आप हर बार क्यों बोलते है 'मुझे ऐसा लगा की' | best inspirational video By Mahendra Dogney #shorts
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मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। 'युवा कवियों की नयी पौध' से क्या तात्पर्य है?
मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। ''कविताओं का स्वरूप देसी नहीं है।'' वाक्य से अभिप्राय है।
मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। ''इस पर पश्चिम का प्रभाव है।'' वाक्य है
मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। पंजाब के युवा कवियों के लेखन का विषय है।
मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। अनुच्छेद के आधार पर बताइए कि किनका शोषण हो रहा है।
मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। कागज पर सीमित हो जाने से तात्पर्य है
मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। अनुच्छेद के आधार पर बताइए कि पंजाब प्रांत के आदमी सामान्यतः क्या पहनते हैं?
मेरा थोड़ा बहुत संबंध साहित्य की दुनिया से भी है। यही हालात में यहाँ भी देखता हूँ। यूरोपीय साहित्य का फैशन हमारे उपन्यासकारों, कहानी-लेखकों और कवियों पर झट हावी हो जाता है। मैं अपने प्रांत पंजाब की बात करता हूँ। मेरे पंजाब में युवा कवियों की नयी पौध सामाजिक व्यवस्था के खिलाफ इंकलाबी जज्बे से ओत-प्रोत है। इसमें भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण को हटाने और एक नयी व्यवस्था बनाने की बात की गयी है। हाँ, हमें सामाजिक बदलाव की जरूरत है और इन कविताओं में बातें तो बहुत अच्छे ढंग से कही गयी हैं पर इनका स्वरूप देसी नहीं है। इस पर पश्चिम का प्रभाव है। परिणाम यह है कि यह सारा इंकलाब एक छोटे-से कागज पर सीमित रह जाता है। बस, साहित्यिक समझ रखने वाले एक छोटे-से समूह में इनकी बात होती है। किसान, मजदूर, जो शोषण को झेल रहे हैं, जिन्हें वे इंकलाब की प्रेरणा देना चाहते हैं, वे इसे समझ ही नहीं पाते हैं। इस साल मेरी मातृभूमि पंजाब में मुझे गुरुनानक विश्वविद्यालय के सीनेट का सदस्य बनाने के लिए नामित किया गया। जब मुझे उसकी पहली मीटिंग में शामिल होने के लिए बुलाया गया, तो मैं पंजाब में ही प्रीतिनगर के पास था। एक दिन शाम को अपने ग्रामीण दोस्तों से गपशप करते हुए मैंने अमृतसर में होने वाली सीनेट की मीटिंग में जाने का जिक्र किया तो किसी ने कहा, "हमारे साथ तो आप तहमद (लुंगी) और कुर्त में हमारे जैसे ही बने फिरते हो, वहाँ सूट-बूट पहन कर साहब बहादुर बन जाओगे!' मैंने हंसते हुए कहा- "क्यों, आप अगर चाहते हैं तो मैं ऐसे ही चला जाऊंगा। तभी कोई दूसरा बोला, "आप ऐसा कर ही नहीं सकते। 'ग्रामीण, सामाजिक, युवा' आदि शब्द हैं
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