समष्टि पारस्परिक क्रियाएँ
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The average of a number and its reciprocal is 4. The average of its cube and its reciprocal is equal to: किसी संख्या तथा उसके पारस्परिक ( reciprocal) का औसत 4 है | इसके घन और और उसके पारस्परिक का औसत किसके बराबर होगा ?
संस्कृतियों के निर्माण में एक सीमा तक. देश व जाति का योगदान रहता है। संस्कृति के मूल उपादान तो प्रायः सुसंस्कृत और सभ्य देशों में एक सीमा तक समान रहते हैं, किन्तु बाह्य उपादानों में अन्तर अवश्य आता है, राष्ट्रीय या जातीय संस्कृति का सबसे बड़ा योगदान यही है कि वह हमें अपने राष्ट्र की परम्परा से संपृक्त बनाती है, रीति-नीति की सम्पदा को विच्छिन्न नहीं होने देती। आज के युग में राष्ट्रीय एवं जातीय संस्कृतियों के मिले अवसर अति सुलभ हो गए हैं। संस्कृतियों का पारस्परिक संघर्ष भी शुरू हो गया है। कुछ ऐसे विदेशी प्रभाव देश पर पड़ रहे हैं, जिनके आतंक ने हमें स्वयं अपनी संस्कृति के प्रति शंकालु बना दिया है। हमारी आस्था डिगने लगी है। यह हमारी वैचारिक दुर्बलता का फल है। अपनी संस्कृति को छोड़ विदेशी संस्कृति के विवेकहीन अनुकरण से हमारे राष्ट्रीय गौरव को जो ठेस पहुँच रही है। वह किसी राष्ट्रप्रेमी जागरूक व्यक्ति से छिपी नहीं। भारतीय संस्कृति में त्याग और ग्रहण की अद्भुत क्षमता रही है। अत: आज के वैज्ञानिक युग में हम किसी विदेशी संस्कृति के जीवन्त तत्त्वों को ग्रहण करने में पीछे नहीं रहना चाहेंगे, किन्तु अपनी सांस्कृतिक निधि की करके नहीं। यह परावलम्बन राष्ट्र की गरिमा के अनुरूप नहीं है। यह स्मरण रखना चाहिए कि सूर्य की आलोक प्रदायिनी किरणों से पौधे को चाहे जितनी जीवन शक्ति मिले, किन्तु अपनी जमीन और अपनी जड़ों के बिना पौधा जीवित नहीं रह सकता। अविवेकी अनुकरण अज्ञान का ही पर्याय है। हम अपनी संस्कृति के प्रति शंकालु इसलिए हो गए हैं, क्योंकि
संस्कृतियों के निर्माण में एक सीमा तक. देश व जाति का योगदान रहता है। संस्कृति के मूल उपादान तो प्रायः सुसंस्कृत और सभ्य देशों में एक सीमा तक समान रहते हैं, किन्तु बाह्य उपादानों में अन्तर अवश्य आता है, राष्ट्रीय या जातीय संस्कृति का सबसे बड़ा योगदान यही है कि वह हमें अपने राष्ट्र की परम्परा से संपृक्त बनाती है, रीति-नीति की सम्पदा को विच्छिन्न नहीं होने देती। आज के युग में राष्ट्रीय एवं जातीय संस्कृतियों के मिले अवसर अति सुलभ हो गए हैं। संस्कृतियों का पारस्परिक संघर्ष भी शुरू हो गया है। कुछ ऐसे विदेशी प्रभाव देश पर पड़ रहे हैं, जिनके आतंक ने हमें स्वयं अपनी संस्कृति के प्रति शंकालु बना दिया है। हमारी आस्था डिगने लगी है। यह हमारी वैचारिक दुर्बलता का फल है। अपनी संस्कृति को छोड़ विदेशी संस्कृति के विवेकहीन अनुकरण से हमारे राष्ट्रीय गौरव को जो ठेस पहुँच रही है। वह किसी राष्ट्रप्रेमी जागरूक व्यक्ति से छिपी नहीं। भारतीय संस्कृति में त्याग और ग्रहण की अद्भुत क्षमता रही है। अत: आज के वैज्ञानिक युग में हम किसी विदेशी संस्कृति के जीवन्त तत्त्वों को ग्रहण करने में पीछे नहीं रहना चाहेंगे, किन्तु अपनी सांस्कृतिक निधि की करके नहीं। यह परावलम्बन राष्ट्र की गरिमा के अनुरूप नहीं है। यह स्मरण रखना चाहिए कि सूर्य की आलोक प्रदायिनी किरणों से पौधे को चाहे जितनी जीवन शक्ति मिले, किन्तु अपनी जमीन और अपनी जड़ों के बिना पौधा जीवित नहीं रह सकता। अविवेकी अनुकरण अज्ञान का ही पर्याय है। संस्कृतियों के निर्माण में योगदान रहता है
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