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Assessment (आकलन)|Steps Of Evalution In ...

Assessment (आकलन)|Steps Of Evalution In Mathematics (गणित में मूल्यांकन के चरण)|The Assessment Of Mathematics Learning At Primary Stage Should Be Focus (प्राथमिक स्तर पर गणित सीखने के मूल्यांकन पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए)|Assessment Areas In Mathematics (गणित में आकलन क्षेत्र)|There Are Four Major Patterns Of Assessment (आकलन के प्रमुख प्रतिमान चार प्रकार के है)

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निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर पूछे गए प्रश्नों के सबसे उपयुक्त उत्तर वाले विकल्प चुनिए: आज शिक्षक की भूमिका उपदेशक या ज्ञानदाता की-सी नहीं रही। वह तो मात्र एक प्रेरक है कि शिक्षार्थी स्वयं सीख सकें। उनके किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन-अध्यापन की परंपरागत विधियों से दो कदम आगे जाना पड़ेगा, ताकि शिक्षार्थी समकालीन यथार्थ और दिनप्रतिदिन बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानवमूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा ग्रहण कर सके। पाठगत बाधाओं को दूर करते हुए विद्यार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है। भाषा शिक्षण की कोई एक विधि नहीं हो सकती। जैसे मध्यकालीन कविता में अलंकार, छंदविधान, तुक आदि के प्रति आग्रह था किंतु आज लय और प्रवाह का महत्त्व है। कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रति सजगता समझना आवश्यक है। निबंध में लेखक के दृष्टिकोण और भाषा-शैली का महत्त्व है और शिक्षार्थी को अर्थग्रहण की योग्यता का विकास जरूरी है। कहानी के भीतर बुनी अनेक कहानियों को पहचानने और उन सूत्रों को पल्लवित करने का अभ्यास शिक्षार्थी की कल्पना और अभिव्यक्ति कौशल को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है। कभी-कभी कहानी का नाटक में विधा परिवर्तन कर उसका मंचन किया जा सकता है। मूल्यांकन वस्तुतः सीखने की ही एक प्रणाली है. ऐसी प्रणाली जो रटंत प्रणाली से मुक्ति दिला सके। परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके। इसलिए यह गाँठ बाँध लेना आवश्यक है कि भाषा और साहित्य के प्रश्न बँधे-बँधाए उत्तरों तक सीमित नहीं हो सकते। शिक्षक पूर्वनिर्धारित उत्तर की अपेक्षा नहीं कर सकता। विद्यार्थियों के उत्तर साँचे से हटकर किंतु तर्क संगत हो सकते हैं और सही भी। इस खुलेपन की चुनौती को स्वीकारना आवश्यक है। शिक्षक से किस प्रकार की बाधाएँ दूर करने की अपेक्षा की गई है?

निर्देशः गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। आज शिक्षक की भूमिका उपदेशक या ज्ञानदाता की-सी नहीं रही। वह तो मात्र एक प्रेरक है कि शिक्षार्थी स्वयं सीख सकें। उनके किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने शिक्षण कार्य के दौरान अध्ययन-अध्यापन की परंपरागत विधियों से दो कदम आगे जाना पड़ेगा, ताकि शिक्षार्थी समकालीन यथार्थ और दिनप्रतिदिन बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानवमूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा ग्रहण कर सके। पाठगत बाधाओं को दूर करते हुए विद्यार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का कार्य शिक्षक ही कर सकता है। भाषा शिक्षण की कोई एक विधि नहीं हो सकती। जैसे मध्यकालीन कविता में अलंकार, छंदविधान, तुक आदि के प्रति आग्रह था किंतु आज लय और प्रवाह का महत्त्व है। कविता पढ़ाते समय कवि की युग चेतना के प्रति सजगता समझना आवश्यक है। निबंध में लेखक के दृष्टिकोण और भाषा-शैली का महत्त्व है और शिक्षार्थी को अर्थग्रहण की योग्यता का विकास जरूरी है। कहानी के भीतर बुनी अनेक कहानियों को पहचानने और उन सूत्रों को पल्लवित करने का अभ्यास शिक्षार्थी की कल्पना और अभिव्यक्ति कौशल को बढ़ाने के लिए उपयोगी हो सकता है। कभी-कभी कहानी का नाटक में विधा परिवर्तन कर उसका मंचन किया जा सकता है। मूल्यांकन वस्तुतः सीखने की ही एक प्रणाली है, ऐसी प्रणाली जो रटंत प्रणाली से मुक्ति दिला सके। परंपरागत साँचे का अनुपालन न करे, अपना ढाँचा निर्मित कर सके। इसलिए यह गाँठ बाँध लेना आवश्यक है कि भाषा और साहित्य के प्रश्न बँधे-बँधाए उत्तरों तक सीमित नहीं हो सकते। शिक्षक पूर्वनिर्धारित उत्तर की अपेक्षा नहीं कर सकता। विद्यार्थियों के उत्तर साँचे से हटकर किंतु तर्क संगत हो सकते हैं और सही भी। इस खुलेपन की चुनौती को स्वीकारना आवश्यक है। शिक्षक से किस प्रकार की बाधाएँ दूर करने की अपेक्षा की गई है ?

