प्रशासनिक केंद्र |मंदिर नगर और तीर्थ केंद्र |छोटे शहरों का एक नेटवर्क |छोटे और बड़े व्यापारी |गाँव मे शिल्प |सूरत, हम्पी, मसूलिपटनम |नए शहर और व्यापारी |प्रशासनिक केंद्रों का अवलोकन |व्यापारी: छोटा और बड़ा |कस्बों में विभिन्न प्रकार कर शिल्प |अभ्यास प्रश्न
प्रशासनिक केंद्र |मंदिर नगर और तीर्थ केंद्र |छोटे शहरों का एक नेटवर्क |छोटे और बड़े व्यापारी |गाँव मे शिल्प |सूरत, हम्पी, मसूलिपटनम |नए शहर और व्यापारी |प्रशासनिक केंद्रों का अवलोकन |व्यापारी: छोटा और बड़ा |कस्बों में विभिन्न प्रकार कर शिल्प |अभ्यास प्रश्न
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वर्ष 1914 तक देश का औद्योगिक विकास बेहद धीमा रहा और साम्राज्यवादी शोषण अत्यन्त तीव्र हो गया। गाँवों की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। सबसे अधिक बुरा प्रभाव कारीगरों, हरिजनों और छोटे किसानों पर पड़ा। ग्रामीण जन साम्राज्य और उनके भारतीय एजेण्ट जमींदारों के दोहरे शोषण की चक्की में पिस रहे थे। ब्रिटिश काल में सूदखोर महाजनों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिनसे एक बार कर्ज लेने पर गाँव के किसान जीवन-भर गुलामी का पट्टा पहनने पर मजबूर हो जाते थे। उनके हिसाब के सूद का भुगतान करने में असमर्थ किसान महाजनों को खेत बेचने पर मजबूर होकर अपनी ज़मीन पर ही मज़दूर होता गया। इस प्रकार देश में एक ओर तो बड़े किसानों की संख्या बढ़ी, दूसरी ओर ज़मीन जोतने वाला किसान भूस्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर खेतिहर मज़दूर होने लगा! भुखमरी से बचने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े पैमाने पर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, परन्तु इन असहाय लोगों का स्वागत करने के लिए वहाँ भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हो थीं। प्रेमचन्द 'गोदान' में होरी और गोबर के माध्यम से इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले होरी की ट्रेजिडी नहीं है, पूरे छोटे किसानों के साथ साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण-तन्त्र का क्रूर मजाक है, जो दूसरे ढंग से आज भी जारी है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ग्रामीण गरीबी का प्रेमचन्द जो यथार्थ चित्रण करते हैं, यह यूरोप में किसी व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है-- "टूटे-फूटे झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के ढेर, कीचड़ में लिपटी भैंसें, दुर्बल गायें, हड्डी निकले किसान, जवानी में ही जिन पर बुढ़ापा आ गया है।" छोटे किसानों के खेतिहर मजदूर बनने का कारण क्या था?
वर्ष 1914 तक देश का औद्योगिक विकास बेहद धीमा रहा और साम्राज्यवादी शोषण अत्यन्त तीव्र हो गया। गाँवों की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। सबसे अधिक बुरा प्रभाव कारीगरों, हरिजनों और छोटे किसानों पर पड़ा। ग्रामीण जन साम्राज्य और उनके भारतीय एजेण्ट जमींदारों के दोहरे शोषण की चक्की में पिस रहे थे। ब्रिटिश काल में सूदखोर महाजनों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिनसे एक बार कर्ज लेने पर गाँव के किसान जीवन-भर गुलामी का पट्टा पहनने पर मजबूर हो जाते थे। उनके हिसाब के सूद का भुगतान करने में असमर्थ किसान महाजनों को खेत बेचने पर मजबूर होकर अपनी ज़मीन पर ही मज़दूर होता गया। इस प्रकार देश में एक ओर तो बड़े किसानों की संख्या बढ़ी, दूसरी ओर ज़मीन जोतने वाला किसान भूस्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर खेतिहर मज़दूर होने लगा! भुखमरी से बचने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े पैमाने पर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, परन्तु इन असहाय लोगों का स्वागत करने के लिए वहाँ भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हो थीं। प्रेमचन्द 'गोदान' में होरी और गोबर के माध्यम से इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले होरी की ट्रेजिडी नहीं है, पूरे छोटे किसानों के साथ साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण-तन्त्र का क्रूर मजाक है, जो दूसरे ढंग से आज भी जारी है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ग्रामीण गरीबी का प्रेमचन्द जो यथार्थ चित्रण करते हैं, यह यूरोप में किसी व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है-- "टूटे-फूटे झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के ढेर, कीचड़ में लिपटी भैंसें, दुर्बल गायें, हड्डी निकले किसान, जवानी में ही जिन पर बुढ़ापा आ गया है।" ग्रामीण लोग शहरों की ओर क्यों पलायन कर रहे थे?
