Home
Class
DN_SHORTS
पेपर कप ने कैसे उठाया इतना वजन...

पेपर कप ने कैसे उठाया इतना वजन

Promotional Banner

Similar Questions

Explore conceptually related problems

सेवासदन' के उपरान्त सन् 1920 में प्रेमचन्द का उपन्यास 'वरदान' प्रकाशित हुआ, किन्तु यह उपन्यास न तो सेवासदन की 'भाव-भंगिमा' को स्पर्श कर । 'सका, इसमें न वह उष्णता थी और न ही वैचारिक स्पष्टता। ऐसा लगता ही नहीं कि 'सेवासदन' लिखने के बाद प्रेमचन्द ने इस उपन्यास का सृजन किया है, जो वैचारिक प्रौढ़ता सेवासदन में है उसका अल्पांश भी वरदान में नहीं है। उपन्यास की अधिकांश कथा में क्रमश: कृत्रिमता बढ़ती ही चली गई। है और कल्पना की अतिशयता ने मूल कथानक को ही अस्त-व्यस्त कर दिया है। निःसन्देह 'वरदान' प्रेमचन्द की एक दुर्बल कृति है। वरदान के प्रकाशन के ठीक एक वर्ष बाद सन् 1921 में प्रेमचन्द का 'प्रेमाश्रम' प्रकाश में आया। 'प्रेमाश्रम' में प्राय: उन सभी दोषों का अभाव है, जिनके कारण वरदान एक अशक्त उपन्यास बनकर रह गया था। इस उपन्यास के माध्यम से जमींदार और कृषकों का संघर्ष पहली बार भारतीय समाज के सामने इतना खुलकर और उभर कर स्पष्ट रूप में आया तथा प्रेमचन्द की कला भी सम्भवतः पहली बार प्रौढ़तर रूप में प्रकट हुई। श्री इलाचन्द्र की कला भी सम्भवतः पहली बार प्रौढ़तर रूप में प्रकट हुई। श्री इलाचन्द्र जोशी एवं श्री अवध उपाध्याय जैसे प्रेमचन्द के प्रारम्भिक आलोचकों ने इस उपन्यास की यद्यपि तीखी आलोचना की है, किन्तु आलोचकों की आलोचना से तो कोई कृति अपनी 'महानता खो नहीं देती, जो सामाजिक सच था, प्रेमचन्द ने उसकी अभिव्यक्ति दी है और सच की आलोचना करने पर भी सच, सच ही रहता है। इस उपन्यास का कथा क्षेत्र प्रेमचन्द्र के अब तक प्रकाशित उपन्यासों में सर्वाधिक विस्तृत था। भिन्न-भिन्न जीवन पक्षों का अत्यधिक सूक्ष्म चित्रण प्रेमचन्द ने इस उपन्यास में प्रस्तुत किया। इस रचना में उपन्यासकार ने शोषक एवं शोषित के जिस संघर्ष को चित्रित किया है वह अत्यन्त सजीव एवं रोमांचक है। लेखक ने इसमें कहीं-कहीं पर बड़े संयत दृष्टिकोण से ग्राम्य । जीवन की विडम्बनाओं का चित्रण किया है। भारतीय ग्रामीण समाज की चिन्ताजनक स्थिति की पृष्ठभूमि में उपन्यास में लेखक ने विशेष रूप से ग्राम्य जीवन की समस्याओं पर ही विचार किया है। किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण और जमींदारों का वर्णन करते हुए लेखक ने ग्राम-सुधार के लिए उपायों पर विचार किया है और यह कहना असंगत न होगा कि इसके लिए लेखक को गाँधीवादी आदर्शवाद का आश्रय लेना पड़ा है। सभी शोषकों का अन्ततः हृदय परिवर्तन कराया जाता है, किन्तु यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि इस उपन्यास में प्रेमचन्द जी की आदर्शवादिता एक अपेक्षाकृत व्यावहारिक व विश्वसनीय मोड़ लेती है। लेखक की सहानुभूति कृषकों के साथ होते हुए भी व्यापक है, अतः वे अपराधी एवं अन्यायी को अधिकाधिक निन्दित, उपहासित व दण्डित करके उसका सुधार एवं परिष्कार करते हैं। प्रेमाश्रम में उद्देश्य ही उसका सर्वस्व है और यदि कथावस्तु संगठन पर लेखक ने तनिक भी और ध्यान रखा होता, तो नि:सन्देह यह कृति 'गोदान' से कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। यद्यपि आज भी कल्पित आलोचक 'प्रेमाश्रम' को गोदान से श्रेष्ठ मानते हैं। 'वरदान' के बाद किस उपन्यास का प्रकाशन हुआ?

