इसी से बना है हमारा Sun पर यह Earth पे बोहोत rare हैं | #shorts | explore the fact | amazing facts
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An aeroplane flying horizontally at a height of 3 Km. above the ground is observed at a certain point on earth to subtend an angle of 60^@ . After 15 sec flight, its angle of elevation is changed to 30^@ . The speed of the aeroplane (taking sqrt3 = 1.732) is- कोई वायुयान पृथ्वी की सतह से 3 कि.मी. ऊपर क्षेतिज उड़ रहा है। पृथ्वी से किसी बिन्दु से यह देखने में आता है कि वह 60^@ के कोण पर कक्षांतरित होता है। 15 सेकण्ड बाद उसका उन्नयन कोण 30^@ परिवर्तित हो जाता हैं वायुयान की चाल बताइए। ( sqrt3 =1.732)
मेरे मकान के आगे चौराहे पर ढाबे के आगे फुटपाथ पर खाना खाने वाले लोग बैठते हैंरिक्शेवाले, मजदूर, फेरीवाले, कबाड़ी वाले.....| आना-जाना लगा ही रहता है। लोग कहते हैं-''आपको बुरा नहीं लगता ? लोग सड़क पर गंदा फैला रहे हैं और आप इन्हें बरदाश्त कर रहे है? इनके कारण पूरे मोहल्ले की आबोहवा खराब हो रही है।'' मैं उनकी बातों को हलके में ही लेता हूँ। मुझे पता है कि यहाँ जो लोग जुटते हैं वे गरीब लोग होते हैं। अपने काम-धाम के बीच रोटी खाने चले आते हैं और खाकर चले जाते हैं। ये आमतौर पर बिहार से आए गरीब ईमानदार लोग है जो हमारे इस परिसर के स्थायी सदस्य हो गए हैं। ये उन अशिष्ट अमीरों से भिन्न हैं जो साधारण से बात पर भी हंगामा खड़ा कर देते हैं। लोगों के पास पैसा तो आ गया पर धनी होने का शऊर नहीं आया। अधजल गगरी छलकत जाए की तर्ज पर इनमें दिखावे की भावना उबाल खाती है। असल में यह ढाबा हमें भी अपने माहौल से जोड़ता है। मैं लेखक हूँ तो क्या हुआ ? गाँव के एक सामान्य घर से आया हुआ व्यक्ति हूँ। बचपन में गाँव घर की गरीबी देखी है और भोगी भी है। खेतों की मिट्टी में रमा हूँ, वह मुझमें रमी है। आज भी है। खेतों की मिट्टी को झाडझूड़ कर भले ही शहरी बनने की कोशिश करता हूँ, बन नहीं पाता। वह मिट्टी बाहर से चाहे न दिखाई दे. अपनी महक और रसमयता से वह मेरे भीतर बसी हुई है। इसलिए मिट्टी से जुड़े ये तमाम लोग भाते है लेकिन कोई किसी के प्रति गाँठ नही बाँधता। दूसरे तीसरे ही दिन परस्पर हँसते-बतियाते और एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होते दिखाई पड़ते हैं। ये कभी-न-कभी एक-दूसरे से लड़ चुके हैं लेकिन कभी इसकी प्रतीति नहीं होती कि ये लड़ चुके हैं। कल के गुस्से को अगले दिन धूल की तरह झाड़कर फेंक देते हैं। लोग लेखक से क्यों पूछते हैं कि क्या आपको बुरा नहीं लगता?
