Home
Class
DN_SHORTS
हिंदी राष्ट्र भाषा नही है-Kichha Sudeep ...

हिंदी राष्ट्र भाषा नही है-Kichha Sudeep के कहने पर भड़के Ajay Devgan | Kichha Vs Ajay Devgan #shorts

Promotional Banner

Similar Questions

Explore conceptually related problems

उच्च प्राथमिक स्तर पर हिंदी भाषा के आकलन का सबसे कमजोर बिंदु है।

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। महात्मा गाँधी- जैसे महान पुरुष की सहधर्मचारिणी के तौर पर पूज्य कस्तूरबा के बारे में राष्ट्र को आदर मालूम होना स्वाभाविक है। राष्ट्र ने महात्मा जी को 'बापू जी' के नाम से राष्ट्रपिता के स्थान पर कायम किया ही है। इसलिए कस्तूरबा-भी 'बा' के एकाक्षरी नाम से राष्ट्रमाता बन सकी हैं। किन्तु सिर्फ महात्मा जी के साथ के सम्बन्ध के कारण ही नहीं, बल्कि अपने आंतरिक सद्गुण और निष्ठा के कारण भी कस्तूरबा राष्ट्रमाता बन पायी हैं। चाहे दक्षिण अफ्रीका में हों या हिन्दुस्तान में, सरकार के खिलाफ लड़ाई के समय जब-जब चारिभ्य का तेज प्रकट करने का मौका आया कस्तूरबा हमेशा इस दिव्य कसौटी से सफलतापूर्वक पार हुई हैं। इससे भी विशेष बात यह है कि बड़ी तेजी से बदलते हुए आज के युग में भी आर्य सती स्त्री का जो आदर्श हिन्दुस्तान ने अपने हृदय में कायम रखा है, उस आवर्श की जीवित प्रतिमा के रूप में राष्ट्र पूज्य कस्तूरबा को पहचानता है। इस तरह की विविध लोकोत्तर योग्यता के कारण आज सारा राष्ट्र कस्तूरबा की पूजा करता है। कस्तूरबा अनपढ़ थीं। हम यह भी कह सकते हैं कि उनका भाषा ज्ञान सामान्य देहाती से अधिक नहीं था। दक्षिण अफ्रीका में जाकर रहीं इसलिए वह कुछ अंग्रेजी समझ सकती थीं और पचीस-तीस शब्द बोल भी लेती थीं। मिस्टर एंडूज-जैसे कोई विदेशी मेहमान घर आने पर उन शब्दों की पूँजी से वह अपना काम चला लेती और कभी-कभी तो उनके उस सम्भाषण से विनोद भी पैदा हो जाता। कस्तूरबा को गीता के ऊपर असाधारण श्रद्धा थी। पढ़नेवाला कोई मिले तो वह भक्तिपूर्वक गीता पड़ने के लिए बैठ जाती। किन्तु उनकी गाड़ी कभी भी बहुत आगे नहीं जा सकी। फिर भी आगांखाँ महल में कारावास के दरमियान उन्होंने बार-बार गीता के पाठ लेने की कोशिश चालू रखी थीं।किस कारण कस्तूरबा राष्ट्रमाता बन पायौं?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। महात्मा गाँधी- जैसे महान पुरुष की सहधर्मचारिणी के तौर पर पूज्य कस्तूरबा के बारे में राष्ट्र को आदर मालूम होना स्वाभाविक है। राष्ट्र ने महात्मा जी को 'बापू जी' के नाम से राष्ट्रपिता के स्थान पर कायम किया ही है। इसलिए कस्तूरबा-भी 'बा' के एकाक्षरी नाम से राष्ट्रमाता बन सकी हैं। किन्तु सिर्फ महात्मा जी के साथ के सम्बन्ध के कारण ही नहीं, बल्कि अपने आंतरिक सद्गुण और निष्ठा के कारण भी कस्तूरबा राष्ट्रमाता बन पायी हैं। चाहे दक्षिण अफ्रीका में हों या हिन्दुस्तान में, सरकार के खिलाफ लड़ाई के समय जब-जब चारिभ्य का तेज प्रकट करने का मौका आया कस्तूरबा हमेशा इस दिव्य कसौटी से सफलतापूर्वक पार हुई हैं। इससे भी विशेष बात