सेवासदन' के उपरान्त सन् 1920 में प्रेमचन्द का उपन्यास 'वरदान' प्रकाशित हुआ, किन्तु यह उपन्यास न तो सेवासदन की 'भाव-भंगिमा' को स्पर्श कर । 'सका, इसमें न वह उष्णता थी और न ही वैचारिक स्पष्टता। ऐसा लगता ही नहीं कि 'सेवासदन' लिखने के बाद प्रेमचन्द ने इस उपन्यास का सृजन किया है, जो वैचारिक प्रौढ़ता सेवासदन में है उसका अल्पांश भी वरदान में नहीं है। उपन्यास की अधिकांश कथा में क्रमश: कृत्रिमता बढ़ती ही चली गई। है और कल्पना की अतिशयता ने मूल कथानक को ही अस्त-व्यस्त कर दिया है। निःसन्देह 'वरदान' प्रेमचन्द की एक दुर्बल कृति है। वरदान के प्रकाशन के ठीक एक वर्ष बाद सन् 1921 में प्रेमचन्द का 'प्रेमाश्रम' प्रकाश में आया। 'प्रेमाश्रम' में प्राय: उन सभी दोषों का अभाव है, जिनके कारण वरदान एक अशक्त उपन्यास बनकर रह गया था। इस उपन्यास के माध्यम से जमींदार और कृषकों का संघर्ष पहली बार भारतीय समाज के सामने इतना खुलकर और उभर कर स्पष्ट रूप में आया तथा प्रेमचन्द की कला भी सम्भवतः पहली बार प्रौढ़तर रूप में प्रकट हुई। श्री इलाचन्द्र की कला भी सम्भवतः पहली बार प्रौढ़तर रूप में प्रकट हुई। श्री इलाचन्द्र जोशी एवं श्री अवध उपाध्याय जैसे प्रेमचन्द के प्रारम्भिक आलोचकों ने इस उपन्यास की यद्यपि तीखी आलोचना की है, किन्तु आलोचकों की आलोचना से तो कोई कृति अपनी 'महानता खो नहीं देती, जो सामाजिक सच था, प्रेमचन्द ने उसकी अभिव्यक्ति दी है और सच की आलोचना करने पर भी सच, सच ही रहता है। इस उपन्यास का कथा क्षेत्र प्रेमचन्द्र के अब तक प्रकाशित उपन्यासों में सर्वाधिक विस्तृत था। भिन्न-भिन्न जीवन पक्षों का अत्यधिक सूक्ष्म चित्रण प्रेमचन्द ने इस उपन्यास में प्रस्तुत किया। इस रचना में उपन्यासकार ने शोषक एवं शोषित के जिस संघर्ष को चित्रित किया है वह अत्यन्त सजीव एवं रोमांचक है। लेखक ने इसमें कहीं-कहीं पर बड़े संयत दृष्टिकोण से ग्राम्य । जीवन की विडम्बनाओं का चित्रण किया है। भारतीय ग्रामीण समाज की चिन्ताजनक स्थिति की पृष्ठभूमि में उपन्यास में लेखक ने विशेष रूप से ग्राम्य जीवन की समस्याओं पर ही विचार किया है। किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण और जमींदारों का वर्णन करते हुए लेखक ने ग्राम-सुधार के लिए उपायों पर विचार किया है और यह कहना असंगत न होगा कि इसके लिए लेखक को गाँधीवादी आदर्शवाद का आश्रय लेना पड़ा है। सभी शोषकों का अन्ततः हृदय परिवर्तन कराया जाता है, किन्तु यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि इस उपन्यास में प्रेमचन्द जी की आदर्शवादिता एक अपेक्षाकृत व्यावहारिक व विश्वसनीय मोड़ लेती है। लेखक की सहानुभूति कृषकों के साथ होते हुए भी व्यापक है, अतः वे अपराधी एवं अन्यायी को अधिकाधिक निन्दित, उपहासित व दण्डित करके उसका सुधार एवं परिष्कार करते हैं। प्रेमाश्रम में उद्देश्य ही उसका सर्वस्व है और यदि कथावस्तु संगठन पर लेखक ने तनिक भी और ध्यान रखा होता, तो नि:सन्देह यह कृति 'गोदान' से कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। यद्यपि आज भी कल्पित आलोचक 'प्रेमाश्रम' को गोदान से श्रेष्ठ मानते हैं। प्रेमचन्द के किस उपन्यास में कल्पना एवं कृत्रिमता की अधिकता है?