मेरे मकान के आगे चौराहे पर ढाबे के आगे फुटपाथ पर खाना खाने वाले लोग बैठते हैंरिक्शेवाले, मजदूर, फेरीवाले, कबाड़ी वाले.....| आना-जाना लगा ही रहता है। लोग कहते हैं-''आपको बुरा नहीं लगता ? लोग सड़क पर गंदा फैला रहे हैं और आप इन्हें बरदाश्त कर रहे है? इनके कारण पूरे मोहल्ले की आबोहवा खराब हो रही है।'' मैं उनकी बातों को हलके में ही लेता हूँ। मुझे पता है कि यहाँ जो लोग जुटते हैं वे गरीब लोग होते हैं। अपने काम-धाम के बीच रोटी खाने चले आते हैं और खाकर चले जाते हैं। ये आमतौर पर बिहार से आए गरीब ईमानदार लोग है जो हमारे इस परिसर के स्थायी सदस्य हो गए हैं। ये उन अशिष्ट अमीरों से भिन्न हैं जो साधारण से बात पर भी हंगामा खड़ा कर देते हैं। लोगों के पास पैसा तो आ गया पर धनी होने का शऊर नहीं आया। अधजल गगरी छलकत जाए की तर्ज पर इनमें दिखावे की भावना उबाल खाती है। असल में यह ढाबा हमें भी अपने माहौल से जोड़ता है। मैं लेखक हूँ तो क्या हुआ ? गाँव के एक सामान्य घर से आया हुआ व्यक्ति हूँ। बचपन में गाँव घर की गरीबी देखी है और भोगी भी है। खेतों की मिट्टी में रमा हूँ, वह मुझमें रमी है। आज भी है। खेतों की मिट्टी को झाडझूड़ कर भले ही शहरी बनने की कोशिश करता हूँ, बन नहीं पाता। वह मिट्टी बाहर से चाहे न दिखाई दे. अपनी महक और रसमयता से वह मेरे भीतर बसी हुई है। इसलिए मिट्टी से जुड़े ये तमाम लोग भाते है लेकिन कोई किसी के प्रति गाँठ नही बाँधता। दूसरे तीसरे ही दिन परस्पर हँसते-बतियाते और एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होते दिखाई पड़ते हैं। ये कभी-न-कभी एक-दूसरे से लड़ चुके हैं लेकिन कभी इसकी प्रतीति नहीं होती कि ये लड़ चुके हैं। कल के गुस्से को अगले दिन धूल की तरह झाड़कर फेंक देते हैं। प्रस्तुत गद्यांश साहित्य की किस विधा के अंतर्गत आएगा?
मेरे मकान के आगे चौराहे पर ढाबे के आगे फुटपाथ पर खाना खाने वाले लोग बैठते हैंरिक्शेवाले, मजदूर, फेरीवाले, कबाड़ी वाले.....| आना-जाना लगा ही रहता है। लोग कहते हैं-''आपको बुरा नहीं लगता ? लोग सड़क पर गंदा फैला रहे हैं और आप इन्हें बरदाश्त कर रहे है? इनके कारण पूरे मोहल्ले की आबोहवा खराब हो रही है।'' मैं उनकी बातों को हलके में ही लेता हूँ। मुझे पता है कि यहाँ जो लोग जुटते हैं वे गरीब लोग होते हैं। अपने काम-धाम के बीच रोटी खाने चले आते हैं और खाकर चले जाते हैं। ये आमतौर पर बिहार से आए गरीब ईमानदार लोग है जो हमारे इस परिसर के स्थायी सदस्य हो गए हैं। ये उन अशिष्ट अमीरों से भिन्न हैं जो साधारण से बात पर भी हंगामा खड़ा कर देते हैं। लोगों के पास पैसा तो आ गया पर धनी होने का शऊर नहीं आया। अधजल गगरी छलकत जाए की तर्ज पर इनमें दिखावे की भावना उबाल खाती है। असल में यह ढाबा हमें भी अपने माहौल से जोड़ता है। मैं लेखक हूँ तो क्या हुआ ? गाँव के एक सामान्य घर से आया हुआ व्यक्ति हूँ। बचपन में गाँव घर की गरीबी देखी है और भोगी भी है। खेतों की