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पायल क्यों पहनते हैं? | पायल पहनने के फायदे | Importance of Payal | Amazing Facts #shorts #ytshorts

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In the following question, two statements are given each followed by two conclusions I and IL You have to consider the statements to be true even if they seem to be at variance from commonly known facts. You have to decide which of the given conclusions, if any, follows from the given statements. Statement : I. We are going back again to our ancestors and finding out the importance of Yoga and Pranayam. II. People in west have already opted it. It does not require any external equipment but only body and soul. , Conclusions : I. Ancient science is treasure of many cures and natural remedies of various diseases. II. Technology has overshadowed these ancient sources and introduced new concepts of fitness called gym. / निम्नलिखित प्रश्न में, दो कथन दिए गए हैं जिनके आगे दो निष्कर्ष I और II निकाले गए हैं। आपको मानना है कि कथन सत्य है चाहे वे सामान्यतः ज्ञात तथ्यों से भिन्न प्रतीत होते हों। आपको निर्णय करना है कि दिए गए निष्कर्षों में से कौन-सा निश्चित रूप से कथनों द्वारा सही निकाला जा सकता है/सकते हैं, यदि कोई हो। कथनः I. हम फिर से अपने पूर्वजों की ओर लौट रहे हैं और योग तथा प्राणायाम के महत्व को समझ रहे हैं। II. पश्चिम के लोगों ने इसे पहले से ही अपना रखा है। इसके लिए किसी बाहरी उपकरण की जरूरत नहीं है, केवल आत्मा और शरीर चाहिए। निष्कर्ष : I. प्राचीन विज्ञान कई इलाजों का खजाना और विभिन्न रोगों का प्राकृतिक उपचार है। II. प्रौद्योगिकी ने इन प्राचीन स्रोतों को दबा दिया है और स्वस्थ रहने के लिए नई अवधारणा को जन्म दिया है जिसे जिम कहते हैं।

मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। अनुच्छेद के आधार पर बताइए कि पंजाब प्रांत के आदमी सामान्यतः क्या पहनते हैं?

वर्ष 1914 तक देश का औद्योगिक विकास बेहद धीमा रहा और साम्राज्यवादी शोषण अत्यन्त तीव्र हो गया। गाँवों की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। सबसे अधिक बुरा प्रभाव कारीगरों, हरिजनों और छोटे किसानों पर पड़ा। ग्रामीण जन साम्राज्य और उनके भारतीय एजेण्ट जमींदारों के दोहरे शोषण की चक्की में पिस रहे थे। ब्रिटिश काल में सूदखोर महाजनों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिनसे एक बार कर्ज लेने पर गाँव के किसान जीवन-भर गुलामी का पट्टा पहनने पर मजबूर हो जाते थे। उनके हिसाब के सूद का भुगतान करने में असमर्थ किसान महाजनों को खेत बेचने पर मजबूर होकर अपनी ज़मीन पर ही मज़दूर होता गया। इस प्रकार देश में एक ओर तो बड़े किसानों की संख्या बढ़ी, दूसरी ओर ज़मीन जोतने वाला किसान भूस्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर खेतिहर मज़दूर होने लगा! भुखमरी से बचने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े पैमाने पर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, परन्तु इन असहाय लोगों का स्वागत करने के लिए वहाँ भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हो थीं। प्रेमचन्द 'गोदान' में होरी और गोबर के माध्यम से इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले होरी की ट्रेजिडी नहीं है, पूरे छोटे किसानों के साथ साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण-तन्त्र का क्रूर मजाक है, जो दूसरे ढंग से आज भी जारी है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ग्रामीण गरीबी का प्रेमचन्द जो यथार्थ चित्रण करते हैं, यह यूरोप में किसी व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है-- "टूटे-फूटे झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के ढेर, कीचड़ में लिपटी भैंसें, दुर्बल गायें, हड्डी निकले किसान, जवानी में ही जिन पर बुढ़ापा आ गया है।" ग्रामीण लोग शहरों की ओर क्यों पलायन कर रहे थे?

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