सेवासदन' के उपरान्त सन् 1920 में प्रेमचन्द का उपन्यास 'वरदान' प्रकाशित हुआ, किन्तु यह उपन्यास न तो सेवासदन की 'भाव-भंगिमा' को स्पर्श कर । 'सका, इसमें न वह उष्णता थी और न ही वैचारिक स्पष्टता। ऐसा लगता ही नहीं कि 'सेवासदन' लिखने के बाद प्रेमचन्द ने इस उपन्यास का सृजन किया है, जो वैचारिक प्रौढ़ता सेवासदन में है उसका अल्पांश भी वरदान में नहीं है। उपन्यास की अधिकांश कथा में क्रमश: कृत्रिमता बढ़ती ही चली गई। है और कल्पना की अतिशयता ने मूल कथानक को ही अस्त-व्यस्त कर दिया है। निःसन्देह 'वरदान' प्रेमचन्द की एक दुर्बल कृति है। वरदान के प्रकाशन के ठीक एक वर्ष बाद सन् 1921 में प्रेमचन्द का 'प्रेमाश्रम' प्रकाश में आया। 'प्रेमाश्रम' में प्राय: उन सभी दोषों का अभाव है, जिनके कारण वरदान एक अशक्त उपन्यास बनकर रह गया था। इस उपन्यास के माध्यम से जमींदार और कृषकों का संघर्ष पहली बार भारतीय समाज के सामने इतना खुलकर और उभर कर स्पष्ट रूप में आया तथा प्रेमचन्द की कला भी सम्भवतः पहली बार प्रौढ़तर रूप में प्रकट हुई। श्री इलाचन्द्र की कला भी सम्भवतः पहली बार प्रौढ़तर रूप में प्रकट हुई। श्री इलाचन्द्र जोशी एवं श्री अवध उपाध्याय जैसे प्रेमचन्द के प्रारम्भिक आलोचकों ने इस उपन्यास की यद्यपि तीखी आलोचना की है, किन्तु आलोचकों की आलोचना से तो कोई कृति अपनी 'महानता खो नहीं देती, जो सामाजिक सच था, प्रेमचन्द ने उसकी अभिव्यक्ति दी है और सच की आलोचना करने पर भी सच, सच ही रहता है। इस उपन्यास का कथा क्षेत्र प्रेमचन्द्र के अब तक प्रकाशित उपन्यासों में सर्वाधिक विस्तृत था। भिन्न-भिन्न जीवन पक्षों का अत्यधिक सूक्ष्म चित्रण प्रेमचन्द ने इस उपन्यास में प्रस्तुत किया। इस रचना में उपन्यासकार ने शोषक एवं शोषित के जिस संघर्ष को चित्रित किया है वह अत्यन्त सजीव एवं रोमांचक है। लेखक ने इसमें कहीं-कहीं पर बड़े संयत दृष्टिकोण से ग्राम्य । जीवन की विडम्बनाओं का चित्रण किया है। भारतीय ग्रामीण समाज की चिन्ताजनक स्थिति की पृष्ठभूमि में उपन्यास में लेखक ने विशेष रूप से ग्राम्य जीवन की समस्याओं पर ही विचार किया है। किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण और जमींदारों का वर्णन करते हुए लेखक ने ग्राम-सुधार के लिए उपायों पर विचार किया है और यह कहना असंगत न होगा कि इसके लिए लेखक को गाँधीवादी आदर्शवाद का आश्रय लेना पड़ा है। सभी शोषकों का अन्ततः हृदय परिवर्तन कराया जाता है, किन्तु यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि इस उपन्यास में प्रेमचन्द जी की आदर्शवादिता एक अपेक्षाकृत व्यावहारिक व विश्वसनीय मोड़ लेती है। लेखक की सहानुभूति कृषकों के साथ होते हुए भी व्यापक है, अतः वे अपराधी एवं