धातुओं की प्राप्ति|खनिज एवं अयस्क|धातुकर्म|अयस्क के सांद्रण की विधियाँ|गुरुत्व पृथक्करण विधि|फैन प्लवन विधि|चुम्बकीय पृथक्करण विधि|निक्षालन|अयस्क से धातु प्राप्त करना|धातु कर्म के सिद्धांत|भर्जन एवं निस्तापन में अंतर|सारांश
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अयस्कों के सांद्रण की विधि|प्रक्षालन|सांद्रित अयस्क से अपरिष्कृत धातु का निष्कर्षण|ऑक्साइड का धातु में अपचयन|OMR|Summary
दोहरान |मिश्र धातु |24 कैरेट सोना |एक्वा रेजिया |एनोडीकरण |अयस्क के सांद्रण की विधियाँ |Summary
परिचय|क्षार धातुओं के साथ समानताएँ|हैलोजन के साथ समानताएँ|हाइड्रोजन के समस्थानिक|उपलब्धता|बनाने की विधियाँ|प्रयोगशाला विधि|जल से|धातुओं पर जल की क्रिया द्वारा|धातु हाइड्राईडो की जल के साथ क्रिया द्वारा|जल के विद्युत अपघटन द्वारा|धातुओं पर क्षारों की क्रिया द्वारा|बॉस की विधि द्वारा|भौतिक गुण|OMR|Summary
क्षार की धातु के साथ अभिक्रिया|धातु के कार्बोनेट एवं बाइकार्बोनेटसे अम्लों की अभिक्रिया|चुने के पानी में कार्बन डाई ऑक्साइड प्रवाहित करवाना|उदासिनीकरण अभिक्रिया|धातु के ऑक्साइड की अम्ल से अभिक्रिया|अधातु के ऑक्साइड की क्षार से अभिक्रिया|सभी अम्लों एवं क्षारों में क्या समानता है?|ग्लूकोस एवं एल्कोहॉल विद्युत का चालन नहीं करते है|सारांश
अनुवाद शब्द की व्युत्पत्ति एवं भावार्थ |अनुवाद से सम्बंध प्रमुख विधि|अनुवाद के प्रमुख भेद/प्रकार |OMR|अनुवाद की उपयोगिता |सारांश
प्राचीन भारत में शिक्षा को ज्ञान प्राप्ति का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता था। व्यक्ति के जीवन को सन्तुलित और श्रेष्ठ बनाने तथा एक नई दिशा प्रदान करने में शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योगदान था। सामाजिक बुराइयों को उसकी जड़ों से निर्मूल करने और त्रुटिपूर्ण जीवन में सुधार करने के लिए शिक्षा की नितान्त आवश्यकता थी। यह एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसके द्वारा सम्पूर्ण जीवन ही परिवर्तित किया जा सकता था। व्यक्ति को अपने व्यक्तित्व का, विकास करने, वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करने और अपनी समस्याओं को दूर करने के लिए शिक्षा पर निर्भर होना पड़ता था। आधुनिक युग की भाँति प्राचीन भारत में भी मनुष्य के चरित्र का उत्थान शिक्षा से ही सम्भव था। सामाजिक उत्तरदायित्वों को निष्ठापूर्वक वहन करना प्रत्येक मानव का परम उद्देश्य माना जाता है। इसके लिए भी शिक्षित होना अनिवार्य है। जीवन की वास्तविकता को समझने में शिक्षा का उल्लेखनीय योगदान रहता है। भारतीय मनीषियों ने इस ओर अपना ध्यान केन्द्रित करके शिक्षा को समाज की आधारशिला के रूप में स्वीकार किया। विद्या का स्थान किसी भी वस्तु से बहुत ऊँचा बताया गया। प्रखर बुद्धि एवं सही विवेक के लिए शिक्षा की उपयोगिता को स्वीकार किया गया। यह माना गया कि शिक्षा ही मनुष्य को व्यावहारिक कर्तव्यों का पाठ पढ़ाने और सफल नागरिक बनाने में सक्षम है। इसके माध्यम से व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और आत्मिक अर्थात् सर्वांगीण विकास सम्भव है। शिक्षा ने ही प्राचीन संस्कृति को संरक्षण दिया और इसके प्रसार में मदद की। विद्या का आरम्भ 'उपनयन संस्कार' द्वारा होता था। उपनयन संस्कार के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए मनुस्मृति में उल्लेख मिलता है कि गर्भाधान संस्कार द्वारा तो व्यक्ति का शरीर उत्पन्न होता है पर उपनयन संस्कार द्वारा उसका आध्यात्मिक जन्म होता है। प्राचीन काल में बच्चों को शिक्षा प्राप्त करने के लिए आचार्य के पास भेजा जाता था। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार, जो ब्रहाचर्य ग्रहण करता है। वह लम्बी अवधि की यज्ञावधि ग्रहण करता है। छान्दोग्योपनिषद् में उल्लेख मिलता है कि आरुणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को ब्रह्मचारी रूप से वेदाध्ययन के लिए गुरु के पास जाने को प्रेरित किया था। आचार्य के पास रहते हुए ब्रह्मचारी को तप और साधना का जीवन बिताते हुए विद्याध्ययन में तल्लीन रहना पड़ता था। इस अवस्था में बालक जो ज्ञानार्जन करता था उसका लाभ उसको जीवन भर मिलता था। गुरु गृह में निवास करते हुए विद्यार्थी समाज के निकट सम्पर्क में आता था। गुरु के लिए समिधा, जल का लाना तथा गृह-कार्य करना उसका कर्तव्य माना जाता था। गृहस्थ धर्म की शिक्षा के साथ-साथ वह श्रम और सेवा का पाठ पढ़ता था। शिक्षा केवल सैद्धान्तिक और पुस्तकीय न होकर जीवन की वास्तविकताओं के निकट होती थी। प्राचीन काल में विद्यार्थियों के कर्तव्य निम्नलिखित में से कौन-से थे? A: ब्रह्मचर्य का पालन करना B. गुरु के साथ रहना C. गुरु की सेवा करना D. गृहस्थ जीवन व्यतीत करना
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