वर्ष 1914 तक देश का औद्योगिक विकास बेहद धीमा रहा और साम्राज्यवादी शोषण अत्यन्त तीव्र हो गया। गाँवों की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। सबसे अधिक बुरा प्रभाव कारीगरों, हरिजनों और छोटे किसानों पर पड़ा। ग्रामीण जन साम्राज्य और उनके भारतीय एजेण्ट जमींदारों के दोहरे शोषण की चक्की में पिस रहे थे। ब्रिटिश काल में सूदखोर महाजनों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिनसे एक बार कर्ज लेने पर गाँव के किसान जीवन-भर गुलामी का पट्टा पहनने पर मजबूर हो जाते थे। उनके हिसाब के सूद का भुगतान करने में असमर्थ किसान महाजनों को खेत बेचने पर मजबूर होकर अपनी ज़मीन पर ही मज़दूर होता गया। इस प्रकार देश में एक ओर तो बड़े किसानों की संख्या बढ़ी, दूसरी ओर ज़मीन जोतने वाला किसान भूस्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर खेतिहर मज़दूर होने लगा! भुखमरी से बचने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े पैमाने पर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, परन्तु इन असहाय लोगों का स्वागत करने के लिए वहाँ भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हो थीं। प्रेमचन्द 'गोदान' में होरी और गोबर के माध्यम से इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले होरी की ट्रेजिडी नहीं है, पूरे छोटे किसानों के साथ साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण-तन्त्र का क्रूर मजाक है, जो दूसरे ढंग से आज भी जारी है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ग्रामीण गरीबी का प्रेमचन्द जो यथार्थ चित्रण करते हैं, यह यूरोप में किसी व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है-- "टूटे-फूटे झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के ढेर, कीचड़ में लिपटी भैंसें, दुर्बल गायें, हड्डी निकले किसान, जवानी में ही जिन पर बुढ़ापा आ गया है।" गाँवों के लोगों का शोषण कौन कर रहा था?
वर्ष 1914 तक देश का औद्योगिक विकास बेहद धीमा रहा और साम्राज्यवादी शोषण अत्यन्त तीव्र हो गया। गाँवों की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। सबसे अधिक बुरा प्रभाव कारीगरों, हरिजनों और छोटे किसानों पर पड़ा। ग्रामीण जन साम्राज्य और उनके भारतीय एजेण्ट जमींदारों के दोहरे शोषण की चक्की में पिस रहे थे। ब्रिटिश काल में सूदखोर महाजनों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिनसे एक बार कर्ज लेने पर गाँव के किसान जीवन-भर गुलामी का पट्टा पहनने पर मजबूर हो जाते थे। उनके हिसाब के सूद का भुगतान करने में असमर्थ किसान महाजनों को खेत बेचने पर मजबूर होकर अपनी ज़मीन पर ही मज़दूर होता गया। इस प्रकार देश में एक ओर तो बड़े किसानों की संख्या बढ़ी, दूसरी ओर ज़मीन जोतने वाला किसान भूस्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर खेतिहर मज़दूर होने लगा! भुखमरी से बचने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े पैमाने पर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, परन्तु इन असहाय लोगों का स्वागत करने के लिए वहाँ भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हो थीं। प्रेमचन्द 'गोदान' में होरी और गोबर के माध्यम से इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले होरी की ट्रेजिडी नहीं है, पूरे छोटे किसानों के साथ साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण-तन्त्र का क्रूर मजाक है, जो दूसरे ढंग से आज भी जारी है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ग्रामीण गरीबी का प्रेमचन्द जो यथार्थ चित्रण करते हैं, यह यूरोप में किसी व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है-- "टूटे-फूटे झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के ढेर, कीचड़ में लिपटी भैंसें, दुर्बल गायें, हड्डी निकले किसान, जवानी में ही जिन पर बुढ़ापा आ गया है।" प्रस्तुत गद्यांश में आए शब्द 'पंगु' का तात्पर्य क्या है?
