाल पर एक तोता बैठा था। वही कड़वी वाणी में यह सब बोल रहा था। राजा आश्चर्य और भय से भर गया। जैसे ही वह घोड़े पर सवार होकर वहाँ से चलने लगा तो तोता फिर बोल पड़ा, "राजा जाग गया। देखो, देखो वह भागा जा रहा है। पकड़ो इसे पकड़ लो राजा गया। राजा उस स्थान से दूर निकल कर एक पर्वत की तलहटी में जा पहुंचा। उसे एक मधुर वाणी सुनाई दी, "आइए राजन, आइए। ऋषियों के इस पावन आश्रम में आपका स्वागत है।" राजा ने आश्चर्य से भरकर सामने वृक्ष की डाल पर बैठे एक तोते को देखा। उसे सरोवर के किनारे मिले तोते और इस तोते के रूप, रंग और आकार-प्रकार में काफी समानता लगी। राजा के मन में उठी शंका का निवारण करते हुए तोते ने कहा कि वह उसका जुड़वा भाई सुपंखी हैं और वह स्वयं सुकंठी है। समय के फेर ने दोनों को अलग कर दिया। वह चोरों की बस्ती में पला-बढ़ा है, तभी उसका आचरण उस परिवेश के समान ही कटु है। वह ऋषियों के आश्रम में पलने-बढ़ने के कारण इतना विनम्र है। वह चाहता है कि सुपंखी भी यहाँ आकर रहे, परन्तु अब उसके संस्कार इतने गहरे हो गए हैं कि आश्रम का वातावरण उसे बाँध नहीं पाता। राजा ने तोते की बात को सुना और वह समझ गया कि दोनों के व्यवहार में इतना अंतर क्यों है। सुकंठी तथा सुपंखी के स्वभाव में भिन्नता क्यों है?
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये थकान के कारण राजा को नींद आने लगी। इतने में किसी की कर्कश ध्वनि से उसकी नींद टूट गई। राजा को वहाँ कोई दिखाई न दिया। तभी उसे उसी कर्कश वाणी में सुनाई दिया,"पकड़ो, पकड़ो यह व्यक्ति जो सोया है, राजा है इसके गले में मोतियों की माला है। इसके पास अनेक आभूषण-अलंकार हैं लूट लो, सब लूट लो। इसे मारकर झाड़ी में डाल दो।" राजा यह सुनकर हड़बड़ा गया। उसने उठकर देखा कि सामने पेड़ की डाल पर एक तोता बैठा था। वही कड़वी वाणी में यह सब बोल रहा था। राजा आश्चर्य और भय से भर गया। जैसे ही वह घोड़े पर सवार होकर वहाँ से चलने लगा तो तोता फिर बोल पड़ा, "राजा जाग गया। देखो, देखो वह भागा जा रहा है। पकड़ो इसे पकड़ लो राजा गया। राजा उस स्थान से दूर निकल कर एक पर्वत की तलहटी में जा पहुंचा। उसे एक मधुर वाणी सुनाई दी, "आइए राजन, आइए। ऋषियों के इस पावन आश्रम में आपका स्वागत है।" राजा ने आश्चर्य से भरकर सामने वृक्ष की डाल पर बैठे एक तोते को देखा। उसे सरोवर के किनारे मिले तोते और इस तोते के रूप, रंग और आकार-प्रकार में काफी समानता लगी। राजा के मन में उठी शंका का निवारण करते हुए तोते ने कहा कि वह उसका जुड़वा भाई सुपंखी हैं और वह स्वयं सुकंठी है। समय के फेर ने दोनों को अलग कर दिया। वह चोरों की बस्ती में पला-बढ़ा है, तभी उसका आचरण उस परिवेश के समान ही कटु है। वह ऋषियों के आश्रम में पलने-बढ़ने के कारण इतना विनम्र है। वह चाहता है कि सुपंखी भी यहाँ आकर रहे, परन्तु अब उसके संस्कार इतने गहरे हो गए हैं कि आश्रम का वातावरण उसे बाँध नहीं पाता। राजा ने तोते की बात को सुना और वह समझ गया कि दोनों के व्यवहार में इतना अंतर क्यों है। इस गद्यांश से लेखक किस बात की पुष्टि कर रहा है?
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये थकान के कारण राजा को नींद आने लगी। इतने में किसी की कर्कश ध्वनि से उसकी नींद टूट गई। राजा को वहाँ कोई दिखाई न दिया। तभी उसे उसी कर्कश वाणी में सुनाई दिया,"पकड़ो, पकड़ो यह व्यक्ति जो सोया है, राजा है इसके गले में मोतियों की माला है। इसके पास अनेक आभूषण-अलंकार हैं लूट लो, सब लूट लो। इसे मारकर झाड़ी में डाल दो।" राजा यह सुनकर हड़बड़ा गया। उसने उठकर देखा कि सामने पेड़ की डाल पर एक तोता बैठा था। वही कड़वी वाणी में यह सब बोल रहा था। राजा आश्चर्य और भय से भर गया। जैसे ही वह घोड़े पर सवार होकर वहाँ से चलने लगा तो तोता फिर बोल पड़ा, "राजा जाग गया। देखो, देखो वह भागा जा रहा है। पकड़ो इसे पकड़ लो राजा गया। राजा उस स्थान से दूर निकल कर एक पर्वत की तलहटी में जा पहुंचा। उसे एक मधुर वाणी सुनाई दी, "आइए राजन, आइए। ऋषियों के इस पावन आश्रम में आपका स्वागत है।" राजा ने आश्चर्य से भरकर सामने वृक्ष की डाल पर बैठे एक तोते को देखा। उसे सरोवर के किनारे मिले तोते और इस तोते के रूप, रंग और आकार-प्रकार में काफी समानता लगी। राजा के मन में उठी शंका का निवारण करते हुए तोते ने कहा कि वह उसका जुड़वा भाई सुपंखी हैं और वह स्वयं सुकंठी है। समय के फेर ने दोनों को अलग कर दिया। वह चोरों की बस्ती में पला-बढ़ा है, तभी उसका आचरण उस परिवेश के समान ही कटु है। वह ऋषियों के आश्रम में पलने-बढ़ने के कारण इतना विनम्र है। वह चाहता है कि सुपंखी भी यहाँ आकर रहे, परन्तु अब उसके संस्कार इतने गहरे हो गए हैं कि आश्रम का वातावरण उसे बाँध नहीं पाता। राजा ने तोते की बात को सुना और वह समझ गया कि दोनों के व्यवहार में इतना अंतर क्यों है। प्रस्तुत कथा तोतों के बच्चों को आधार बनाकर लिखी गई एक
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