भोजन के घतक
भोजन के घतक
Similar Questions
Explore conceptually related problems
भोजन |भोजन के घटक |अंतर्ग्रहण |प्राणियों में पोषण |पाचन |खाद्य अंतर्ग्रहण की विधियाँ |मानव में पाचन : परिचय |सारांश
भोजन के घटक |पोषक |पोषक का कार्य |पोषण |स्वपोषण |परपोषण |पादपों में पोषण विधि |प्रकाशसंश्लेषण का परिचय |प्रकाशसंश्लेषण की प्रक्रिया |सारांश
दोहरान |सरसों का पौधा |क्रियाकलाप |अंकुरण |जन्तु क्या खाते है?|भोजन के आधार पर जंतुओं का वर्गीकरण |OMR|सारांश
भूमंडलीकृत विश्व का बनना|सिल्क रूट|भोजन की यात्रा|बीमारी, व्यापार और जीत|OMR
दोहरान |भोजन को कितना पकाना चाहिए ?|अभावजन्य रोग |स्वास्थ्य |प्रश्न अभ्यास |सारांश
भूमंडलीकृत विश्व का बनना|सिल्क रूट|भोजन की यात्रा|बीमारी, व्यापार और जीत|OMR
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। गाँधीजी मानते थे कि सामाजिक या सामूहिक जीवन की ओर बढ़ने से पहले कौटुम्बिक जीवन का अनुभव प्राप्त करना आवश्यक है। इसलिए वे आश्रम-जीवन बिताते थे। वहाँ सभी एक भोजनालय में भोजन करते थे। इससे समय और धन तो बचता ही था, साथ ही सामूहिक जीवन का अभ्यास भी होता था। लेकिन यह सब होना चाहिए, समय-पालन, सुव्यवस्था और शुचिता के साथ। इस ओर लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए गाँधीजी स्वयं भी सामूहिक रसोईघर में भोजन करते थे। भोजन के समय दो बार घण्टी बजती थी। जो दूसरी घण्टी बजने तक भोजनालय में नहीं पहुँच पाता था, उसे दूसरी पंक्ति के लिए बरामदे में इन्तजार करना पड़ता था। दूसरी घण्टी बजते हो रसोईघर का द्वार बन्द कर दिया जाता था, जिससे बाद में आने वाले व्यक्ति अन्दर न आने पाएँ। एक दिन गाँधीजी पिछड़ गए। संयोग से उस दिन आश्रमवासी श्री हरिभाऊ उपाध्याय भी पिछड़ गए! जब वे वहाँ पहुँचे तो देखा कि बापू बरामदे में खड़े हैं। बैठने के लिए न बैंच हैं, न कुर्सी हरिभाऊ ने विनोद करते हुए कहा, "बापूजी आज तो आप भी गुनहगारों के कठघरे में आ गए है।" गाँधीजी खिलखिलाकर हँस पड़ें! बोले. "कानून के सामने तो सब बराबर होते हैं न?" हरिभाऊ जी ने कहा, "बैठने के लिए कुर्सी लाऊँ, बापू?" गाँधीजी बोले, "नहीं, उसकी जरूरत नहीं है। सजा पूरी भुगतनी चाहिए। उसी में सच्चा आनन्द है।" सभी भोजनालय में एक साथ भोजन करते थे। इससे