अन्यायी को अधिकाधिक निन्दित, उपहासित व दण्डित करके उसका सुधार एवं परिष्कार करते हैं। प्रेमाश्रम में उद्देश्य ही उसका सर्वस्व है और यदि कथावस्तु संगठन पर लेखक ने तनिक भी और ध्यान रखा होता, तो नि:सन्देह यह कृति 'गोदान' से कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। यद्यपि आज भी कल्पित आलोचक 'प्रेमाश्रम' को गोदान से श्रेष्ठ मानते हैं। निम्नलिखित में से कौन-सा कथन असत्य है?

सेवासदन' के उपरान्त सन् 1920 में प्रेमचन्द का उपन्यास 'वरदान' प्रकाशित हुआ, किन्तु यह उपन्यास न तो सेवासदन की 'भाव-भंगिमा' को स्पर्श कर । 'सका, इसमें न वह उष्णता थी और न ही वैचारिक स्पष्टता। ऐसा लगता ही नहीं कि 'सेवासदन' लिखने के बाद प्रेमचन्द ने इस उपन्यास का सृजन किया है, जो वैचारिक प्रौढ़ता सेवासदन में है उसका अल्पांश भी वरदान में नहीं है। उपन्यास की अधिकांश कथा में क्रमश: कृत्रिमता बढ़ती ही चली गई। है और कल्पना की अतिशयता ने मूल कथानक को ही अस्त-व्यस्त कर दिया है। निःसन्देह 'वरदान' प्रेमचन्द की एक दुर्बल कृति है। वरदान के प्रकाशन के ठीक एक वर्ष बाद सन् 1921 में प्रेमचन्द का 'प्रेमाश्रम' प्रकाश में आया। 'प्रेमाश्रम' में प्राय: उन सभी दोषों का अभाव है, जिनके कारण वरदान एक अशक्त उपन्यास बनकर रह गया था। इस उपन्यास के माध्यम से जमींदार और कृषकों का संघर्ष पहली बार भारतीय समाज के सामने इतना खुलकर और उभर कर स्पष्ट रूप में आया तथा प्रेमचन्द की कला भी सम्भवतः पहली बार प्रौढ़तर रूप में प्रकट हुई। श्री इलाचन्द्र की कला भी सम्भवतः पहली बार प्रौढ़तर रूप में प्रकट हुई। श्री इलाचन्द्र जोशी एवं श्री अवध उपाध्याय जैसे प्रेमचन्द के प्रारम्भिक आलोचकों ने इस उपन्यास की यद्यपि तीखी आलोचना की है, किन्तु आलोचकों की आलोचना से तो कोई कृति अपनी 'महानता खो नहीं देती, जो सामाजिक सच था, प्रेमचन्द ने उसकी अभिव्यक्ति दी है और सच की आलोचना करने पर भी सच, सच ही रहता है। इस उपन्यास का कथा क्षेत्र प्रेमचन्द्र के अब तक प्रकाशित उपन्यासों में सर्वाधिक विस्तृत था। भिन्न-भिन्न जीवन पक्षों का अत्यधिक सूक्ष्म चित्रण प्रेमचन्द ने इस उपन्यास में प्रस्तुत किया। इस रचना में उपन्यासकार ने शोषक एवं शोषित के जिस संघर्ष को चित्रित किया है वह अत्यन्त सजीव एवं रोमांचक है। लेखक ने इसमें कहीं-कहीं पर बड़े संयत दृष्टिकोण से ग्राम्य । जीवन की विडम्बनाओं का चित्रण किया है। भारतीय ग्रामीण समाज की चिन्ताजनक स्थिति की पृष्ठभूमि में उपन्यास में लेखक ने विशेष रूप से ग्राम्य जीवन की समस्याओं पर ही विचार किया है। किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण और जमींदारों का वर्णन करते हुए लेखक ने ग्राम-सुधार के लिए