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वैज्ञानिकों ने पता लगा लिया कि पहले मुर्गी आई या फिर अंडा? Hen or egg | #shorts

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Given that the lengths of the paths of a ball thrown with different speeds by two boys are the same, and the average speed for the first and second throws are respectively 90 km/h and 162 km/h, then what is the time taken by the first throw to cover the length if the same for the second thrown is one second? दिया गया है कि दो लड़कों के द्वारा अलग-अलग चाल से फेंकी गयी गेंदों के मार्ग की लंबाई समान है तथा पहले और दूसरे फेंकी गयी गेंदों की औसत गति क्रमशः 90 किमी / घंटा और 162 किमी / घंटा है, अगर दूसरे फेंकी गयी गेंद ने इस लंबाई को कवर करने के लिए एक सेकंड का समय लिया तो पहली फेंकी गयी गेंद द्वारा इस लंबाई को कवर करने के लिए लिया गया समय क्या है?

गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नों में सबसे उचित विकल्प चुनिए। यह तो आप जानते हैं कि पृथ्वी प्रारंभ में आग का गोला थी। मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि ऐसी आग में मुझ पानी का जन्म कैसे हुआ। लगता यह है कि हमारी पृथ्वी ज्यों-ज्यों ठंडी होती गई तो उसमें मौजूद गैसों में क्रियाएँ हुईं। हाइड्रोजन और ऑक्सीजन की रासायनिक क्रियाओं से मेरा जन्म हुआ है। इन दोनों ने आपना अस्तित्व मिटाकर मुझे बनाया! पहले मैं पृथ्वी के ऊपर भाप रूप में ही था। फिर जाने क्या हुआ कि मैं ठोस बर्फ बन गया। कल्पना करो चारों ओर बर्फ ही बर्फ। जब सूर्य की किरणें हम पर पड़ती तो चारों और सौन्दर्य बिखर पड़ता। लाखों वर्षों तक इस रूप में रहने के बाद मैं फिसलने लगा क्योंकि बर्फ के ही दबाव से निचली परत पिघलने लगी थी। फिसलकर हम पहुँचे सागर में। वहाँ की तो बात ही निराली थी। वहाँ अब तक हमसे पहले पहुँचे पानी में छोटे-छोटे जीव तैरने लगे थे। घोंघे, मछलियाँ और कछुवे भी। धीरे-धीरे सृष्टि का विस्तार हुआ। जल के बाद स्थल में जीव बनने लगे और आज आप उसी श्रृंखला के अंग हैं और अपने को मनुष्य कहते हैं। सबसे पहले जीवधारी कहाँ पैदा हुए?

खबर के बिकने की खबर पुरानी होकर भी पुरानी नहीं हुई। यह पूछने के बावजूद कि जब मीडिया मण्डी में है और मण्डी में धर्म, ईमान, पाखण्ड, ईश्वर सत्य, कला सभी कुछ बिक रहा है, तो खबर बिकने पर चौंकना, परेशान होना अथवा दुखी होना क्यों? परेशान होना जरूरी है। मीडिया का भ्रष्टाचार लोकतन्त्र को भारी नुकसान पहुँचाने वाला है। पैसे लेकर समाचार छापने की खबर ने । हड़कम्प मचा दिया। धन का लोभ क्या-क्या नहीं करवाता? बताया गया कि मुनाफाखोरी के दबाव में कुछ मीडिया संगठनों ने पत्रकारिता के ऊँचे आदर्शों का । हत्या कर दी। कुछ समय पहले तक रिपोर्टरों अथवा संवाददाताओं को नकद या अन्य छोटे-छोटे उपहार दिए जाते थे, देश-विदेश में किसी कम्पनी या किसी शख्स के बारे में अनुकूल खबर छापने पर अच्छे होटलों में लंच-डिनर के साथ नकद भुगतान का लिफाफा दिया जाता था। ऐसी खबर हर सूरत में वस्तुनिष्ठ होते हुए व्यक्ति, पद था संस्था की प्रशंसा कर रही होती थी, परन्तु फिर बड़ा बदलाव आया। कामकाज की शैली और नियम बदल गए। मूल्यों को निश्चित करने की गलाकाट प्रतियोगिता के अतिरिक्त बड़ा मुनाफा पाने के लिए एक नई टर्म मार्केटिंग का सहारा लिया आने लगा। उसूलों के उल्लंघन के जवाब तलाश कर लिए गए। कहा गया कि एजेसियों जैसे बिचौलियों को खत्म करने में कुछ भी बुरा नहीं। प्रेस-परिषद् ने कुछ दायित्व समझते हुए पैसे के बदले समाचार' पर एक कमेटी का गठन किया, जिससे चुनाव के दौरान नेताओं अथवा राजनीतिक दलों से पैसा लेकर समाचार प्रकाशित करने वाले जिम्मेदार कारकों को कठघरे में खड़ा किया जा सके, परन्तु कॉरिट मीडिया की दृश्य-अदृश्य शक्ति के सामने ऐसा हो न सका। सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी ने भी इस अनर्थ को रोकने की कोशिश को , परन्तु मीडिया-समूह और राजनीति के कार्यकर्ताओं के बीच दलाली पैकेज में सभी कुछ चल रहा है। किस मण्डी में धर्म और ईश्वर बिक रहा है?

