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गणित की सबसे सरल समस्या जो कई बच्चे हल नहीं कर पाते | The Simplest Math Problem #shorts

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बच्चे की किशोरावस्था शिक्षा-शास्त्रियों और कला-शिक्षकों के लिए अपने आप में एक अलग ही विषय है। यह उन एक समस्या की उम्र कही गई है। कुछ विशेषज्ञ तो इसे 'संकट का समय' मानते हैं। जो भी हो, यह स्पष्ट है कि बच्चे के लिए यह अवस्था एक नया अनुभव होता है। दुनिया बदल जाती है। हो सकता है कि इस मानसिक परिवर्तन का कारण उसका अपना शारीरिक विकास भी हो। आज तक शरीर, जो एक तरीके से बढ़ रहा था, उसमें तब्दीली होने लगती है। उसके लिए यह एक ऐसा अनुभव होता है जो उसका मन अधिक-से-अधिक घेरे रहता है। समाज की परंपरा की वजह से वह इस समस्या को संकोच की वजह से प्रकाशित नहीं करता। उसे इसका खुलासा नहीं मिलता। मन की अवस्था बदल जाती है। मन दूसरी बातों से हटकर इधर-उधर भटकने लगता है। एकाग्रता नहीं रहती। शारीरिक विकास तो एक ढंग से हो जाता है। उसकी शारीरिक प्रवतियां भी सयानों की-सी होने लगती हैं। लेकिन मानस इतना विकसित अभी तक नहीं हो पाता, जिससे वह अपने आप को ठीक-ठीक समझ सके। किशोर की सबसे बड़ी चिंता का विषय है

बच्चे की किशोरावस्था शिक्षा-शास्त्रियों और कला-शिक्षकों के लिए अपने आप में एक अलग ही विषय है। यह उन एक समस्या की उम्र कही गई है। कुछ विशेषज्ञ तो इसे 'संकट का समय' मानते हैं। जो भी हो, यह स्पष्ट है कि बच्चे के लिए यह अवस्था एक नया अनुभव होता है। दुनिया बदल जाती है। हो सकता है कि इस मानसिक परिवर्तन का कारण उसका अपना शारीरिक विकास भी हो। आज तक शरीर, जो एक तरीके से बढ़ रहा था, उसमें तब्दीली होने लगती है। उसके लिए यह एक ऐसा अनुभव होता है जो उसका मन अधिक-से-अधिक घेरे रहता है। समाज की परंपरा की वजह से वह इस समस्या को संकोच की वजह से प्रकाशित नहीं करता। उसे इसका खुलासा नहीं मिलता। मन की अवस्था बदल जाती है। मन दूसरी बातों से हटकर इधर-उधर भटकने लगता है। एकाग्रता नहीं रहती। शारीरिक विकास तो एक ढंग से हो जाता है। उसकी शारीरिक प्रवतियां भी सयानों की-सी होने लगती हैं। लेकिन मानस इतना विकसित अभी तक नहीं हो पाता, जिससे वह अपने आप को ठीक-ठीक समझ सके। 'मन की अवस्था भी बदल जाती है' वाक्य में 'भी' शब्द है

बच्चे की किशोरावस्था शिक्षा-शास्त्रियों और कला-शिक्षकों के लिए अपने आप में एक अलग ही विषय है। यह उन एक समस्या की उम्र कही गई है। कुछ विशेषज्ञ तो इसे 'संकट का समय' मानते हैं। जो भी हो, यह स्पष्ट है कि बच्चे के लिए यह अवस्था एक नया अनुभव होता है। दुनिया बदल जाती है। हो सकता है कि इस मानसिक परिवर्तन का कारण उसका अपना शारीरिक विकास भी हो। आज तक शरीर, जो एक तरीके से बढ़ रहा था, उसमें तब्दीली होने लगती है। उसके लिए यह एक ऐसा अनुभव होता है जो उसका मन अधिक-से-अधिक घेरे रहता है। समाज की परंपरा की वजह से वह इस समस्या को संकोच की वजह से प्रकाशित नहीं करता। उसे इसका खुलासा नहीं मिलता। मन की अवस्था बदल जाती है। मन दूसरी बातों से हटकर इधर-उधर भटकने लगता है। एकाग्रता नहीं रहती। शारीरिक विकास तो एक ढंग से हो जाता है। उसकी शारीरिक प्रवतियां भी सयानों की-सी होने लगती हैं। लेकिन मानस इतना विकसित अभी तक नहीं हो पाता, जिससे वह अपने आप को ठीक-ठीक समझ सके। किशोरावस्था को संकट का समय' माना जाता है क्योंकि