मिट्टी में रमा हूँ, वह मुझमें रमी है। आज भी है। खेतों की मिट्टी को झाडझूड़ कर भले ही शहरी बनने की कोशिश करता हूँ, बन नहीं पाता। वह मिट्टी बाहर से चाहे न दिखाई दे. अपनी महक और रसमयता से वह मेरे भीतर बसी हुई है। इसलिए मिट्टी से जुड़े ये तमाम लोग भाते है लेकिन कोई किसी के प्रति गाँठ नही बाँधता। दूसरे तीसरे ही दिन परस्पर हँसते-बतियाते और एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होते दिखाई पड़ते हैं। ये कभी-न-कभी एक-दूसरे से लड़ चुके हैं लेकिन कभी इसकी प्रतीति नहीं होती कि ये लड़ चुके हैं। कल के गुस्से को अगले दिन धूल की तरह झाड़कर फेंक देते हैं। 'गाँठ बाँधना' का अर्थ है:
मेरे मकान के आगे चौराहे पर ढाबे के आगे फुटपाथ पर खाना खाने वाले लोग बैठते हैंरिक्शेवाले, मजदूर, फेरीवाले, कबाड़ी वाले.....| आना-जाना लगा ही रहता है। लोग कहते हैं-''आपको बुरा नहीं लगता ? लोग सड़क पर गंदा फैला रहे हैं और आप इन्हें बरदाश्त कर रहे है? इनके कारण पूरे मोहल्ले की आबोहवा खराब हो रही है।'' मैं उनकी बातों को हलके में ही लेता हूँ। मुझे पता है कि यहाँ जो लोग जुटते हैं वे गरीब लोग होते हैं। अपने काम-धाम के बीच रोटी खाने चले आते हैं और खाकर चले जाते हैं। ये आमतौर पर बिहार से आए गरीब ईमानदार लोग है जो हमारे इस परिसर के स्थायी सदस्य हो गए हैं। ये उन अशिष्ट अमीरों से भिन्न हैं जो साधारण से बात पर भी हंगामा खड़ा कर देते हैं। लोगों के पास पैसा तो आ गया पर धनी होने का शऊर नहीं आया। अधजल गगरी छलकत जाए की तर्ज पर इनमें दिखावे की भावना उबाल खाती है। असल में यह ढाबा हमें भी अपने माहौल से जोड़ता है। मैं लेखक हूँ तो क्या हुआ ? गाँव के एक सामान्य घर से आया हुआ व्यक्ति हूँ। बचपन में गाँव घर की गरीबी देखी है और भोगी भी है। खेतों की मिट्टी में रमा हूँ, वह मुझमें रमी है। आज भी है। खेतों की मिट्टी को झाडझूड़ कर भले ही शहरी बनने की कोशिश करता हूँ, बन नहीं पाता। वह मिट्टी बाहर से चाहे न दिखाई दे. अपनी महक और रसमयता से वह मेरे भीतर बसी हुई है। इसलिए मिट्टी से जुड़े ये तमाम लोग भाते है लेकिन कोई किसी के प्रति गाँठ नही बाँधता। दूसरे तीसरे ही दिन परस्पर हँसते-बतियाते और एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होते दिखाई पड़ते हैं। ये कभी-न-कभी एक-दूसरे से लड़ चुके हैं लेकिन कभी इसकी प्रतीति नहीं होती कि ये लड़ चुके हैं। कल के गुस्से को अगले दिन धूल की तरह झाड़कर फेंक देते हैं। लेखक लोगों की शिकायतों को हलके में लेता है, क्योंकि