उपायों पर विचार किया है और यह कहना असंगत न होगा कि इसके लिए लेखक को गाँधीवादी आदर्शवाद का आश्रय लेना पड़ा है। सभी शोषकों का अन्ततः हृदय परिवर्तन कराया जाता है, किन्तु यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि इस उपन्यास में प्रेमचन्द जी की आदर्शवादिता एक अपेक्षाकृत व्यावहारिक व विश्वसनीय मोड़ लेती है। लेखक की सहानुभूति कृषकों के साथ होते हुए भी व्यापक है, अतः वे अपराधी एवं अन्यायी को अधिकाधिक निन्दित, उपहासित व दण्डित करके उसका सुधार एवं परिष्कार करते हैं। प्रेमाश्रम में उद्देश्य ही उसका सर्वस्व है और यदि कथावस्तु संगठन पर लेखक ने तनिक भी और ध्यान रखा होता, तो नि:सन्देह यह कृति 'गोदान' से कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। यद्यपि आज भी कल्पित आलोचक 'प्रेमाश्रम' को गोदान से श्रेष्ठ मानते हैं। प्रेमचन्द के किस उपन्यास का कथा-क्षेत्र सर्वाधिक विस्तृत है?

सेवासदन' के उपरान्त सन् 1920 में प्रेमचन्द का उपन्यास 'वरदान' प्रकाशित हुआ, किन्तु यह उपन्यास न तो सेवासदन की 'भाव-भंगिमा' को स्पर्श कर । 'सका, इसमें न वह उष्णता थी और न ही वैचारिक स्पष्टता। ऐसा लगता ही नहीं कि 'सेवासदन' लिखने के बाद प्रेमचन्द ने इस उपन्यास का सृजन किया है, जो वैचारिक प्रौढ़ता सेवासदन में है उसका अल्पांश भी वरदान में नहीं है। उपन्यास की अधिकांश कथा में क्रमश: कृत्रिमता बढ़ती ही चली गई। है और कल्पना की अतिशयता ने मूल कथानक को ही अस्त-व्यस्त कर दिया है। निःसन्देह 'वरदान' प्रेमचन्द की एक दुर्बल कृति है। वरदान के प्रकाशन के ठीक एक वर्ष बाद सन् 1921 में प्रेमचन्द का 'प्रेमाश्रम' प्रकाश में आया। 'प्रेमाश्रम' में प्राय: उन सभी दोषों का अभाव है, जिनके कारण वरदान एक अशक्त उपन्यास बनकर रह गया था। इस उपन्यास के माध्यम से जमींदार और कृषकों का संघर्ष पहली बार भारतीय समाज के सामने इतना खुलकर और उभर कर स्पष्ट रूप में आया तथा प्रेमचन्द की कला भी सम्भवतः पहली बार प्रौढ़तर रूप में प्रकट हुई। श्री इलाचन्द्र की कला भी सम्भवतः पहली बार प्रौढ़तर रूप में प्रकट हुई। श्री इलाचन्द्र जोशी एवं श्री अवध उपाध्याय जैसे प्रेमचन्द के प्रारम्भिक आलोचकों ने इस उपन्यास की यद्यपि तीखी आलोचना की है, किन्तु आलोचकों की आलोचना से तो कोई कृति अपनी 'महानता खो नहीं देती, जो सामाजिक सच था, प्रेमचन्द ने उसकी अभिव्यक्ति दी है और सच की आलोचना करने पर भी सच, सच ही रहता है। इस उपन्यास का कथा क्षेत्र प्रेमचन्द्र के अब तक प्रकाशित उपन्यासों में सर्वाधिक विस्तृत था। भिन्न-भिन्न जीवन पक्षों का अत्यधिक सूक्ष्म चित्रण प्रेमचन्द ने इस उपन्यास में प्रस्तुत किया। इस रचना में उपन्यासकार ने शोषक एवं शोषित के जिस