बच्चे की किशोरावस्था शिक्षा-शास्त्रियों और कला-शिक्षकों के लिए अपने आप में एक अलग ही विषय है। यह उन एक समस्या की उम्र कही गई है। कुछ विशेषज्ञ तो इसे 'संकट का समय' मानते हैं। जो भी हो, यह स्पष्ट है कि बच्चे के लिए यह अवस्था एक नया अनुभव होता है। दुनिया बदल जाती है। हो सकता है कि इस मानसिक परिवर्तन का कारण उसका अपना शारीरिक विकास भी हो। आज तक शरीर, जो एक तरीके से बढ़ रहा था, उसमें तब्दीली होने लगती है। उसके लिए यह एक ऐसा अनुभव होता है जो उसका मन अधिक-से-अधिक घेरे रहता है। समाज की परंपरा की वजह से वह इस समस्या को संकोच की वजह से प्रकाशित नहीं करता। उसे इसका खुलासा नहीं मिलता। मन की अवस्था बदल जाती है। मन दूसरी बातों से हटकर इधर-उधर भटकने लगता है। एकाग्रता नहीं रहती। शारीरिक विकास तो एक ढंग से हो जाता है। उसकी शारीरिक प्रवतियां भी सयानों की-सी होने लगती हैं। लेकिन मानस इतना विकसित अभी तक नहीं हो पाता, जिससे वह अपने आप को ठीक-ठीक समझ सके। "दुनिया बदल जाती है' के माध्यम से किस ओर संकेत किया गया है?

बच्चे की किशोरावस्था शिक्षा-शास्त्रियों और कला-शिक्षकों के लिए अपने आप में एक अलग ही विषय है। यह उन एक समस्या की उम्र कही गई है। कुछ विशेषज्ञ तो इसे 'संकट का समय' मानते हैं। जो भी हो, यह स्पष्ट है कि बच्चे के लिए यह अवस्था एक नया अनुभव होता है। दुनिया बदल जाती है। हो सकता है कि इस मानसिक परिवर्तन का कारण उसका अपना शारीरिक विकास भी हो। आज तक शरीर, जो एक तरीके से बढ़ रहा था, उसमें तब्दीली होने लगती है। उसके लिए यह एक ऐसा अनुभव होता है जो उसका मन अधिक-से-अधिक घेरे रहता है। समाज की परंपरा की वजह से वह इस समस्या को संकोच की वजह से प्रकाशित नहीं करता। उसे इसका खुलासा नहीं मिलता। मन की अवस्था बदल जाती है। मन दूसरी बातों से हटकर इधर-उधर भटकने लगता है। एकाग्रता नहीं रहती। शारीरिक विकास तो एक ढंग से हो जाता है। उसकी शारीरिक प्रवतियां भी सयानों की-सी होने लगती हैं। लेकिन मानस इतना विकसित अभी तक नहीं हो पाता, जिससे वह अपने आप को ठीक-ठीक समझ सके।

बच्चे की किशोरावस्था शिक्षा-शास्त्रियों और कला-शिक्षकों के लिए अपने आप में एक अलग ही विषय है। यह उन एक समस्या की उम्र कही गई है। कुछ विशेषज्ञ तो इसे 'संकट का समय' मानते हैं। जो भी हो, यह स्पष्ट है कि बच्चे के लिए यह अवस्था एक नया अनुभव होता है। दुनिया बदल जाती है। हो सकता है कि इस मानसिक परिवर्तन का कारण उसका अपना शारीरिक विकास भी हो। आज तक शरीर, जो एक तरीके से बढ़ रहा था, उसमें तब्दीली होने लगती है। उसके लिए यह एक ऐसा अनुभव होता है जो उसका मन अधिक-से-अधिक घेरे रहता है। समाज की परंपरा की वजह से वह इस समस्या को संकोच की वजह से प्रकाशित नहीं करता। उसे इसका खुलासा नहीं मिलता। मन की अवस्था बदल जाती है। मन दूसरी बातों से हटकर इधर-उधर भटकने लगता है। एकाग्रता नहीं रहती। शारीरिक विकास तो एक ढंग से हो जाता है। उसकी शारीरिक प्रवतियां भी सयानों की-सी होने लगती हैं। लेकिन मानस इतना विकसित अभी तक नहीं हो पाता, जिससे वह अपने आप को ठीक-ठीक समझ सके। इधर-उधर शब्द युग्म है

