भारत का सबसे ज्यादा गन्ना उत्पादक करने वाला राज्य कौन है? GK question and answer | GK short video
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The given pie chart shows the percentage distribution of 450 employees in an organization. Study the pie chart and answer the questions that follow दिए गए पाई चार्ट एक संगठन में 450 कर्मचारियों के प्रतिशत को दर्शाता है। पाई चार्ट का अध्ययन करें और आने वाले प्रश्नों का उत्तर दें। What is the central angle of the sector representing the number of employees in department A? विभाग A में कर्मचारियों की संख्या का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षेत्र का केंद्रीय कोण क्या है?
The given graph represents the rainfall (in cm) in a city, over a period of six years. Study the graph and answer the question that follows. दिया गया आरेख एक शहर में छह साल में हुई वर्षा (सेमी में) को प्रदर्शित करता है। आरेख का अध्ययन करें और उस प्रश्न का उत्तर दें, जो पूछा गया है। In which two consecutive years was the difference of the rainfall minimum? कौन से लगातार दो वर्षों में वर्षा का अंतर न्यूनतम था?
Study the given histogram that shows the marks obtained by students in an examination and answer the question that follows: दिए गए हिस्टोग्राम का अध्ययन करें जो एक परीक्षा में छात्रों द्वारा प्राप्त किए गए अंकों को दिखाता है और निम्न प्रश्न का उत्तर दे| The number of students who obtained less than 200 marks is: 200 से कम अंक प्राप्त करने वाले छात्रों की संख्या है:
The following pie chart shows percentage expenditure of a country on different heads. The total expenditure in Rs. 1,680(in billion). Study the chart and answer the question. निम्नलिखित पाई चार्ट अलग-अलग प्रमुखों पर किसी देश का प्रतिशत व्यय दर्शाता है। 1,680 (बिलियन में) कुल खर्च। चार्ट का अध्ययन करें और प्रश्न का उत्तर दें। The central angle of the sector representing expenditure on interest payment is: ब्याज भुगतान पर व्यय का प्रतिनिधित्व करने वाले क्षेत्र का केंद्रीय कोण है
गोदान' प्रेमचन्द जी की उन अमर कृतियों में से एक है, जिसमें ग्रामीण भारत की आत्मा का करुण चित्र साकार हो उठा है। इसी कारण कई मनीषी आलोचक इसे ग्रामीण भारतीय परिवेशगत समस्याओं का महाकाव्य मानते हैं तो कई विद्वान् इसे ग्रामीण-जीवन और कृषि-संस्कृति का शोक गीत स्वीकारते हैं। कुछ विद्वान् तो ऐसे भी हैं कि जो इस उपन्यास को ग्रामीण भारत की आधुनिक 'गीता' तक स्वीकार करते हैं, जो कुछ भी हो, 'गोदान' वास्तव में मुंशी प्रेमचन्द का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें आचार-विचार, संस्कार और प्राकृतिक परिवेश, जो गहन करुणा से युक्त है, प्रतिबिम्बित हो उठा है। डॉ। गोपाल राय का कहना है कि 'गोदान' ग्राम-जीवन और ग्राम संस्कृति को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करने वाला अद्वितीय उपन्यास है न केवल हिन्दी । के वरन् किसी भी भारतीय भाषा के किसी भी उपन्यास में ग्रामीण समाज का । ऐसा व्यापक यथार्थ और सहानुभूतिपूर्ण चित्रण नहीं हुआ है। ग्रामीण जीवन और