प्राचीन काल में शिक्षा का लक्ष्य चारों वेदों का पूर्ण ज्ञान तथा दर्शन, गणित विद्या, इतिहास पुराण का ज्ञान था। वैदिक भारत के पाठ्य विषय व्यापक थे। पूर्व वैदिक काल में वेदमन्त्र, इतिहास आदि पाठ्य विषय थे। उत्तर वैदिक काल में वेदों की व्याख्याओं एवं ब्राह्मणग्रन्थों को पाठ्य-विषय में सम्मिलित किया गया। उपनिषद् और सूत्रयुग में वेदांगों (व्याकरण, शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, छन्द, निरुक्त) के अलावा अनेक विज्ञानों की शिक्षा को प्राप्त करने आए हुए सनत्कुमार से कहते हैं कि उन्होंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, पाँचवें वेद के रूप में इतिहास-पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ पितृ-विद्या, राशि-विद्या, दैव-विद्या, ब्रह्म-विद्या, भूत-विद्या, धनुर्वेद-विद्या, नक्षत्र-विद्या, सर्प-विद्या एवं देव जन विद्या का अध्ययन किया है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में आन्वीक्षिकी (तर्क शास्त्र), वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषि और पशुपालन), दण्डनीति (राजनीति शास्त्र) का उल्लेख हुआ है। वायु पुराण में अट्ठारह विद्याओं का वर्णन हुआ है। इनमें चार वेद, छ: वेदांग, पुराण न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थशास्त्र को शामिल किया गया है। मत्स्य पुराण में भी व्याकरणादि छ: अगों सहित चारों वेद, पुराण, न्यायशास्त्र, मीमांसा और धर्मशास्त्र का उल्लेख हुआ है। कालिदास ने भी रघुवंश में चौदह विद्याओं - चार वेद, छ: वेदांग, मीमांसा, न्याय पुराण और धर्मशास्त्र का वर्णन किया है। गरुड़ पुराण में चार विद्याओं को और जोड़ा गया है। आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद एवं अर्थशास्त्र। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारत में चार वेद, इतिहास, पुराण व्याकरण, गणित,ज्योतिष, छ: वेदांग, निरुक्त, काव्यशास्त्र, शिल्प शिक्षा, राजशास्त्र आदि अध्ययन के प्रमुख विषय थे। क्षत्रियों को हस्ति, अश्व, रथ, धनुष की शिक्षा में प्रवीण किया जाता था। वैश्यों की शिक्षा के सम्बन्ध में मनु का कथन है कि इन्हें तीनों वेदों के अध्ययन के अतिरिक्त व्यापार-पशु-पालन, कृषि, विभिन्न रत्नों, मूंगों, मोतियों, धातुओं आदि के सम्बन्ध में ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। प्राचीन भारत की राजतन्त्रात्मक शासन प्रणाली के अन्तर्गत राजा की स्थिति अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होती थी। शासन की सफलता राजा की योग्यताओं पर निर्भर करती है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने राजा की योग्यताओं पर प्रकाश डालते हुए उन विद्याओं का उल्लेख किया है जिनका अध्ययन उसके लिए अनिवार्य था। साधारणत: राजकुमारों की शिक्षा हेतु शिक्षकों की अलग से नियुक्ति की जाती थी। गौतम के अनुसार, राजा को तीनों वेदों, आन्वीक्षिकी का ज्ञाता तथा अपने कर्तव्य पालन में वेदों, धर्मशास्त्रों, वेद के सहायक, ग्रन्थों उपवेदों और पुराणों का आश्रय लेना चाहिए। मनु और याज्ञवल्क्य ने राजा को तीनों वेदों का ज्ञाता, आन्वीक्षिका, दण्डनीति एवं वार्ता के सम्बन्ध में जानकारी रखने का निर्देश दिया है। प्रस्तुत गद्यांश का सर्वाधिक उपयुक्त शीर्षक निम्नलिखित में से क्या हो सकता है?

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