बच्चे की किशोरावस्था शिक्षा-शास्त्रियों और कला-शिक्षकों के लिए अपने आप में एक अलग ही विषय है। यह उन एक समस्या की उम्र कही गई है। कुछ विशेषज्ञ तो इसे 'संकट का समय' मानते हैं। जो भी हो, यह स्पष्ट है कि बच्चे के लिए यह अवस्था एक नया अनुभव होता है। दुनिया बदल जाती है। हो सकता है कि इस मानसिक परिवर्तन का कारण उसका अपना शारीरिक विकास भी हो। आज तक शरीर, जो एक तरीके से बढ़ रहा था, उसमें तब्दीली होने लगती है। उसके लिए यह एक ऐसा अनुभव होता है जो उसका मन अधिक-से-अधिक घेरे रहता है। समाज की परंपरा की वजह से वह इस समस्या को संकोच की वजह से प्रकाशित नहीं करता। उसे इसका खुलासा नहीं मिलता। मन की अवस्था बदल जाती है। मन दूसरी बातों से हटकर इधर-उधर भटकने लगता है। एकाग्रता नहीं रहती। शारीरिक विकास तो एक ढंग से हो जाता है। उसकी शारीरिक प्रवतियां भी सयानों की-सी होने लगती हैं। लेकिन मानस इतना विकसित अभी तक नहीं हो पाता, जिससे वह अपने आप को ठीक-ठीक समझ सके। 'तब्दीली' का अर्थ है

निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले उचित विकल्प चुनिए: समस्याओं का हल ढूँढने की क्षमता पर एक अध्ययन किया गया। इसमें का भारत में तीन तरह के बच्चों की बीच तुलना की गई-एक तरफ वे बच्चे जो दुकानदारी करते हैं और स्कूल नहीं जाते, ऐसे बच्चे जो दुकान संभालते य हैं और स्कूल भी जाते हैं और तीसरा समूह उन बच्चों का था जो स्कूल जाते हैं पर दुकान पर कोई मदद नहीं करते। उनसे गणना के तथा इबारती सवाल पूछे गए। दोनों ही तरह के सवालों में उन स्कूली बच्चों ने जो दुकानदार नहीं हैं, मौखिक गणना या मनगणित का प्रयोग बहुत कम किया, बनिस्बत उनके जो दुकानदार थे। स्कूली बच्चों ने ऐसी गलतियाँ भी की, जिनका कारण नहीं समझा जा सका। इससे यह साबित होता है कि दुकामदारी से जुड़े हर बच्चे हिसाब लगाने में गलती नहीं कर सकते क्योंकि इसका सीधा असर उनके काम पर पड़ता है, जबकि स्कूलों के बच्चे वही हिसाब लगाने में अक्सर भयंकर गलतियाँ कर देते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि जिन बच्चों के रोजमर्ग की जिंदगी में इस तरह के सवालों से जूझना पड़ता है, वे अपने लिए जरूरी गणितीय क्षमता हासिल कर लेते हैं। लेकिन साथ ही इस बात पर भी गौर करना महत्त्वपूर्ण है कि इस तरह की दक्षताएँ एक स्तर तक और एक कार्य-क्षेत्र तक सीमित होकर रह जाती हैं। इसलिए वे सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश जो की ज्ञान को बनाने व बढ़ाने में मदद करते हैं, वही उस ज्ञान को संकुचित और सीमित भी कर सकते हैं। दुकानदार बच्चे हिसाब लगाने में भाषा गलती नहीं करते क्योंकि

निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले उचित विकल्प चुनिए: समस्याओं का हल ढूँढने की क्षमता पर एक अध्ययन किया गया। इसमें का भारत में तीन तरह के बच्चों की बीच तुलना की गई-एक तरफ वे बच्चे जो दुकानदारी करते हैं और स्कूल नहीं जाते, ऐसे बच्चे जो दुकान संभालते य हैं और स्कूल भी जाते हैं और तीसरा समूह उन बच्चों का था जो स्कूल जाते हैं पर दुकान पर कोई मदद नहीं करते। उनसे गणना के तथा इबारती सवाल पूछे गए। दोनों ही तरह के सवालों में उन स्कूली बच्चों ने जो दुकानदार नहीं हैं, मौखिक गणना या मनगणित का प्रयोग बहुत कम किया, बनिस्बत उनके जो दुकानदार थे। स्कूली बच्चों ने ऐसी गलतियाँ भी की, जिनका कारण नहीं समझा जा सका। इससे यह साबित होता है कि दुकामदारी से जुड़े हर बच्चे हिसाब लगाने में गलती नहीं कर सकते क्योंकि इसका सीधा असर उनके काम पर पड़ता है, जबकि स्कूलों के बच्चे वही हिसाब लगाने में अक्सर भयंकर गलतियाँ कर देते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि जिन बच्चों के रोजमर्ग की जिंदगी में इस तरह के सवालों से जूझना पड़ता है, वे अपने लिए जरूरी गणितीय क्षमता हासिल कर लेते हैं। लेकिन साथ ही इस बात पर भी गौर करना महत्त्वपूर्ण है कि इस तरह की दक्षताएँ एक स्तर तक और एक कार्य-क्षेत्र तक सीमित होकर रह जाती हैं। इसलिए वे सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश जो की ज्ञान को बनाने व बढ़ाने में मदद करते हैं, वही उस ज्ञान को संकुचित और सीमित भी कर सकते हैं। जो दक्षताएँ हमारे दैनिक जीवन में काम नहीं आती उनमें हमारा प्रदर्शन अक्सर

निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले उचित विकल्प चुनिए: समस्याओं का हल ढूँढने की क्षमता पर एक अध्ययन किया गया। इसमें का भारत में तीन तरह के बच्चों की बीच तुलना की गई-एक तरफ वे बच्चे जो दुकानदारी करते हैं और स्कूल नहीं जाते, ऐसे बच्चे जो दुकान संभालते य हैं और स्कूल भी जाते हैं और तीसरा समूह उन बच्चों का था जो स्कूल जाते हैं पर दुकान पर कोई मदद नहीं करते। उनसे गणना के तथा इबारती सवाल पूछे गए। दोनों ही तरह के सवालों में उन स्कूली बच्चों ने जो दुकानदार नहीं हैं, मौखिक गणना या मनगणित का प्रयोग बहुत कम किया, बनिस्बत उनके जो दुकानदार थे। स्कूली बच्चों ने ऐसी गलतियाँ भी की, जिनका कारण नहीं समझा जा सका। इससे यह साबित होता है कि दुकामदारी से जुड़े हर बच्चे हिसाब लगाने में गलती नहीं कर सकते क्योंकि इसका सीधा असर उनके काम पर पड़ता है, जबकि स्कूलों के बच्चे वही हिसाब लगाने में अक्सर भयंकर गलतियाँ कर देते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि जिन बच्चों के रोजमर्ग की जिंदगी में इस तरह के सवालों से जूझना पड़ता है, वे अपने लिए जरूरी गणितीय क्षमता हासिल कर लेते हैं। लेकिन साथ ही इस बात पर भी गौर करना महत्त्वपूर्ण है कि इस तरह की दक्षताएँ एक स्तर तक और एक कार्य-क्षेत्र तक सीमित होकर रह जाती हैं। इसलिए वे सामाजिक व सांस्कृतिक परिवेश जो की ज्ञान को बनाने व बढ़ाने में मदद करते हैं, वही उस ज्ञान को संकुचित और सीमित भी कर सकते हैं। समस्याओं का हल खोजने पर आधारित अध्ययन किस विषय से जुड़ा था?

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