खबर के बिकने की खबर पुरानी होकर भी पुरानी नहीं हुई। यह पूछने के बावजूद कि जब मीडिया मण्डी में है और मण्डी में धर्म, ईमान, पाखण्ड, ईश्वर सत्य, कला सभी कुछ बिक रहा है, तो खबर बिकने पर चौंकना, परेशान होना अथवा दुखी होना क्यों? परेशान होना जरूरी है। मीडिया का भ्रष्टाचार लोकतन्त्र को भारी नुकसान पहुँचाने वाला है। पैसे लेकर समाचार छापने की खबर ने । हड़कम्प मचा दिया। धन का लोभ क्या-क्या नहीं करवाता? बताया गया कि मुनाफाखोरी के दबाव में कुछ मीडिया संगठनों ने पत्रकारिता के ऊँचे आदर्शों का । हत्या कर दी। कुछ समय पहले तक रिपोर्टरों अथवा संवाददाताओं को नकद या अन्य छोटे-छोटे उपहार दिए जाते थे, देश-विदेश में किसी कम्पनी या किसी शख्स के बारे में अनुकूल खबर छापने पर अच्छे होटलों में लंच-डिनर के साथ नकद भुगतान का लिफाफा दिया जाता था। ऐसी खबर हर सूरत में वस्तुनिष्ठ होते हुए व्यक्ति, पद था संस्था की प्रशंसा कर रही होती थी, परन्तु फिर बड़ा बदलाव आया। कामकाज की शैली और नियम बदल गए। मूल्यों को निश्चित करने की गलाकाट प्रतियोगिता के अतिरिक्त बड़ा मुनाफा पाने के लिए एक नई टर्म मार्केटिंग का सहारा लिया आने लगा। उसूलों के उल्लंघन के जवाब तलाश कर लिए गए। कहा गया कि एजेसियों जैसे बिचौलियों को खत्म करने में कुछ भी बुरा नहीं। प्रेस-परिषद् ने कुछ दायित्व समझते हुए पैसे के बदले समाचार' पर एक कमेटी का गठन किया, जिससे चुनाव के दौरान नेताओं अथवा राजनीतिक दलों से पैसा लेकर समाचार प्रकाशित करने वाले जिम्मेदार कारकों को कठघरे में खड़ा किया जा सके, परन्तु कॉरिट मीडिया की दृश्य-अदृश्य शक्ति के सामने ऐसा हो न सका। सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी ने भी इस अनर्थ को रोकने की कोशिश को , परन्तु मीडिया-समूह और राजनीति के कार्यकर्ताओं के बीच दलाली पैकेज में सभी कुछ चल रहा है। लोकतन्त्र को किससे नुकसान हो रहा है?

खबर के बिकने की खबर पुरानी होकर भी पुरानी नहीं हुई। यह पूछने के बावजूद कि जब मीडिया मण्डी में है और मण्डी में धर्म, ईमान, पाखण्ड, ईश्वर सत्य, कला सभी कुछ बिक रहा है, तो खबर बिकने पर चौंकना, परेशान होना अथवा दुखी होना क्यों? परेशान होना जरूरी है। मीडिया का भ्रष्टाचार लोकतन्त्र को भारी नुकसान पहुँचाने वाला है। पैसे लेकर समाचार छापने की खबर ने । हड़कम्प मचा दिया। धन का लोभ क्या-क्या नहीं करवाता? बताया गया कि मुनाफाखोरी के दबाव में कुछ मीडिया संगठनों ने पत्रकारिता के ऊँचे आदर्शों का । हत्या कर दी। कुछ समय पहले तक रिपोर्टरों अथवा संवाददाताओं को नकद या अन्य छोटे-छोटे उपहार दिए जाते थे, देश-विदेश में किसी कम्पनी या किसी शख्स के बारे में अनुकूल खबर छापने पर अच्छे होटलों में लंच-डिनर के साथ नकद भुगतान का लिफाफा दिया जाता था। ऐसी खबर हर सूरत में वस्तुनिष्ठ होते हुए व्यक्ति, पद था संस्था की प्रशंसा कर रही होती थी, परन्तु फिर बड़ा बदलाव आया। कामकाज की शैली और नियम बदल गए। मूल्यों को निश्चित करने की गलाकाट प्रतियोगिता के अतिरिक्त बड़ा मुनाफा पाने के लिए एक नई टर्म मार्केटिंग का सहारा लिया आने लगा। उसूलों के उल्लंघन के जवाब तलाश कर लिए गए। कहा गया कि एजेसियों जैसे बिचौलियों को खत्म करने में कुछ भी बुरा नहीं। प्रेस-परिषद् ने कुछ दायित्व समझते हुए पैसे के बदले समाचार' पर एक कमेटी का गठन किया, जिससे चुनाव के दौरान नेताओं अथवा राजनीतिक दलों से पैसा लेकर समाचार प्रकाशित करने वाले जिम्मेदार कारकों को कठघरे में खड़ा किया जा सके, परन्तु कॉरिट मीडिया की दृश्य-अदृश्य शक्ति के सामने ऐसा हो न सका। सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी ने भी इस अनर्थ को रोकने की कोशिश को , परन्तु मीडिया-समूह और राजनीति के कार्यकर्ताओं के बीच दलाली पैकेज में सभी कुछ चल रहा है। लेखक के अनुसार