संस्कृति के अंकन की दृष्टि से इस उपन्यास का वही महत्त्व है, जो आधुनिक युग में युग जीवन की अभिव्यक्ति की दृष्टि से महाकाव्यों का हुआ करता था। इस प्रकार डॉ। राय गोदान को आधुनिक युग का महाकाव्य ही नहीं स्वीकारते वरन् सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य भी स्वीकारते हैं। उनके इस कथन का यही आशय है कि प्रेमचन्द जी ने ग्राम-जीवन से सम्बद्ध सभी पक्षों का न । केवल अत्यन्त विशदत्ता से चित्रण किया है, वरन् उनकी गहराइयों में जाकर उनके सच्चे चित्र प्रस्तुत कर दिए हैं। प्रेमचन्द जी ने जिस ग्राम-जीवन का चित्र गोदान में प्रस्तुत किया है, उसका सम्बन्ध आज ग्राम परिवेश से न होकर तत्कालीन ग्राम-जीवन से है। ग्रामीण जीवन को वास्तविक आधार प्रदान करने के लिए प्रेमचन्द जी ने चित्र के अनुरूप ही कुछ ऐसे खाँचे अथवा चित्रफलक निर्मित किए हैं, जो चित्र को - यथार्थ बनाने में सहयोगी सिद्ध हुए हैं। ग्रामीण किसानों के घर-द्वार, खेत-खलिहान और प्राकृतिक दृश्यों का ऐसा वास्तविक चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है। 'गोदान' है
गोदान' प्रेमचन्द जी की उन अमर कृतियों में से एक है, जिसमें ग्रामीण भारत की आत्मा का करुण चित्र साकार हो उठा है। इसी कारण कई मनीषी आलोचक इसे ग्रामीण भारतीय परिवेशगत समस्याओं का महाकाव्य मानते हैं तो कई विद्वान् इसे ग्रामीण-जीवन और कृषि-संस्कृति का शोक गीत स्वीकारते हैं। कुछ विद्वान् तो ऐसे भी हैं कि जो इस उपन्यास को ग्रामीण भारत की आधुनिक 'गीता' तक स्वीकार करते हैं, जो कुछ भी हो, 'गोदान' वास्तव में मुंशी प्रेमचन्द का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें आचार-विचार, संस्कार और प्राकृतिक परिवेश, जो गहन करुणा से युक्त है, प्रतिबिम्बित हो उठा है। डॉ। गोपाल राय का कहना है कि 'गोदान' ग्राम-जीवन और ग्राम संस्कृति को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करने वाला अद्वितीय उपन्यास है न केवल हिन्दी । के वरन् किसी भी भारतीय भाषा के किसी भी उपन्यास में ग्रामीण समाज का । ऐसा व्यापक यथार्थ और सहानुभूतिपूर्ण चित्रण नहीं हुआ है। ग्रामीण जीवन और संस्कृति के अंकन की दृष्टि से इस उपन्यास का वही महत्त्व है, जो आधुनिक युग में युग जीवन की अभिव्यक्ति की दृष्टि से महाकाव्यों का हुआ करता था। इस प्रकार डॉ। राय गोदान को आधुनिक युग का महाकाव्य ही नहीं स्वीकारते वरन् सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य भी स्वीकारते हैं। उनके इस कथन का यही आशय है कि प्रेमचन्द जी ने ग्राम-जीवन से सम्बद्ध सभी पक्षों का न । केवल अत्यन्त विशदत्ता से चित्रण किया है, वरन् उनकी गहराइयों में जाकर उनके सच्चे चित्र प्रस्तुत कर दिए हैं। प्रेमचन्द जी ने जिस ग्राम-जीवन का चित्र गोदान में प्रस्तुत किया है, उसका सम्बन्ध आज ग्राम परिवेश से न होकर तत्कालीन ग्राम-जीवन से है। ग्रामीण जीवन को वास्तविक आधार प्रदान करने के लिए प्रेमचन्द जी ने चित्र के अनुरूप ही कुछ ऐसे खाँचे अथवा चित्रफलक निर्मित किए हैं, जो चित्र को - यथार्थ बनाने में सहयोगी सिद्ध हुए हैं। ग्रामीण किसानों के घर-द्वार, खेत-खलिहान और प्राकृतिक दृश्यों का ऐसा वास्तविक चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है। 'गोदान' को किसने महाकाव्य माना है?