मेरे मकान के आगे चौराहे पर ढाबे के आगे फुटपाथ पर खाना खाने वाले लोग बैठते हैंरिक्शेवाले, मजदूर, फेरीवाले, कबाड़ी वाले.....| आना-जाना लगा ही रहता है। लोग कहते हैं-''आपको बुरा नहीं लगता ? लोग सड़क पर गंदा फैला रहे हैं और आप इन्हें बरदाश्त कर रहे है? इनके कारण पूरे मोहल्ले की आबोहवा खराब हो रही है।'' मैं उनकी बातों को हलके में ही लेता हूँ। मुझे पता है कि यहाँ जो लोग जुटते हैं वे गरीब लोग होते हैं। अपने काम-धाम के बीच रोटी खाने चले आते हैं और खाकर चले जाते हैं। ये आमतौर पर बिहार से आए गरीब ईमानदार लोग है जो हमारे इस परिसर के स्थायी सदस्य हो गए हैं। ये उन अशिष्ट अमीरों से भिन्न हैं जो साधारण से बात पर भी हंगामा खड़ा कर देते हैं। लोगों के पास पैसा तो आ गया पर धनी होने का शऊर नहीं आया। अधजल गगरी छलकत जाए की तर्ज पर इनमें दिखावे की भावना उबाल खाती है। असल में यह ढाबा हमें भी अपने माहौल से जोड़ता है। मैं लेखक हूँ तो क्या हुआ ? गाँव के एक सामान्य घर से आया हुआ व्यक्ति हूँ। बचपन में गाँव घर की गरीबी देखी है और भोगी भी है। खेतों की मिट्टी में रमा हूँ, वह मुझमें रमी है। आज भी है। खेतों की मिट्टी को झाडझूड़ कर भले ही शहरी बनने की कोशिश करता हूँ, बन नहीं पाता। वह मिट्टी बाहर से चाहे न दिखाई दे. अपनी महक और रसमयता से वह मेरे भीतर बसी हुई है। इसलिए मिट्टी से जुड़े ये तमाम लोग भाते है लेकिन कोई किसी के प्रति गाँठ नही बाँधता। दूसरे तीसरे ही दिन परस्पर हँसते-बतियाते और एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होते दिखाई पड़ते हैं। ये कभी-न-कभी एक-दूसरे से लड़ चुके हैं लेकिन कभी इसकी प्रतीति नहीं होती कि ये लड़ चुके हैं। कल के गुस्से को अगले दिन धूल की तरह झाड़कर फेंक देते हैं। साधारण बात पर भी हंगामा कौन खड़ा कर देते हैं?
मेरे मकान के आगे चौराहे पर ढाबे के आगे फुटपाथ पर खाना खाने वाले लोग बैठते हैंरिक्शेवाले, मजदूर, फेरीवाले, कबाड़ी वाले.....| आना-जाना लगा ही रहता है। लोग कहते हैं-''आपको बुरा नहीं लगता ? लोग सड़क पर गंदा फैला रहे हैं और आप इन्हें बरदाश्त कर रहे है? इनके कारण पूरे मोहल्ले की आबोहवा खराब हो रही है।'' मैं उनकी बातों को हलके में ही लेता हूँ। मुझे पता है कि यहाँ जो लोग जुटते हैं वे गरीब लोग होते हैं। अपने काम-धाम के बीच रोटी खाने चले आते हैं और खाकर चले जाते हैं। ये आमतौर पर बिहार से आए गरीब ईमानदार लोग है जो हमारे इस परिसर के स्थायी सदस्य हो गए हैं। ये उन अशिष्ट अमीरों से भिन्न हैं जो साधारण से बात पर भी हंगामा खड़ा कर देते हैं। लोगों के पास पैसा तो आ गया पर धनी होने का शऊर नहीं आया। अधजल गगरी छलकत जाए की तर्ज पर इनमें दिखावे की भावना उबाल खाती है। असल में यह ढाबा हमें भी अपने माहौल से जोड़ता है। मैं लेखक हूँ तो क्या हुआ ? गाँव के एक सामान्य घर से आया हुआ व्यक्ति हूँ। बचपन में गाँव घर की गरीबी देखी है और भोगी भी है। खेतों की मिट्टी में रमा हूँ, वह मुझमें रमी है। आज भी है। खेतों की मिट्टी को झाडझूड़ कर भले ही शहरी बनने की कोशिश करता हूँ, बन नहीं पाता। वह मिट्टी बाहर से चाहे न दिखाई दे. अपनी महक और रसमयता से वह मेरे भीतर बसी हुई है। इसलिए मिट्टी से जुड़े ये तमाम लोग भाते है लेकिन कोई किसी के प्रति गाँठ नही बाँधता। दूसरे तीसरे ही दिन परस्पर हँसते-बतियाते और एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होते दिखाई पड़ते हैं। ये कभी-न-कभी एक-दूसरे से लड़ चुके हैं लेकिन कभी इसकी प्रतीति नहीं होती कि ये लड़ चुके हैं। कल के गुस्से को अगले दिन धूल की तरह झाड़कर फेंक देते हैं। ''इस दुनिया में कहा-सुनी होती है''-'इस दुनिया' का संकेत है:
मेरे मकान के आगे चौराहे पर ढाबे के आगे फुटपाथ पर खाना खाने वाले लोग बैठते हैंरिक्शेवाले, मजदूर, फेरीवाले, कबाड़ी वाले.....| आना-जाना लगा ही रहता है। लोग कहते हैं-''आपको बुरा नहीं लगता ? लोग सड़क पर गंदा फैला रहे हैं और आप इन्हें बरदाश्त कर रहे है? इनके कारण पूरे मोहल्ले की आबोहवा खराब हो रही है।'' मैं उनकी बातों को हलके में ही लेता हूँ। मुझे पता है कि यहाँ जो लोग जुटते हैं वे गरीब लोग होते हैं। अपने काम-धाम के बीच रोटी खाने चले आते हैं और खाकर चले जाते हैं। ये आमतौर पर बिहार से आए गरीब ईमानदार लोग है जो हमारे इस परिसर के स्थायी सदस्य हो गए हैं। ये उन अशिष्ट अमीरों से भिन्न हैं जो साधारण से बात पर भी हंगामा खड़ा कर देते हैं। लोगों के पास पैसा तो आ गया पर धनी होने का शऊर नहीं आया। अधजल गगरी छलकत जाए की तर्ज पर इनमें दिखावे की भावना उबाल खाती है। असल में यह ढाबा हमें भी अपने माहौल से जोड़ता है। मैं लेखक हूँ तो क्या हुआ ? गाँव के एक सामान्य घर से आया हुआ व्यक्ति हूँ। बचपन में गाँव घर की गरीबी देखी है और भोगी भी है। खेतों की मिट्टी में रमा हूँ, वह मुझमें रमी है। आज भी है। खेतों की मिट्टी को झाडझूड़ कर भले ही शहरी बनने की कोशिश करता हूँ, बन नहीं पाता। वह मिट्टी बाहर से चाहे न दिखाई दे. अपनी महक और रसमयता से वह मेरे भीतर बसी हुई है। इसलिए मिट्टी से जुड़े ये तमाम लोग भाते है लेकिन कोई किसी के प्रति गाँठ नही बाँधता। दूसरे तीसरे ही दिन परस्पर हँसते-बतियाते और एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होते दिखाई पड़ते हैं। ये कभी-न-कभी एक-दूसरे से लड़ चुके हैं लेकिन कभी इसकी प्रतीति नहीं होती कि ये लड़ चुके हैं। कल के गुस्से को अगले दिन धूल की तरह झाड़कर फेंक देते हैं। 'अधजल गगरी छलकत जाए' किसके संदर्भ में कहा गया है?
मेरे मकान के आगे चौराहे पर ढाबे के आगे फुटपाथ पर खाना खाने वाले लोग बैठते हैंरिक्शेवाले, मजदूर, फेरीवाले, कबाड़ी वाले.....| आना-जाना लगा ही रहता है। लोग कहते हैं-''आपको बुरा नहीं लगता ? लोग सड़क पर गंदा फैला रहे हैं और आप इन्हें बरदाश्त कर रहे है? इनके कारण पूरे मोहल्ले की आबोहवा खराब हो रही है।'' मैं उनकी बातों को हलके में ही लेता हूँ। मुझे पता है कि यहाँ जो लोग जुटते हैं वे गरीब लोग होते हैं। अपने काम-धाम के बीच रोटी खाने चले आते हैं और खाकर चले जाते हैं। ये आमतौर पर बिहार से आए गरीब ईमानदार लोग है जो हमारे इस परिसर के स्थायी सदस्य हो गए हैं। ये उन अशिष्ट अमीरों से भिन्न हैं जो साधारण से बात पर भी हंगामा खड़ा कर देते हैं। लोगों के पास पैसा तो आ गया पर धनी होने का शऊर नहीं