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Apni Aukat को चुनौती दे दो...

Apni Aukat को चुनौती दे दो

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यह मधु है: स्वयं काल की मौना का युग-संचय, यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय, यह अंकुर: फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय, यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो। यह दीप, अकेला, स्नेह भरा, है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो। यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा , वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा, कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुंधुआते कड़वे तम में यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र , उल्लंब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा! जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय इसको भक्ति को दे दो। अकेले दीप को शक्ति में देने से क्या परिवर्तन होगा?

यह मधु है: स्वयं काल की मौना का युग-संचय, यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय, यह अंकुर: फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय, यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो। यह दीप, अकेला, स्नेह भरा, है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो। यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा , वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा, कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुंधुआते कड़वे तम में यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र , उल्लंब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा! जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय इसको भक्ति को दे दो। इस कविता में दीप ____________ का प्रतीक है।

यह मधु है: स्वयं काल की मौना का युग-संचय, यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय, यह अंकुर: फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय, यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो। यह दीप, अकेला, स्नेह भरा, है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो। यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा , वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा, कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुंधुआते कड़वे तम में यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र , उल्लंब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा! जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय इसको भक्ति को दे दो। निर्भय शब्द में __________ मूलशब्द है।

यह मधु है: स्वयं काल की मौना का युग-संचय, यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय, यह अंकुर: फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय, यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो। यह दीप, अकेला, स्नेह भरा, है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो। यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा , वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा, कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुंधुआते कड़वे तम में यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र , उल्लंब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा! जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय इसको भक्ति को दे दो। अयुत शब्द का अर्थ ___________ होता है।

यह मधु है: स्वयं काल की मौना का युग-संचय, यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय, यह अंकुर: फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय, यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो। यह दीप, अकेला, स्नेह भरा, है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो। यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा, कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुंधुआते कड़वे तम में यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र , उल्लंब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा! जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय इसको भक्ति को दे दो। कविता के माध्यम से किसके महत्त्व को उजागर कर रहे हैं?

यह मधु है: स्वयं काल की मौना का युग-संचय, यह गोरसः जीवन-कामधेनु का अमृत-पूत पय, यह अंकुर: फोड़ धरा को रवि को तकता निर्भय, यह प्रकृत, स्वयंभू, ब्रह्म, अयुतः इसको भी शक्ति को दे दो। यह दीप, अकेला, स्नेह भरा, है गर्व भरा मदमाता, पर इसको भी पंक्ति को दे दो। यह वह विश्वास, नहीं जो अपनी लघुता में भी काँपा , वह पीड़ा, जिसकी गहराई को स्वयं उसी ने नापा, कुत्सा, अपमान, अवज्ञा के धुंधुआते कड़वे तम में यह सदा-द्रवित, चिर-जागरूक, अनुरक्त-नेत्र , उल्लंब-बाहु, यह चिर-अखंड अपनापा! जिज्ञासु, प्रबुद्ध, सदा श्रद्धामय इसको भक्ति को दे दो। प्रस्तुत कविता में 'पंक्ति' शब्द का कवि ने अनेक बार प्रयोग किया है। यह किसका प्रतीक है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 35 माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिचन किन्तु फिर भी कर रहा इतना निवेदन थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण। माँ मुझे बलिदान का वरदान दे दो तोड़ता हूँ मोह का बन्धन क्षमा दो आज सीधे हाथ में तलवार दे दो और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो। सुमन अर्पित चमन अर्पित नीड़ का कण-कण समर्पित चाहता हूँ, देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ। 'अकिंचन' का अर्थ है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 35 माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिचन किन्तु फिर भी कर रहा इतना निवेदन थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण। माँ मुझे बलिदान का वरदान दे दो तोड़ता हूँ मोह का बन्धन क्षमा दो आज सीधे हाथ में तलवार दे दो और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो। सुमन अर्पित चमन अर्पित नीड़ का कण-कण समर्पित चाहता हूँ, देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ। 'बलिदान' शब्द से बना विशेषण है