गोदान' प्रेमचन्द जी की उन अमर कृतियों में से एक है, जिसमें ग्रामीण भारत की आत्मा का करुण चित्र साकार हो उठा है। इसी कारण कई मनीषी आलोचक इसे ग्रामीण भारतीय परिवेशगत समस्याओं का महाकाव्य मानते हैं तो कई विद्वान् इसे ग्रामीण-जीवन और कृषि-संस्कृति का शोक गीत स्वीकारते हैं। कुछ विद्वान् तो ऐसे भी हैं कि जो इस उपन्यास को ग्रामीण भारत की आधुनिक 'गीता' तक स्वीकार करते हैं, जो कुछ भी हो, 'गोदान' वास्तव में मुंशी प्रेमचन्द का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें आचार-विचार, संस्कार और प्राकृतिक परिवेश, जो गहन करुणा से युक्त है, प्रतिबिम्बित हो उठा है। डॉ। गोपाल राय का कहना है कि 'गोदान' ग्राम-जीवन और ग्राम संस्कृति को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करने वाला अद्वितीय उपन्यास है न केवल हिन्दी । के वरन् किसी भी भारतीय भाषा के किसी भी उपन्यास में ग्रामीण समाज का । ऐसा व्यापक यथार्थ और सहानुभूतिपूर्ण चित्रण नहीं हुआ है। ग्रामीण जीवन और संस्कृति के अंकन की दृष्टि से इस उपन्यास का वही महत्त्व है, जो आधुनिक युग में युग जीवन की अभिव्यक्ति की दृष्टि से महाकाव्यों का हुआ करता था। इस प्रकार डॉ। राय गोदान को आधुनिक युग का महाकाव्य ही नहीं स्वीकारते वरन् सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य भी स्वीकारते हैं। उनके इस कथन का यही आशय है कि प्रेमचन्द जी ने ग्राम-जीवन से सम्बद्ध सभी पक्षों का न । केवल अत्यन्त विशदत्ता से चित्रण किया है, वरन् उनकी गहराइयों में जाकर उनके सच्चे चित्र प्रस्तुत कर दिए हैं। प्रेमचन्द जी ने जिस ग्राम-जीवन का चित्र गोदान में प्रस्तुत किया है, उसका सम्बन्ध आज ग्राम परिवेश से न होकर तत्कालीन ग्राम-जीवन से है। ग्रामीण जीवन को वास्तविक आधार प्रदान करने के लिए प्रेमचन्द जी ने चित्र के अनुरूप ही कुछ ऐसे खाँचे अथवा चित्रफलक निर्मित किए हैं, जो चित्र को - यथार्थ बनाने में सहयोगी सिद्ध हुए हैं। ग्रामीण किसानों के घर-द्वार, खेत-खलिहान और प्राकृतिक दृश्यों का ऐसा वास्तविक चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है। 'गोदान' के सन्दर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?
