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कार्बनिक रसायनऐसे पढ़ोगे तो सब कुछ समझोगे...

कार्बनिक रसायनऐसे पढ़ोगे तो सब कुछ समझोगे

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रिक्शे पर मीरा के साथ हँसती-बोलती ऋतु घर पहुँची। सीढ़ियाँ चढ़ने लगी तो कुछ झगड़ने की आवाजें सुनाई दी। ऊपर पहुंची तो देखा, दोनों आजू-बाजू वाली पड़ोसने झगड़ रहीं थीं। अपने दरवाजे के पास खड़ी होकर उसने कुछ देर उनकी बातें सुनी तो झगड़े का कारण समझ में आया। एक की महरी ने घर साफ़ करके कचरा दूसरी के दरवाजे की ओर फेंक दिया था, इसी बात का झगड़ा था। ऋतु ने दोनों को समझाया-बुझाया। आखिरकार कचरा फेंकने वाली महरी को बुलाया गया। उसने झाड़ थामी और कचरा सीढ़ी की ओर धकेल दिया। फिर वह महरी अंदर चली गई। दोनों पड़ोसनों ने अंदर जाकर अपने-अपने द्वार बंद कर लिए। ऋतु खड़ी-खड़ी देखती रही। जो सीढ़ी पहले से ही गंदी थी. वह और भी गंदी हो गई। रेत का तो साम्राज्य ही था। कहीं बादाम के छिलके पड़े थे, तो कहीं चूसी हुई ईख के लच्छे, कहीं बालों का गुच्छा उड़ रहा था तो कहीं कुछ और। मन वितृष्णा से भर उठा। सोचा, इस सीढ़ी से चढ़कर सब अपने घर तक आते हैं, इससे उतरकर दफ्तर, बाजार आदि अपनी इच्छित जगहों पर जाते है, पर इसे कोई साफ़ नहीं करता। उल्टे सब इस पर कचरा फेंक देते हैं। साझे की सीढ़ी को साफ करने का कर्तव्य किसी का नहीं है। स्वच्छता तो जैसे अनबुझी तृष्णा हो गई। ऋतु का मन घृणा से भर गया, क्योंकि

रिक्शे पर मीरा के साथ हँसती-बोलती ऋतु घर पहुँची। सीढ़ियाँ चढ़ने लगी तो कुछ झगड़ने की आवाजें सुनाई दी। ऊपर पहुंची तो देखा, दोनों आजू-बाजू वाली पड़ोसने झगड़ रहीं थीं। अपने दरवाजे के पास खड़ी होकर उसने कुछ देर उनकी बातें सुनी तो झगड़े का कारण समझ में आया। एक की महरी ने घर साफ़ करके कचरा दूसरी के दरवाजे की ओर फेंक दिया था, इसी बात का झगड़ा था। ऋतु ने दोनों को समझाया-बुझाया। आखिरकार कचरा फेंकने वाली महरी को बुलाया गया। उसने झाड़ थामी और कचरा सीढ़ी की ओर धकेल दिया। फिर वह महरी अंदर चली गई। दोनों पड़ोसनों ने अंदर जाकर अपने-अपने द्वार बंद कर लिए। ऋतु खड़ी-खड़ी देखती रही। जो सीढ़ी पहले से ही गंदी थी. वह और भी गंदी हो गई। रेत का तो साम्राज्य ही था। कहीं बादाम के छिलके पड़े थे, तो कहीं चूसी हुई ईख के लच्छे, कहीं बालों का गुच्छा उड़ रहा था तो कहीं कुछ और। मन वितृष्णा से भर उठा। सोचा, इस सीढ़ी से चढ़कर सब अपने घर तक आते हैं, इससे उतरकर दफ्तर, बाजार आदि अपनी इच्छित जगहों पर जाते है, पर इसे कोई साफ़ नहीं करता। उल्टे सब इस पर कचरा फेंक देते हैं। साझे की सीढ़ी को साफ करने का कर्तव्य किसी का नहीं है। स्वच्छता तो जैसे अनबुझी तृष्णा हो गई। 'दफ्तर तथा बाज़ार' शब्द हैं