नदी का नाम बताइये ? hindi paheliyan video || #shorts #youtubeshorts #riddles #trending
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दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 24 नन्हीं-सी नदी हमारी टेढ़ी-मेढ़ी धार, गर्मियों में घुटने भर भिगो कर जाते पार पार जाते ढोर-डेंगर बैलगाड़ी चालू, ऊँचे हैं किनारे इसके पाट इसका ढालू। पेटे में झकाझक बालू कीचड़ का न नाम, काँस फूले एक पार उजले जैसे घाम। दिन भर किचपिच-किचपिच करती मैना डार-डार, रातों को हुआँ हुआँ कर उठते सियार। " " रवीन्द्रनाथ ठाकुर नन्हीं-सी नदी के किनारे कैसे है?
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 24 नन्हीं-सी नदी हमारी टेढ़ी-मेढ़ी धार, गर्मियों में घुटने भर भिगो कर जाते पार पार जाते ढोर-डेंगर बैलगाड़ी चालू, ऊँचे हैं किनारे इसके पाट इसका ढालू। पेटे में झकाझक बालू कीचड़ का न नाम, काँस फूले एक पार उजले जैसे घाम। दिन भर किचपिच-किचपिच करती मैना डार-डार, रातों को हुआँ हुआँ कर उठते सियार। " " रवीन्द्रनाथ ठाकुर 'घाम' शब्द का अर्थ क्या होगा?
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 24 नन्हीं-सी नदी हमारी टेढ़ी-मेढ़ी धार, गर्मियों में घुटने भर भिगो कर जाते पार पार जाते ढोर-डेंगर बैलगाड़ी चालू, ऊँचे हैं किनारे इसके पाट इसका ढालू। पेटे में झकाझक बालू कीचड़ का न नाम, काँस फूले एक पार उजले जैसे घाम। दिन भर किचपिच-किचपिच करती मैना डार-डार, रातों को हुआँ हुआँ कर उठते सियार। " " रवीन्द्रनाथ ठाकुर कविता का उपयुक्त शीर्षक हो सकता है
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 24 नन्हीं-सी नदी हमारी टेढ़ी-मेढ़ी धार, गर्मियों में घुटने भर भिगो कर जाते पार पार जाते ढोर-डेंगर बैलगाड़ी चालू, ऊँचे हैं किनारे इसके पाट इसका ढालू। पेटे में झकाझक बालू कीचड़ का न नाम, काँस फूले एक पार उजले जैसे घाम। दिन भर किचपिच-किचपिच करती मैना डार-डार, रातों को हुआँ हुआँ कर उठते सियार। " " रवीन्द्रनाथ ठाकुर 'किचपिच किचपिच करती मैना' से तात्पर्य है
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 24 नन्हीं-सी नदी हमारी टेढ़ी-मेढ़ी धार, गर्मियों में घुटने भर भिगो कर जाते पार पार जाते ढोर-डेंगर बैलगाड़ी चालू, ऊँचे हैं किनारे इसके पाट इसका ढालू। पेटे में झकाझक बालू कीचड़ का न नाम, काँस फूले एक पार उजले जैसे घाम। दिन भर किचपिच-किचपिच करती मैना डार-डार, रातों को हुआँ हुआँ कर उठते सियार। " " रवीन्द्रनाथ ठाकुर कवि ने 'काँस' की तुलना किससे की है?
दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 24 नन्हीं-सी नदी हमारी टेढ़ी-मेढ़ी धार, गर्मियों में घुटने भर भिगो कर जाते पार पार जाते ढोर-डेंगर बैलगाड़ी चालू, ऊँचे हैं किनारे इसके पाट इसका ढालू। पेटे में झकाझक बालू कीचड़ का न नाम, काँस फूले एक पार उजले जैसे घाम। दिन भर किचपिच-किचपिच करती मैना डार-डार, रातों को हुआँ हुआँ कर उठते सियार। " " रवीन्द्रनाथ ठाकुर 'ढोर-डंगर' शब्द से तात्पर्य है
हमारे विशाल देश में हिमालय की अनन्त हिमराशि वाले ग्लेशियरों ने जिन नदियों को जन्म दिया है, उनमें गंगा और यमुना नाम की नदियाँ हमारे जीवन की धमनियों की तरह रही हैं। उनकी गोद में हमारे पूर्वजों ने सभ्यता के प्रांगण में अनेक नए खेल खेले। उनके तटों पर जीवन का जो प्रवाह प्रचलित हुआ, वह आज तक हमारे भूत और भावी जीवन को सींच रहा है। भारत हमारा देश है और हम उसके नागरिक हैं यह एक सच्चाई हमारे रोम-रोम में बिंधी हुई है। नदियों की अन्तर्वेदी में पनपने वाले आदि युग के जीवन पर हम अब जितना अधिक विचार करते हैं हमको अपने विकास और वृद्धि की सनातन जड़ों का पृथ्वी के साथ सम्बन्ध उतना ही अधिक घनिष्ठ जान पड़ता है। हमारे धार्मिक पर्वो पर लाखों लोग नदी और जलाशयों के तटों पर एकत्र होते हैं। पृथ्वी के एक-एक जलाशय और सरोवर को भारतीय भावना ने ठीक प्रकार से समझने का प्रयत्न किया, उनके साथ सौहार्द का भाव उत्पन्न किया जो हर एक पीढ़ी के साथ नए रूप में बंधा रहा किन्तु आज स्थिति बड़ी विचित्र और एक सीमा तक चिन्ताजनक हो गई है। हमारी औद्योगिक क्रान्ति ने इन्हें प्रदूषित कर विषैला बना दिया है। जीवनदायिनी नदियाँ आज प्राणघातिनी होती जा रही हैं। मिल-बैठकर सोचने की आवश्यकता है कि क्या करें कि ये पुनः जीवनदायिनी हों और उन सोची हुई योजनाओं को अमल में । लाने की भी आवश्यकता है। लेखक के अनुसार हमारी सभ्यता का जन्म हुआ है
हमारे विशाल देश में हिमालय की अनन्त हिमराशि वाले ग्लेशियरों ने जिन नदियों को जन्म दिया है, उनमें गंगा और यमुना नाम की नदियाँ हमारे जीवन की धमनियों की तरह रही हैं। उनकी गोद में हमारे पूर्वजों ने सभ्यता के प्रांगण में अनेक नए खेल खेले। उनके तटों पर जीवन का जो प्रवाह प्रचलित हुआ, वह आज तक हमारे भूत और भावी जीवन को सींच रहा है। भारत हमारा देश है और हम उसके नागरिक हैं यह एक सच्चाई हमारे रोम-रोम में बिंधी हुई है। नदियों की अन्तर्वेदी में पनपने वाले आदि युग के जीवन पर हम अब जितना अधिक विचार करते हैं हमको अपने विकास और वृद्धि की सनातन जड़ों का पृथ्वी के साथ सम्बन्ध उतना ही अधिक घनिष्ठ जान पड़ता है। हमारे धार्मिक पर्वो पर लाखों लोग नदी और जलाशयों के तटों पर एकत्र होते हैं। पृथ्वी के एक-एक जलाशय और सरोवर को भारतीय भावना ने ठीक प्रकार से समझने का प्रयत्न किया, उनके साथ सौहार्द का भाव उत्पन्न किया जो हर एक पीढ़ी के साथ नए रूप में बंधा रहा किन्तु आज स्थिति बड़ी विचित्र और एक सीमा तक चिन्ताजनक हो गई है। हमारी औद्योगिक क्रान्ति ने इन्हें प्रदूषित कर विषैला बना दिया है। जीवनदायिनी नदियाँ आज प्राणघातिनी होती जा रही हैं। मिल-बैठकर सोचने की आवश्यकता है कि क्या करें कि ये पुनः जीवनदायिनी हों और उन सोची हुई योजनाओं को अमल में । लाने की भी आवश्यकता है। 'जीवनदायिनी' का विलोम है।
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