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नमक डालने पर मर क्यों जाती है जोंक? | #s...

नमक डालने पर मर क्यों जाती है जोंक? | #shorts | Why Salt Kills Leeches? | Amazing facts

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दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 15 तुम भारत, हम भारतीय है, तुम माता, हम बेटे किसकी हिम्मत है कि तुम्हें दुष्टता-दृष्टि से देखे? ओ माता, तुम एक अरब से अधिक भुजाओ वाली सबकी रक्षा में तुम सक्षम हो अदम्य बलशाली।। भाषा, वेश, प्रदेश भिन्न है, फिर भी भाई-भाई भारत की साझी संस्कृति में पलते भारतवासी सुदिनों में हम एकसाथ हँसते, गाते, सोते हैं दुर्दिन में भी साथ-साथ जगते पौरुष होते हैं। तुम हो शस्यश्यामला, खेतों में तुम लहराती हो प्रकृति प्राणमयि, सामगानमयि, तुम न किसे भाती हो। तुम न अगर होती तो धरती, वसुधा क्यों कहलाती ? गंगा कहाँ वहा करती, गीता क्यों गाई जाती? इस कविता में किसे माता कहा गया है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 15 तुम भारत, हम भारतीय है, तुम माता, हम बेटे किसकी हिम्मत है कि तुम्हें दुष्टता-दृष्टि से देखे? ओ माता, तुम एक अरब से अधिक भुजाओ वाली सबकी रक्षा में तुम सक्षम हो अदम्य बलशाली।। भाषा, वेश, प्रदेश भिन्न है, फिर भी भाई-भाई भारत की साझी संस्कृति में पलते भारतवासी सुदिनों में हम एकसाथ हँसते, गाते, सोते हैं दुर्दिन में भी साथ-साथ जगते पौरुष होते हैं। तुम हो शस्यश्यामला, खेतों में तुम लहराती हो प्रकृति प्राणमयि, सामगानमयि, तुम न किसे भाती हो। तुम न अगर होती तो धरती, वसुधा क्यों कहलाती ? गंगा कहाँ वहा करती, गीता क्यों गाई जाती? भारत माँ की एक अरब से अधिक भुजाएं क्यों बताई गई है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 15 तुम भारत, हम भारतीय है, तुम माता, हम बेटे किसकी हिम्मत है कि तुम्हें दुष्टता-दृष्टि से देखे? ओ माता, तुम एक अरब से अधिक भुजाओ वाली सबकी रक्षा में तुम सक्षम हो अदम्य बलशाली।। भाषा, वेश, प्रदेश भिन्न है, फिर भी भाई-भाई भारत की साझी संस्कृति में पलते भारतवासी सुदिनों में हम एकसाथ हँसते, गाते, सोते हैं दुर्दिन में भी साथ-साथ जगते पौरुष होते हैं। तुम हो शस्यश्यामला, खेतों में तुम लहराती हो प्रकृति प्राणमयि, सामगानमयि, तुम न किसे भाती हो। तुम न अगर होती तो धरती, वसुधा क्यों कहलाती ? गंगा कहाँ वहा करती, गीता क्यों गाई जाती? 'सक्षम' शब्द का पर्यायवाची है

गिरते हुए जीवन उठने का ढोंग रचते हुए अपने मन को उत्थान का विश्वास भले ही दे लें, परंतु वे संसार की दृष्टि में धूल नहीं डाल सकते और उत्थान के व्यापक कार्यक्रम को धोखा नहीं दे सकते। उनके अस्तित्व पर जो अखर अंकित होंगे, आशा और कर्मण्यता की भावनाओं से भरी हुई शिराओं को उनसे कोई विशेष संदेश कदापि न मिलेगा। देश के नाम पर काम किया जाता है, स्वार्थ-त्याग की दुहाइयाँ दी जाती हैं, गिरे हुए लोगों को उठाने की ध्वनि अलापी जाती हैं, अत्याचारियों को कोसा जाता है और निरंकुशों पर दाँत पीसे जाते हैं, परंतु इन खिलाड़ियों के हदय-पट पर विस्मृति एक बड़ा ही मनोहर पट डाल दिया करती है। हल्के रंग के उड़ते ही जब गहरे रंग की बारी आती है, तब खिलाड़ी लोग अपने-अपने नकाबों को उतार डालते हैं। जो सौजन्य और शिष्टता की मूर्ति थे, जो देशभक्ति और त्याग के अवतार और तपस्या के रूप थे, जो प्रभुओं के उपेखक और दासों के दास थे. आँखें आश्चर्य से देखती हैं कि वे अशिष्टता और स्वार्थ के मैदान में सरपट दौड़ लगा रहे हैं। गालियाँ और बुराइयाँ उनके मुँह और कलेजे के भूषण हो जाती हैं। नेक-नियती केवल उन्हीं के पल्ले रहती है और बेईमानी का कलंक दूसरों के माथे पर। खूब दौड़ लगाते हैं। खूब एड़ी और चोटी का पसीना एक कर देते हैं, परंतु देश की किसी आवश्यकता को पूरा करने के लिए नहीं, अपने को प्रतिष्ठित और शक्तिशाली बनाने के लिए। निरंकुशों को गालियाँ देते हैं. परंतु स्वयं निरंकुशता का दम भरते हैं। लेखक के अनुसार खिलाड़ी अत्यधिक परिश्रम क्यों करते थे?

बाल-मस्तिष्क की प्रकृति की यह माँग होती है कि बच्चे का बौद्धिक विकास विचारों के स्रोत के पास हो। दूसरे शब्दों में, यह ठोस, वास्तविक बिम्बों के बीच और सर्वप्रथम प्रकृति की गोद में हो, जहाँ बच्चा ठोस बिम्ब को देखे, सुने और फिर उसका विचार इस बिम्ब के बारे में प्राप्त सूचना के 'संसाधन' के काम में लगे। जब बच्चे को प्रकृति से दूर रखा जाता है, जब बच्चा पढ़ाई के पहले दिन से ही केवल शब्दों के रूप में सारा ज्ञान और बोध पाता है, तो उसके मस्तिष्क की कोशिकाएं जल्दी ही थक जाती है और अध्यापक द्वारा प्रस्तुत काम को निभा नहीं पाती और इन कोशिकाओं को तो अभी विकसित, सशक्त, सुदृढ़ होना है। यही पर उस बात का कारण छिपा है, जो प्राथमिक कक्षाओं में अक्सर देखने में आती है-बच्चा चुपचाप बैठा अध्यापक की आँखों में आँखें डाले देखता है, मानो बड़े ध्यान से सुन रहा हो, लेकिन वास्तव में वह एक शब्द भी नहीं समझ पाता, क्योक बच्चे को नियमों पर सोच-विचार करना पड़ता है, और ये सब अमूर्त सामान्यीकृत बातें होती हैं। बच्चों को प्रकृति के निकट रखने की बात क्यों की गई है?