गोदान' प्रेमचन्द जी की उन अमर कृतियों में से एक है, जिसमें ग्रामीण भारत की आत्मा का करुण चित्र साकार हो उठा है। इसी कारण कई मनीषी आलोचक इसे ग्रामीण भारतीय परिवेशगत समस्याओं का महाकाव्य मानते हैं तो कई विद्वान् इसे ग्रामीण-जीवन और कृषि-संस्कृति का शोक गीत स्वीकारते हैं। कुछ विद्वान् तो ऐसे भी हैं कि जो इस उपन्यास को ग्रामीण भारत की आधुनिक 'गीता' तक स्वीकार करते हैं, जो कुछ भी हो, 'गोदान' वास्तव में मुंशी प्रेमचन्द का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें आचार-विचार, संस्कार और प्राकृतिक परिवेश, जो गहन करुणा से युक्त है, प्रतिबिम्बित हो उठा है। डॉ। गोपाल राय का कहना है कि 'गोदान' ग्राम-जीवन और ग्राम संस्कृति को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करने वाला अद्वितीय उपन्यास है न केवल हिन्दी । के वरन् किसी भी भारतीय भाषा के किसी भी उपन्यास में ग्रामीण समाज का । ऐसा व्यापक यथार्थ और सहानुभूतिपूर्ण चित्रण नहीं हुआ है। ग्रामीण जीवन और संस्कृति के अंकन की दृष्टि से इस उपन्यास का वही महत्त्व है, जो आधुनिक युग में युग जीवन की अभिव्यक्ति की दृष्टि से महाकाव्यों का हुआ करता था। इस प्रकार डॉ। राय गोदान को आधुनिक युग का महाकाव्य ही नहीं स्वीकारते वरन् सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य भी स्वीकारते हैं। उनके इस कथन का यही आशय है कि प्रेमचन्द जी ने ग्राम-जीवन से सम्बद्ध सभी पक्षों का न । केवल अत्यन्त विशदत्ता से चित्रण किया है, वरन् उनकी गहराइयों में जाकर उनके सच्चे चित्र प्रस्तुत कर दिए हैं। प्रेमचन्द जी ने जिस ग्राम-जीवन का चित्र गोदान में प्रस्तुत किया है, उसका सम्बन्ध आज ग्राम परिवेश से न होकर तत्कालीन ग्राम-जीवन से है। ग्रामीण जीवन को वास्तविक आधार प्रदान करने के लिए प्रेमचन्द जी ने चित्र के अनुरूप ही कुछ ऐसे खाँचे अथवा चित्रफलक निर्मित किए हैं, जो चित्र को - यथार्थ बनाने में सहयोगी सिद्ध हुए हैं। ग्रामीण किसानों के घर-द्वार, खेत-खलिहान और प्राकृतिक दृश्यों का ऐसा वास्तविक चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है। 'प्रतिबिम्बित' शब्द है
गोदान' प्रेमचन्द जी की उन अमर कृतियों में से एक है, जिसमें ग्रामीण भारत की आत्मा का करुण चित्र साकार हो उठा है। इसी कारण कई मनीषी आलोचक इसे ग्रामीण भारतीय परिवेशगत समस्याओं का महाकाव्य मानते हैं तो कई विद्वान् इसे ग्रामीण-जीवन और कृषि-संस्कृति का शोक गीत स्वीकारते हैं। कुछ विद्वान् तो ऐसे भी हैं कि जो इस उपन्यास को ग्रामीण भारत की आधुनिक 'गीता' तक स्वीकार करते हैं, जो कुछ भी हो, 'गोदान' वास्तव में मुंशी प्रेमचन्द का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें आचार-विचार, संस्कार और प्राकृतिक परिवेश, जो गहन करुणा से युक्त है, प्रतिबिम्बित हो उठा है। डॉ। गोपाल राय का कहना है कि 'गोदान' ग्राम-जीवन और ग्राम संस्कृति को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करने वाला अद्वितीय उपन्यास है न केवल हिन्दी । के वरन् किसी भी भारतीय भाषा के किसी भी उपन्यास में ग्रामीण समाज का । ऐसा व्यापक यथार्थ और सहानुभूतिपूर्ण चित्रण नहीं हुआ है। ग्रामीण जीवन और संस्कृति के अंकन की दृष्टि से इस उपन्यास का वही महत्त्व है, जो आधुनिक युग में युग जीवन की अभिव्यक्ति की दृष्टि से महाकाव्यों का हुआ करता था। इस प्रकार डॉ। राय गोदान को आधुनिक युग का महाकाव्य ही नहीं स्वीकारते वरन् सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य भी स्वीकारते हैं। उनके इस कथन का यही आशय है कि प्रेमचन्द जी ने ग्राम-जीवन से सम्बद्ध सभी पक्षों का न । केवल अत्यन्त विशदत्ता से चित्रण किया है, वरन् उनकी गहराइयों में जाकर उनके सच्चे चित्र प्रस्तुत कर दिए हैं। प्रेमचन्द जी ने जिस ग्राम-जीवन का चित्र गोदान में प्रस्तुत किया है, उसका सम्बन्ध आज ग्राम परिवेश से न होकर तत्कालीन ग्राम-जीवन से है। ग्रामीण जीवन को वास्तविक आधार प्रदान करने के लिए प्रेमचन्द जी ने चित्र के अनुरूप ही कुछ ऐसे खाँचे अथवा चित्रफलक निर्मित किए हैं, जो चित्र को - यथार्थ बनाने में सहयोगी सिद्ध हुए हैं। ग्रामीण किसानों के घर-द्वार, खेत-खलिहान और प्राकृतिक दृश्यों का ऐसा वास्तविक चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है। 'गोदान' को निम्नलिखित में से क्या नहीं कहा गया है?