खबर के बिकने की खबर पुरानी होकर भी पुरानी नहीं हुई। यह पूछने के बावजूद कि जब मीडिया मण्डी में है और मण्डी में धर्म, ईमान, पाखण्ड, ईश्वर सत्य, कला सभी कुछ बिक रहा है, तो खबर बिकने पर चौंकना, परेशान होना अथवा दुखी होना क्यों? परेशान होना जरूरी है। मीडिया का भ्रष्टाचार लोकतन्त्र को भारी नुकसान पहुँचाने वाला है। पैसे लेकर समाचार छापने की खबर ने । हड़कम्प मचा दिया। धन का लोभ क्या-क्या नहीं करवाता? बताया गया कि मुनाफाखोरी के दबाव में कुछ मीडिया संगठनों ने पत्रकारिता के ऊँचे आदर्शों का । हत्या कर दी। कुछ समय पहले तक रिपोर्टरों अथवा संवाददाताओं को नकद या अन्य छोटे-छोटे उपहार दिए जाते थे, देश-विदेश में किसी कम्पनी या किसी शख्स के बारे में अनुकूल खबर छापने पर अच्छे होटलों में लंच-डिनर के साथ नकद भुगतान का लिफाफा दिया जाता था। ऐसी खबर हर सूरत में वस्तुनिष्ठ होते हुए व्यक्ति, पद था संस्था की प्रशंसा कर रही होती थी, परन्तु फिर बड़ा बदलाव आया। कामकाज की शैली और नियम बदल गए। मूल्यों को निश्चित करने की गलाकाट प्रतियोगिता के अतिरिक्त बड़ा मुनाफा पाने के लिए एक नई टर्म मार्केटिंग का सहारा लिया आने लगा। उसूलों के उल्लंघन के जवाब तलाश कर लिए गए। कहा गया कि एजेसियों जैसे बिचौलियों को खत्म करने में कुछ भी बुरा नहीं। प्रेस-परिषद् ने कुछ दायित्व समझते हुए पैसे के बदले समाचार' पर एक कमेटी का गठन किया, जिससे चुनाव के दौरान नेताओं अथवा राजनीतिक दलों से पैसा लेकर समाचार प्रकाशित करने वाले जिम्मेदार कारकों को कठघरे में खड़ा किया जा सके, परन्तु कॉरिट मीडिया की दृश्य-अदृश्य शक्ति के सामने ऐसा हो न सका। सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी ने भी इस अनर्थ को रोकने की कोशिश को , परन्तु मीडिया-समूह और राजनीति के कार्यकर्ताओं के बीच दलाली पैकेज में सभी कुछ चल रहा है। पैसे के बदले समाचार पर कमेटी का गठन किसके द्वारा किया गया?

