Home
Class
DN_SHORTS
Square Root निकालें सिर्फ 5 Sec में | Ve...

Square Root निकालें सिर्फ 5 Sec में | Very Funny चाहे मुझे कोई नकली कहे #Shorts #Maths

Promotional Banner

Similar Questions

Explore conceptually related problems

न अवरोध कोई, न बाधा कहीं हैं. न संदेह कोई, न व्यवधान कोई बहुत दूर से हैं दिशाएँ बुलाती नहीं पथ-डगर आज अनजान कोई दिशाएँ निमंत्रण मुझे दे रही हैं दिगंतर खुला सिर्फ मेरे लिए है नहीं कुछ यहां राह जो रोक पाए न कोई यहाँ जो मुझे टोक पाए अजानी हवा में उड़ा जा रहा हूँ विजय गीत मेरा गगन मस्त गाए हृदय में कहीं कह रहा बात कोई, धरा और गगन सिर्फ तेरे लिए है। कवि को कोई कह रहा है कि

न अवरोध कोई, न बाधा कहीं हैं. न संदेह कोई, न व्यवधान कोई बहुत दूर से हैं दिशाएँ बुलाती नहीं पथ-डगर आज अनजान कोई दिशाएँ निमंत्रण मुझे दे रही हैं दिगंतर खुला सिर्फ मेरे लिए है नहीं कुछ यहां राह जो रोक पाए न कोई यहाँ जो मुझे टोक पाए अजानी हवा में उड़ा जा रहा हूँ विजय गीत मेरा गगन मस्त गाए हृदय में कहीं कह रहा बात कोई, धरा और गगन सिर्फ तेरे लिए है। अर्थ की दृष्टि से शेष से भिन्न शब्द छाँटिए।

मेरे मकान के आगे 'चौराहे पर ढाबे के आगे फुटपाथ पर खाना खाने वाले लोग बैठते हैं-रिक्शेवाले, मजदूर, फेरीवाले, कबाड़ी वाले...! आना-जाना लगा ही रहता है। लोग कहते हैं "आपको बुरा नहीं लगता? लोग सड़क पर गन्दा फैला रहे हैं और आप इन्हें बरदाश्त कर रहे है? इनके कारण पूरे मोहल्ले की आबोहवा खराब हो रही है।" मैं उनकी बातों को हल्के में ही लेता हूँ। मुझे पता है कि यहाँ जो लोग जुटते है वे गरीब लोग होते हैं। अपने काम-धाम के बीच रोटी खाने चले आते हैं और खाकर चले जाते हैं। ये आमतौर पर बिहार से आए गरीब ईमानदार लोग हैं जो हमारे इस परिसर के स्थायी सदस्य हो गए हैं। ये उन अशिष्ट अमीरों से भिन्न है, जो साधारण-सी बात पर भी हंगामा खड़ा कर देते हैं। लोगों के पास पैसा तो आ गया पर धनी होने का शऊर नहीं आया। अधजल गगरी छलकत जाए की तर्ज पर इनमें दिखावे की भावना उबाल खाती है। असल में यह दावा हमें भी अपने माहौल से जोड़ता है। मैं लेखक हूँ तो क्या हुआ? गांव के एक सामान्य घर से आया हुआ व्यक्ति हूँ। बचपन में गाँव-घरों की गरीबी देखी है और भोगी भी है। खेतों की मिट्टी में रमा हूँ, वह मुझमें रमी है। आज भी उस मिट्टी को झाडझूड़ कर भले ही शहरी बनने की कोशिश करता हूँ, बन नहीं पाता। वह मिट्टी बाहर से चाहे न दिखाई दे, अपनी महक और रसमयता से वह मेरे भीतर बसी हुई है। इसीलिए मुझे मिट्टी से जुड़े ये तमाम लोग भाते हैं। इस दुनिया में कहा-सुनी होती है, हाथापाई भी हो जाती है लेकिन कोई किसी के प्रति गाँठ नहीं बाँधता। दूसरे-तीसरे ही दिन परस्पर हँसते-बत्तियाते और एक-दूसरे के दुख-दर्द में शामिल होते दिखाई पड़ते हैं। ये सभी कभी-न-कभी एक-दूसरे से लड़ चुके हैं लेकिन कभी इसकी प्रतीति नहीं होती कि ये लड़ चुके हैं। कल के गुस्से को अगले दिन धूल को तरह झाड़कर फेंक देते हैं। 'गाँठ बाँधना' का अर्थ है