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?क्रिकेटर अपने चेहरे पर सफेद क्रीम क्यों लगाते हैं | 1 minute facts | #shorts #facts #viral #ipl

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मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। अनुच्छेद के आधार पर बताइए कि पंजाब प्रांत के आदमी सामान्यतः क्या पहनते हैं?

मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। अनुच्छेद के आधार पर बताइए कि किनका शोषण हो रहा है।

मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। कागज पर सीमित हो जाने से तात्पर्य है

मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। ''इस पर पश्चिम का प्रभाव है।'' वाक्य है

मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। 'ग्रामीण, सामाजिक, युवा' आदि शब्द हैं

Read the given statements and conclusions carefully. Assuming that the information given in the statements is true, even if it appears to be at variance with commonly known facts, decide which of the given conclusions logically follow(s) from the statements. दिए गए कथनों और निष्कर्षों को ध्यान से पढ़ें। यह मानते हुए कि कथनों में दी गई जानकारी सही है, भले ही यह सामान्य रूप से ज्ञात तथ्यों के साथ विचरण करती हो, यह तय करें कि दिए गए निष्कर्षों में से कौन सा कथन से तार्किक रूप से अनुसरण करता है। Statements/ कथन : Some plants are trees./ कुछ पौधे पेड़ हैं | All trees are bushes./ सभी पेड़ झाड़ियाँ हैं | Conclusions/ निष्कर्ष : 1.Some bushes are plants./ कुछ झाड़ियाँ पौधे हैं 2.All bushes are plants./ सभी झाड़ियाँ पौधे हैं | 3.No bush is a plant./ कोई भी झाड़ी पौधा नहीं हैं

मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। 'युवा कवियों की नयी पौध' से क्या तात्पर्य है?

मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। पंजाब के युवा कवियों के लेखन का विषय है।