संघर्ष को चित्रित किया है वह अत्यन्त सजीव एवं रोमांचक है। लेखक ने इसमें कहीं-कहीं पर बड़े संयत दृष्टिकोण से ग्राम्य । जीवन की विडम्बनाओं का चित्रण किया है। भारतीय ग्रामीण समाज की चिन्ताजनक स्थिति की पृष्ठभूमि में उपन्यास में लेखक ने विशेष रूप से ग्राम्य जीवन की समस्याओं पर ही विचार किया है। किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण और जमींदारों का वर्णन करते हुए लेखक ने ग्राम-सुधार के लिए उपायों पर विचार किया है और यह कहना असंगत न होगा कि इसके लिए लेखक को गाँधीवादी आदर्शवाद का आश्रय लेना पड़ा है। सभी शोषकों का अन्ततः हृदय परिवर्तन कराया जाता है, किन्तु यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि इस उपन्यास में प्रेमचन्द जी की आदर्शवादिता एक अपेक्षाकृत व्यावहारिक व विश्वसनीय मोड़ लेती है। लेखक की सहानुभूति कृषकों के साथ होते हुए भी व्यापक है, अतः वे अपराधी एवं अन्यायी को अधिकाधिक निन्दित, उपहासित व दण्डित करके उसका सुधार एवं परिष्कार करते हैं। प्रेमाश्रम में उद्देश्य ही उसका सर्वस्व है और यदि कथावस्तु संगठन पर लेखक ने तनिक भी और ध्यान रखा होता, तो नि:सन्देह यह कृति 'गोदान' से कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। यद्यपि आज भी कल्पित आलोचक 'प्रेमाश्रम' को गोदान से श्रेष्ठ मानते हैं। प्रस्तुत गद्यांश में अवध उपाध्याय का उल्लेख किस रूप में हुआ है?

सेवासदन' के उपरान्त सन् 1920 में प्रेमचन्द का उपन्यास 'वरदान' प्रकाशित हुआ, किन्तु यह उपन्यास न तो सेवासदन की 'भाव-भंगिमा' को स्पर्श कर । 'सका, इसमें न वह उष्णता थी और न ही वैचारिक स्पष्टता। ऐसा लगता ही नहीं कि 'सेवासदन' लिखने के बाद प्रेमचन्द ने इस उपन्यास का सृजन किया है, जो वैचारिक प्रौढ़ता सेवासदन में है उसका अल्पांश भी वरदान में नहीं है। उपन्यास की अधिकांश कथा में क्रमश: कृत्रिमता बढ़ती ही चली गई। है और कल्पना की अतिशयता ने मूल कथानक को ही अस्त-व्यस्त कर दिया है। निःसन्देह 'वरदान' प्रेमचन्द की एक दुर्बल कृति है। वरदान के प्रकाशन के ठीक एक वर्ष बाद सन् 1921 में प्रेमचन्द का 'प्रेमाश्रम' प्रकाश में आया। 'प्रेमाश्रम' में प्राय: उन सभी दोषों का अभाव है, जिनके कारण वरदान एक अशक्त उपन्यास बनकर रह गया था। इस उपन्यास के माध्यम से जमींदार और कृषकों का संघर्ष पहली बार भारतीय समाज के सामने इतना खुलकर और उभर कर स्पष्ट रूप में आया तथा प्रेमचन्द की कला भी सम्भवतः पहली बार प्रौढ़तर रूप में प्रकट हुई। श्री इलाचन्द्र की कला भी सम्भवतः पहली बार प्रौढ़तर रूप में प्रकट हुई। श्री इलाचन्द्र जोशी एवं श्री अवध उपाध्याय जैसे प्रेमचन्द के प्रारम्भिक आलोचकों ने इस उपन्यास की यद्यपि तीखी