गोदान' प्रेमचन्द जी की उन अमर कृतियों में से एक है, जिसमें ग्रामीण भारत की आत्मा का करुण चित्र साकार हो उठा है। इसी कारण कई मनीषी आलोचक इसे ग्रामीण भारतीय परिवेशगत समस्याओं का महाकाव्य मानते हैं तो कई विद्वान् इसे ग्रामीण-जीवन और कृषि-संस्कृति का शोक गीत स्वीकारते हैं। कुछ विद्वान् तो ऐसे भी हैं कि जो इस उपन्यास को ग्रामीण भारत की आधुनिक 'गीता' तक स्वीकार करते हैं, जो कुछ भी हो, 'गोदान' वास्तव में मुंशी प्रेमचन्द का एक ऐसा उपन्यास है जिसमें आचार-विचार, संस्कार और प्राकृतिक परिवेश, जो गहन करुणा से युक्त है, प्रतिबिम्बित हो उठा है। डॉ। गोपाल राय का कहना है कि 'गोदान' ग्राम-जीवन और ग्राम संस्कृति को उसकी सम्पूर्णता में प्रस्तुत करने वाला अद्वितीय उपन्यास है न केवल हिन्दी । के वरन् किसी भी भारतीय भाषा के किसी भी उपन्यास में ग्रामीण समाज का । ऐसा व्यापक यथार्थ और सहानुभूतिपूर्ण चित्रण नहीं हुआ है। ग्रामीण जीवन और संस्कृति के अंकन की दृष्टि से इस उपन्यास का वही महत्त्व है, जो आधुनिक युग में युग जीवन की अभिव्यक्ति की दृष्टि से महाकाव्यों का हुआ करता था। इस प्रकार डॉ। राय गोदान को आधुनिक युग का महाकाव्य ही नहीं स्वीकारते वरन् सर्वश्रेष्ठ महाकाव्य भी स्वीकारते हैं। उनके इस कथन का यही आशय है कि प्रेमचन्द जी ने ग्राम-जीवन से सम्बद्ध सभी पक्षों का न । केवल अत्यन्त विशदत्ता से चित्रण किया है, वरन् उनकी गहराइयों में जाकर उनके सच्चे चित्र प्रस्तुत कर दिए हैं। प्रेमचन्द जी ने जिस ग्राम-जीवन का चित्र गोदान में प्रस्तुत किया है, उसका सम्बन्ध आज ग्राम परिवेश से न होकर तत्कालीन ग्राम-जीवन से है। ग्रामीण जीवन को वास्तविक आधार प्रदान करने के लिए प्रेमचन्द जी ने चित्र के अनुरूप ही कुछ ऐसे खाँचे अथवा चित्रफलक निर्मित किए हैं, जो चित्र को - यथार्थ बनाने में सहयोगी सिद्ध हुए हैं। ग्रामीण किसानों के घर-द्वार, खेत-खलिहान और प्राकृतिक दृश्यों का ऐसा वास्तविक चित्रण अन्यत्र दुर्लभ है। 'विशदता' से तात्पर्य है
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