वर्ष 1914 तक देश का औद्योगिक विकास बेहद धीमा रहा और साम्राज्यवादी शोषण अत्यन्त तीव्र हो गया। गाँवों की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। सबसे अधिक बुरा प्रभाव कारीगरों, हरिजनों और छोटे किसानों पर पड़ा। ग्रामीण जन साम्राज्य और उनके भारतीय एजेण्ट जमींदारों के दोहरे शोषण की चक्की में पिस रहे थे। ब्रिटिश काल में सूदखोर महाजनों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिनसे एक बार कर्ज लेने पर गाँव के किसान जीवन-भर गुलामी का पट्टा पहनने पर मजबूर हो जाते थे। उनके हिसाब के सूद का भुगतान करने में असमर्थ किसान महाजनों को खेत बेचने पर मजबूर होकर अपनी ज़मीन पर ही मज़दूर होता गया। इस प्रकार देश में एक ओर तो बड़े किसानों की संख्या बढ़ी, दूसरी ओर ज़मीन जोतने वाला किसान भूस्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर खेतिहर मज़दूर होने लगा! भुखमरी से बचने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े पैमाने पर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, परन्तु इन असहाय लोगों का स्वागत करने के लिए वहाँ भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हो थीं। प्रेमचन्द 'गोदान' में होरी और गोबर के माध्यम से इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले होरी की ट्रेजिडी नहीं है, पूरे छोटे किसानों के साथ साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण-तन्त्र का क्रूर मजाक है, जो दूसरे ढंग से आज भी जारी है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ग्रामीण गरीबी का प्रेमचन्द जो यथार्थ चित्रण करते हैं, यह यूरोप में किसी व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है-- "टूटे-फूटे झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के ढेर, कीचड़ में लिपटी भैंसें, दुर्बल गायें, हड्डी निकले किसान, जवानी में ही जिन पर बुढ़ापा आ गया है।" 1914 तक देश के औद्योगिक विकास धीमा रहने का मुख्य कारण क्या हो सकता है?
वर्ष 1914 तक देश का औद्योगिक विकास बेहद धीमा रहा और साम्राज्यवादी शोषण अत्यन्त तीव्र हो गया। गाँवों की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। सबसे अधिक बुरा प्रभाव कारीगरों, हरिजनों और छोटे किसानों पर पड़ा। ग्रामीण जन साम्राज्य और उनके भारतीय एजेण्ट जमींदारों के दोहरे शोषण की चक्की में पिस रहे थे। ब्रिटिश काल में सूदखोर महाजनों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिनसे एक बार कर्ज लेने पर गाँव के किसान जीवन-भर गुलामी का पट्टा पहनने पर मजबूर हो जाते थे। उनके हिसाब के सूद का भुगतान करने में असमर्थ किसान महाजनों को खेत बेचने पर मजबूर होकर अपनी ज़मीन पर ही मज़दूर होता गया। इस प्रकार देश में एक ओर तो बड़े किसानों की संख्या बढ़ी, दूसरी ओर ज़मीन जोतने वाला किसान भूस्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर खेतिहर मज़दूर होने लगा! भुखमरी से बचने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े पैमाने पर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, परन्तु इन असहाय लोगों का स्वागत करने के लिए वहाँ भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हो थीं। प्रेमचन्द 'गोदान' में होरी और गोबर के माध्यम से इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले होरी की ट्रेजिडी नहीं है, पूरे छोटे किसानों के साथ साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण-तन्त्र का क्रूर मजाक है, जो दूसरे ढंग से आज भी जारी है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ग्रामीण गरीबी का प्रेमचन्द जो यथार्थ चित्रण करते हैं, यह यूरोप में किसी व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है-- "टूटे-फूटे झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के ढेर, कीचड़ में लिपटी भैंसें, दुर्बल गायें, हड्डी निकले किसान, जवानी में ही जिन पर बुढ़ापा आ गया है।" ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर होने का कुप्रभाव किस पर पड़ा?