यह है कि बड़ी तेजी से बदलते हुए आज के युग में भी आर्य सती स्त्री का जो आदर्श हिन्दुस्तान ने अपने हृदय में कायम रखा है, उस आवर्श की जीवित प्रतिमा के रूप में राष्ट्र पूज्य कस्तूरबा को पहचानता है। इस तरह की विविध लोकोत्तर योग्यता के कारण आज सारा राष्ट्र कस्तूरबा की पूजा करता है। कस्तूरबा अनपढ़ थीं। हम यह भी कह सकते हैं कि उनका भाषा ज्ञान सामान्य देहाती से अधिक नहीं था। दक्षिण अफ्रीका में जाकर रहीं इसलिए वह कुछ अंग्रेजी समझ सकती थीं और पचीस-तीस शब्द बोल भी लेती थीं। मिस्टर एंडूज-जैसे कोई विदेशी मेहमान घर आने पर उन शब्दों की पूँजी से वह अपना काम चला लेती और कभी-कभी तो उनके उस सम्भाषण से विनोद भी पैदा हो जाता। कस्तूरबा को गीता के ऊपर असाधारण श्रद्धा थी। पढ़नेवाला कोई मिले तो वह भक्तिपूर्वक गीता पड़ने के लिए बैठ जाती। किन्तु उनकी गाड़ी कभी भी बहुत आगे नहीं जा सकी। फिर भी आगांखाँ महल में कारावास के दरमियान उन्होंने बार-बार गीता के पाठ लेने की कोशिश चालू रखी थीं। प्रस्तुत गद्यांश में विदेशी का क्या नाम था?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। महात्मा गाँधी- जैसे महान पुरुष की सहधर्मचारिणी के तौर पर पूज्य कस्तूरबा के बारे में राष्ट्र को आदर मालूम होना स्वाभाविक है। राष्ट्र ने महात्मा जी को 'बापू जी' के नाम से राष्ट्रपिता के स्थान पर कायम किया ही है। इसलिए कस्तूरबा-भी 'बा' के एकाक्षरी नाम से राष्ट्रमाता बन सकी हैं। किन्तु सिर्फ महात्मा जी के साथ के सम्बन्ध के कारण ही नहीं, बल्कि अपने आंतरिक सद्गुण और निष्ठा के कारण भी कस्तूरबा राष्ट्रमाता बन पायी हैं। चाहे दक्षिण अफ्रीका में हों या हिन्दुस्तान में, सरकार के खिलाफ लड़ाई के समय जब-जब चारिभ्य का तेज प्रकट करने का मौका आया कस्तूरबा हमेशा इस दिव्य कसौटी से सफलतापूर्वक पार हुई हैं। इससे भी विशेष बात यह है कि बड़ी तेजी से बदलते हुए आज के युग में भी आर्य सती स्त्री का जो आदर्श हिन्दुस्तान ने अपने हृदय में कायम रखा है, उस आवर्श की जीवित प्रतिमा के रूप में राष्ट्र पूज्य कस्तूरबा को पहचानता है। इस तरह की विविध लोकोत्तर योग्यता के कारण आज सारा राष्ट्र कस्तूरबा की पूजा करता है। कस्तूरबा अनपढ़ थीं। हम यह भी कह सकते हैं कि उनका भाषा ज्ञान सामान्य देहाती से अधिक नहीं था। दक्षिण अफ्रीका में जाकर रहीं इसलिए वह कुछ अंग्रेजी समझ सकती थीं और पचीस-तीस शब्द बोल भी लेती थीं। मिस्टर एंडूज-जैसे कोई विदेशी मेहमान घर आने पर उन शब्दों की पूँजी से वह अपना काम चला लेती और कभी-कभी तो उनके उस सम्भाषण से विनोद भी पैदा हो जाता। कस्तूरबा को गीता के ऊपर असाधारण श्रद्धा थी। पढ़नेवाला कोई मिले तो वह भक्तिपूर्वक गीता पड़ने के लिए बैठ जाती। किन्तु उनकी गाड़ी कभी भी बहुत आगे नहीं जा सकी। फिर भी आगांखाँ महल में कारावास के दरमियान उन्होंने बार-बार गीता के पाठ लेने की कोशिश चालू रखी थीं। कस्तूरबा को किसमें असाधारण श्रद्धा थी?

उच्च प्राथमिक स्तर पर हिंदी भाषा के आकलन में सबसे महत्त्वपूर्ण है...