आया। अधजल गगरी छलकत जाए की तर्ज पर इनमें दिखावे की भावना उबाल खाती है। असल में यह ढाबा हमें भी अपने माहौल से जोड़ता है। मैं लेखक हूँ तो क्या हुआ ? गाँव के एक सामान्य घर से आया हुआ व्यक्ति हूँ। बचपन में गाँव घर की गरीबी देखी है और भोगी भी है। खेतों की मिट्टी में रमा हूँ, वह मुझमें रमी है। आज भी है। खेतों की मिट्टी को झाडझूड़ कर भले ही शहरी बनने की कोशिश करता हूँ, बन नहीं पाता। वह मिट्टी बाहर से चाहे न दिखाई दे. अपनी महक और रसमयता से वह मेरे भीतर बसी हुई है। इसलिए मिट्टी से जुड़े ये तमाम लोग भाते है लेकिन कोई किसी के प्रति गाँठ नही बाँधता। दूसरे तीसरे ही दिन परस्पर हँसते-बतियाते और एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होते दिखाई पड़ते हैं। ये कभी-न-कभी एक-दूसरे से लड़ चुके हैं लेकिन कभी इसकी प्रतीति नहीं होती कि ये लड़ चुके हैं। कल के गुस्से को अगले दिन धूल की तरह झाड़कर फेंक देते हैं। 'धूल की तरह झाड़कर फेंक देना' का आशय है:
मेरे मकान के आगे 'चौराहे पर ढाबे के आगे फुटपाथ पर खाना खाने वाले लोग बैठते हैं-रिक्शेवाले, मजदूर, फेरीवाले, कबाड़ी वाले...! आना-जाना लगा ही रहता है। लोग कहते हैं "आपको बुरा नहीं लगता? लोग सड़क पर गन्दा फैला रहे हैं और आप इन्हें बरदाश्त कर रहे है? इनके कारण पूरे मोहल्ले की आबोहवा खराब हो रही है।" मैं उनकी बातों को हल्के में ही लेता हूँ। मुझे पता है कि यहाँ जो लोग जुटते है वे गरीब लोग होते हैं। अपने काम-धाम के बीच रोटी खाने चले आते हैं और खाकर चले जाते हैं। ये आमतौर पर बिहार से आए गरीब ईमानदार लोग हैं जो हमारे इस परिसर के स्थायी सदस्य हो गए हैं। ये उन अशिष्ट अमीरों से भिन्न है, जो साधारण-सी बात पर भी हंगामा खड़ा कर देते हैं। लोगों के पास पैसा तो आ गया पर धनी होने का शऊर नहीं आया। अधजल गगरी छलकत जाए की तर्ज पर इनमें दिखावे की भावना उबाल खाती है। असल में यह दावा हमें भी अपने माहौल से जोड़ता है। मैं लेखक हूँ तो क्या हुआ? गांव के एक सामान्य घर से आया हुआ व्यक्ति हूँ। बचपन में गाँव-घरों की गरीबी देखी है और भोगी भी है। खेतों की मिट्टी में रमा हूँ, वह मुझमें रमी है। आज भी उस मिट्टी को झाडझूड़ कर भले ही शहरी बनने की कोशिश करता हूँ, बन नहीं पाता। वह मिट्टी बाहर से चाहे न दिखाई दे, अपनी महक और रसमयता से वह मेरे भीतर बसी हुई है। इसीलिए मुझे मिट्टी से जुड़े ये तमाम लोग भाते हैं। इस दुनिया में कहा-सुनी होती है, हाथापाई भी हो जाती है लेकिन कोई किसी के प्रति गाँठ नहीं बाँधता। दूसरे-तीसरे ही दिन परस्पर हँसते-बत्तियाते और एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होते दिखाई पड़ते हैं। ये सभी कभी-न-कभी एक-दूसरे से लड़ चुके हैं लेकिन कभी इसकी प्रतीति नहीं होती कि ये लड़ चुके हैं। कल के गुस्से को अगले दिन धूल को तरह झाड़कर फेंक देते हैं। 'गाँठ बाँधना' का अर्थ है
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