खबर के बिकने की खबर पुरानी होकर भी पुरानी नहीं हुई। यह पूछने के बावजूद कि जब मीडिया मण्डी में है और मण्डी में धर्म, ईमान, पाखण्ड, ईश्वर सत्य, कला सभी कुछ बिक रहा है, तो खबर बिकने पर चौंकना, परेशान होना अथवा दुखी होना क्यों? परेशान होना जरूरी है। मीडिया का भ्रष्टाचार लोकतन्त्र को भारी नुकसान पहुँचाने वाला है। पैसे लेकर समाचार छापने की खबर ने । हड़कम्प मचा दिया। धन का लोभ क्या-क्या नहीं करवाता? बताया गया कि मुनाफाखोरी के दबाव में कुछ मीडिया संगठनों ने पत्रकारिता के ऊँचे आदर्शों का । हत्या कर दी। कुछ समय पहले तक रिपोर्टरों अथवा संवाददाताओं को नकद या अन्य छोटे-छोटे उपहार दिए जाते थे, देश-विदेश में किसी कम्पनी या किसी शख्स के बारे में अनुकूल खबर छापने पर अच्छे होटलों में लंच-डिनर के साथ नकद भुगतान का लिफाफा दिया जाता था। ऐसी खबर हर सूरत में वस्तुनिष्ठ होते हुए व्यक्ति, पद था संस्था की प्रशंसा कर रही होती थी, परन्तु फिर बड़ा बदलाव आया। कामकाज की शैली और नियम बदल गए। मूल्यों को निश्चित करने की गलाकाट प्रतियोगिता के अतिरिक्त बड़ा मुनाफा पाने के लिए एक नई टर्म मार्केटिंग का सहारा लिया आने लगा। उसूलों के उल्लंघन के जवाब तलाश कर लिए गए। कहा गया कि एजेसियों जैसे बिचौलियों को खत्म करने में कुछ भी बुरा नहीं। प्रेस-परिषद् ने कुछ दायित्व समझते हुए पैसे के बदले समाचार' पर एक कमेटी का गठन किया, जिससे चुनाव के दौरान नेताओं अथवा राजनीतिक दलों से पैसा लेकर समाचार प्रकाशित करने वाले जिम्मेदार कारकों को कठघरे में खड़ा किया जा सके, परन्तु कॉरिट मीडिया की दृश्य-अदृश्य शक्ति के सामने ऐसा हो न सका। सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी ने भी इस अनर्थ को रोकने की कोशिश को , परन्तु मीडिया-समूह और राजनीति के कार्यकर्ताओं के बीच दलाली पैकेज में सभी कुछ चल रहा है। पैसे लेकर समाचार को प्रकाशित करने की स्थिति को रोकने की कोशिश किस पत्रकार ने की?

खबर के बिकने की खबर पुरानी होकर भी पुरानी नहीं हुई। यह पूछने के बावजूद कि जब मीडिया मण्डी में है और मण्डी में धर्म, ईमान, पाखण्ड, ईश्वर सत्य, कला सभी कुछ बिक रहा है, तो खबर बिकने पर चौंकना, परेशान होना अथवा दुखी होना क्यों? परेशान होना जरूरी है। मीडिया का भ्रष्टाचार लोकतन्त्र को भारी नुकसान पहुँचाने वाला है। पैसे लेकर समाचार छापने की खबर ने । हड़कम्प मचा दिया। धन का लोभ क्या-क्या नहीं करवाता? बताया गया कि मुनाफाखोरी के दबाव में कुछ मीडिया संगठनों ने पत्रकारिता के ऊँचे आदर्शों का । हत्या कर दी। कुछ समय पहले तक रिपोर्टरों अथवा संवाददाताओं को नकद या अन्य छोटे-छोटे उपहार दिए जाते थे, देश-विदेश में किसी कम्पनी या किसी शख्स के बारे में अनुकूल खबर छापने पर अच्छे होटलों में लंच-डिनर के साथ नकद भुगतान का लिफाफा दिया जाता था। ऐसी खबर हर सूरत में वस्तुनिष्ठ होते हुए व्यक्ति, पद था संस्था की प्रशंसा कर रही होती थी, परन्तु फिर बड़ा बदलाव आया। कामकाज की शैली और नियम बदल गए। मूल्यों को निश्चित करने की गलाकाट प्रतियोगिता के अतिरिक्त बड़ा मुनाफा पाने के लिए एक नई टर्म मार्केटिंग का सहारा लिया आने लगा। उसूलों के उल्लंघन के जवाब तलाश कर लिए गए। कहा गया कि एजेसियों जैसे बिचौलियों को खत्म करने में कुछ भी बुरा नहीं। प्रेस-परिषद् ने कुछ दायित्व समझते हुए पैसे के बदले समाचार' पर एक कमेटी का गठन किया, जिससे चुनाव के दौरान नेताओं अथवा राजनीतिक दलों से पैसा लेकर समाचार प्रकाशित करने वाले जिम्मेदार कारकों को कठघरे में खड़ा किया जा सके, परन्तु कॉरिट मीडिया की दृश्य-अदृश्य शक्ति के सामने ऐसा हो न सका। सुप्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी ने भी इस अनर्थ को रोकने की कोशिश को , परन्तु मीडिया-समूह और राजनीति के कार्यकर्ताओं के बीच दलाली पैकेज में सभी कुछ चल रहा है। निम्नलिखित में से कौन-सा सामासिक पद नहीं है?

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