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घोर कलियुग...

घोर कलियुग

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द्वीप हैं हम! यह नहीं है शापा यह अपनी नियति है। हम नदी के पुत्र हैं। बैठे नदी की क्रोड में। वह बृहत भूखंड से हम को मिलाती है। और वह भूखंड अपना पितर है। नदी तुम बहती चलो। भूखंड से जो दाय हमको मिला है, मिलता रहा है, माँजती, संस्कार देती चलो। यदि ऐसा कभी हो तुम्हारे आह्यद से या दूसरों के , किसी स्वैराचार से, अतिचार से, तुम बढ़ो, प्लावन तुम्हारा घरघराता उठे - यह स्रोतस्विनी ही कर्मनाशा कीर्तिनाशा घोर काल, प्रवाहिनी बन जाए - तो हमें स्वीकार है वह भी। उसी में रेत होकर। फिर छनेंगे हम। जमेंगे हमा कहीं फिर पैर टेकेंगे। कहीं फिर भी खड़ा होगा नए व्यक्तित्व का आकार। मातः, उसे फिर संस्कार तुम देना। इनमें से किस पंक्ति में बाढ़ का जिक्र किया गया है?