वर्ष 1914 तक देश का औद्योगिक विकास बेहद धीमा रहा और साम्राज्यवादी शोषण अत्यन्त तीव्र हो गया। गाँवों की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। सबसे अधिक बुरा प्रभाव कारीगरों, हरिजनों और छोटे किसानों पर पड़ा। ग्रामीण जन साम्राज्य और उनके भारतीय एजेण्ट जमींदारों के दोहरे शोषण की चक्की में पिस रहे थे। ब्रिटिश काल में सूदखोर महाजनों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिनसे एक बार कर्ज लेने पर गाँव के किसान जीवन-भर गुलामी का पट्टा पहनने पर मजबूर हो जाते थे। उनके हिसाब के सूद का भुगतान करने में असमर्थ किसान महाजनों को खेत बेचने पर मजबूर होकर अपनी ज़मीन पर ही मज़दूर होता गया। इस प्रकार देश में एक ओर तो बड़े किसानों की संख्या बढ़ी, दूसरी ओर ज़मीन जोतने वाला किसान भूस्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर खेतिहर मज़दूर होने लगा! भुखमरी से बचने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े पैमाने पर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, परन्तु इन असहाय लोगों का स्वागत करने के लिए वहाँ भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हो थीं। प्रेमचन्द 'गोदान' में होरी और गोबर के माध्यम से इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले होरी की ट्रेजिडी नहीं है, पूरे छोटे किसानों के साथ साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण-तन्त्र का क्रूर मजाक है, जो दूसरे ढंग से आज भी जारी है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ग्रामीण गरीबी का प्रेमचन्द जो यथार्थ चित्रण करते हैं, यह यूरोप में किसी व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है-- "टूटे-फूटे झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के ढेर, कीचड़ में लिपटी भैंसें, दुर्बल गायें, हड्डी निकले किसान, जवानी में ही जिन पर बुढ़ापा आ गया है।" 'गोदान' के पात्र हैं
वर्ष 1914 तक देश का औद्योगिक विकास बेहद धीमा रहा और साम्राज्यवादी शोषण अत्यन्त तीव्र हो गया। गाँवों की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। सबसे अधिक बुरा प्रभाव कारीगरों, हरिजनों और छोटे किसानों पर पड़ा। ग्रामीण जन साम्राज्य और उनके भारतीय एजेण्ट जमींदारों के दोहरे शोषण की चक्की में पिस रहे थे। ब्रिटिश काल में सूदखोर महाजनों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिनसे एक बार कर्ज लेने पर गाँव के किसान जीवन-भर गुलामी का पट्टा पहनने पर मजबूर हो जाते थे। उनके हिसाब के सूद का भुगतान करने में असमर्थ किसान महाजनों को खेत बेचने पर मजबूर होकर अपनी ज़मीन पर ही मज़दूर होता गया। इस प्रकार देश में एक ओर तो बड़े किसानों की संख्या बढ़ी, दूसरी ओर ज़मीन जोतने वाला किसान भूस्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर खेतिहर मज़दूर होने लगा! भुखमरी से बचने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े पैमाने पर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, परन्तु इन असहाय लोगों का स्वागत करने के लिए वहाँ भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हो थीं। प्रेमचन्द 'गोदान' में होरी और गोबर के माध्यम से इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले होरी की ट्रेजिडी नहीं है, पूरे छोटे किसानों के साथ साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण-तन्त्र का क्रूर मजाक है, जो दूसरे ढंग से आज भी जारी है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ग्रामीण गरीबी का प्रेमचन्द जो यथार्थ चित्रण करते हैं, यह यूरोप में किसी व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है-- "टूटे-फूटे झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के ढेर, कीचड़ में लिपटी भैंसें, दुर्बल गायें, हड्डी निकले किसान, जवानी में ही जिन पर बुढ़ापा आ गया है।" जिसकी कल्पना न की जा सके, उसे कहते हैं
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये आज से सप्तदशक पूर्व सम्पादकाचार्य पराड़करजी ने कहा था- हम सब सम्पादक पत्रों की उन्नति चाहते हैं। पर हमें स्मरण रखना चाहिए कि इस उन्नति के साथ-साथ हमारी स्वातंत्र्य-हानि अवश्यम्भावी है। उन्नति व्यापारी ढंग से ही हो सकती है, इसके लिए पूँजीपति और संचालक व्यवसाय की आवश्यकता है। इनके कथनानुसार और भी पत्र का सम्पादन करना असम्भव हो जाता है। इंग्लैण्ड और अमेरिका के पत्रों में स्पष्ट देखा जाता है कि इनके समाचार स्तम्भ, मनोरंजन स्तम्भ जितने ही अच्छे हो रहे हैं, उनके सम्पादकीय स्तम्भ उतने ही निकम्मे बनते जा रहे हैं। लन्दन के 'टाइम्स' जैसे दो-तीन पत्र इसक अपवाद हैं। पर साधारण नियम वही है जो बताया जा चुका है। एडिटर की अपेक्षा मैनेजिंग एडिटर का प्रभाव और गौरव अधिक बढ़ गया है। भावी हिन्दी समाचार-पत्रों में ऐसा ही होगा। पत्र निकालकर सफलतापूर्वक चलाना बड़े-बड़े धनियों अथवा सुसंघटित कम्पनियों के लिए संभव होगा। पत्र सर्वांगसुन्दर होंगे। आकार बड़े होंगे, छपाई अच्छी होगी, मनोहर, मनोरंजक और ज्ञानवर्द्धक चित्रों से ससज्जित होंगे. लेखों में विविधता होगी, काल्पकता होगी, गम्भीर गवेषणा की झलक होगी और मनोहारिणी शक्ति भी होगी, ग्राहकों की संख्या लाखों में गिनी जाएगी। यह सब कुछ होगा पर पत्र प्राणहीन होंगे। पत्रों की नीति देशभक्त, धर्मभक्त अथवा मानवता के उपासक महाप्राण सम्पादकों की नीति न होगी- इन गुणों से सम्पन्न लेखक विकृत मस्तिष्क समझे जाएंगे, सम्पादक की कुर्सी तक उनकी पहुँच भी न होगी। वेतन भोगी सम्पादक मालिक का काम करेंगे और बड़ी खूबी के साथ करेंगे। वे हम लोगों से अच्छे होंगे। पर आज भी हमें जो स्वतन्त्रता प्राप्त है वह उन्हें न होगी। वस्तुतः पत्रों के जीवन में यही समय बहुमूल्य है। इंग्लैण्ड और अमेरिका के पत्रों ने उन्हीं दिनों सच्चा काम किया था जब उनके आकार छोटे थे, समाचार कम होते थे, ग्राहक थोडे होते थे पर सम्पादक की लेखनी में ओज था और प्राण था। उन देशों की इस उन्नति के बहुत कुछ कारण वे ही सम्पादक थे जिनसे धनी घृणा करते थे, शासक क्रुद्ध रहा करते थे और जो हमारे ही जैसे, एक पैर जेल में रखकर धर्मबुद्धि से पत्र सम्पादन किया करते थे। उनके परिश्रम से और कष्ट से पत्रों की उन्नति हुई पर उनके वंश का लोप हो गया। अब संचालक और व्यवस्थापक सर्वेसर्वा हैं, सम्पादक कुछ नहीं है। प्रस्तुत गद्यांश का उपयुक्त शीर्षक है
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