आलोचना की है, किन्तु आलोचकों की आलोचना से तो कोई कृति अपनी 'महानता खो नहीं देती, जो सामाजिक सच था, प्रेमचन्द ने उसकी अभिव्यक्ति दी है और सच की आलोचना करने पर भी सच, सच ही रहता है। इस उपन्यास का कथा क्षेत्र प्रेमचन्द्र के अब तक प्रकाशित उपन्यासों में सर्वाधिक विस्तृत था। भिन्न-भिन्न जीवन पक्षों का अत्यधिक सूक्ष्म चित्रण प्रेमचन्द ने इस उपन्यास में प्रस्तुत किया। इस रचना में उपन्यासकार ने शोषक एवं शोषित के जिस संघर्ष को चित्रित किया है वह अत्यन्त सजीव एवं रोमांचक है। लेखक ने इसमें कहीं-कहीं पर बड़े संयत दृष्टिकोण से ग्राम्य । जीवन की विडम्बनाओं का चित्रण किया है। भारतीय ग्रामीण समाज की चिन्ताजनक स्थिति की पृष्ठभूमि में उपन्यास में लेखक ने विशेष रूप से ग्राम्य जीवन की समस्याओं पर ही विचार किया है। किसानों की दयनीय स्थिति का चित्रण और जमींदारों का वर्णन करते हुए लेखक ने ग्राम-सुधार के लिए उपायों पर विचार किया है और यह कहना असंगत न होगा कि इसके लिए लेखक को गाँधीवादी आदर्शवाद का आश्रय लेना पड़ा है। सभी शोषकों का अन्ततः हृदय परिवर्तन कराया जाता है, किन्तु यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि इस उपन्यास में प्रेमचन्द जी की आदर्शवादिता एक अपेक्षाकृत व्यावहारिक व विश्वसनीय मोड़ लेती है। लेखक की सहानुभूति कृषकों के साथ होते हुए भी व्यापक है, अतः वे अपराधी एवं अन्यायी को अधिकाधिक निन्दित, उपहासित व दण्डित करके उसका सुधार एवं परिष्कार करते हैं। प्रेमाश्रम में उद्देश्य ही उसका सर्वस्व है और यदि कथावस्तु संगठन पर लेखक ने तनिक भी और ध्यान रखा होता, तो नि:सन्देह यह कृति 'गोदान' से कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। यद्यपि आज भी कल्पित आलोचक 'प्रेमाश्रम' को गोदान से श्रेष्ठ मानते हैं। 'अभिव्यक्ति' में उपसर्ग है

A person was asked to guess his own weight. He estimated his weight to be over 70 kg but less than 80 kg. His friend estimated his weight to be more than 74 kg but less than 84 kg. His mother said that his weight is less than 78 kg. Assuming that the weights are a whole number and that the three had correctly guessed, then what is the average of the possible weights? किसी व्यक्ति को स्वयं के वजन के बारे में अनुमान लगाने के लिए कहा गया | उसने अनुमान लगाया कि उसका वजन 70 kg से अधिक लेकिन 80 kg से कम है | उसके दोस्त ने उसके वजन का अनुमान 74 kg से अधिक लेकिन से 84 kg कम लगाया | उसकी माता ने कहा कि उसका वजन 78 kg से कम है | यह मानते हुए कि वजन एक पूर्णाक संख्या है और तीनों ने सही अनुमान लगाया था, तो संभावित वजनो का औसत कितना है ?