महाराणा प्रताप के जीवन की अनसुनी बातें जो आपको पता होनी चाहिये | A True Rajput || Jano India #shorts
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गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित प्रश्नो में से सबसे उचित विकल्प चुनिए। यायावरी यात्राओं के सुखो में एक सुख तो यह है की निकले किसी चीज की खोज में और मिल जाए कोई दूसरी ही चीज। लेकिन जीवन - भर यायावरी करते रहकर भी उस कल्पनातीत आविष्कार के लिए में तैयार नहीं था। जो इस बार राम - जानकी यात्रा के दौरान अकस्मात हुआ। यह तो जानता था की रामायण के चरित्रों से सम्बद्ध जिन स्थलों की खोज में निकला हूँ , उनके ऐसे अवशेष तो क्या ही मिल सकते है जिन्हे 'ऐतिहासिक' कहा जाए और यह भी जानता था की रामायण क चरित्रों से सम्बद्ध जिन स्थलों की खोज में निकला हूँ उनके ऐसे बहुत से स्थल मिल जायेंगे जिनका रामायण से कोई वास्तविक सम्बन्ध जरूर रहा हो , लेकिन उन्हें देखकर एकाएक यह मानने को जी होने लगे की कुछ सम्बन्ध जरूर रहा होगा। खासकर नेपाल ट्राई के जंगलो और नदी -नालो -भरे प्रदेशमें से गुजरते हुए तो मन हो ऐसा हो गया था किसी भी स्थल से जुड़ी किसी असुर की , गन्धर्व की , अप्सरा की , किरात अथवा नागकन्या की गाथा सुनकर एकाएक यह प्रतिक्रिया न होती की यह सब मनगढ़ंत है , ऐसा वास्तव में हुआ नहीं होगा , केवल आदिम -मानव की कच्ची कल्पना ने ये किसस गड़े होंगे। निश्चय ही स्थलों का अपना जादू होता है। ठोस व्यावहारिक आदमी भी ऐसे स्थलों पर पहुंचकर पाता है की उसकी कल्पना चेत उठी है फिर उसे अपनी संस्कृति के पुराण की ही बाते क्यों , दूसरी संस्कृतियों के पुराण भी सच्चे जान पढ़ने लगते है उनके भी वन - देवता और लता -बलाएँ और नदी -अप्सराएं देखते -देखते उसके आगे रूप लेने लगती है। रामायण -स्थलों की खोज पर जाने से पहले लेखक को क्या पता था ?
छात्र की सहायता करना अत्यावश्यक है कि उसका मन वैज्ञानिक, स्पष्ट, निश्चित और सूक्ष्मता से सोचने वाला तथा उसके साथ ही साथ मन की गहराईयों को अनावृत करने वाला हो। क्या छात्र को इस प्रकार शिक्षित करना संभव है कि वह सभी लेबिलों के परे जो कर सके तथा उस वस्त का पता लगा सके, उसका अनुभव कर सके, जिसको मन नहीं माप सकता, जो किसी पुस्तक में नहीं लिखा है। यदि इस प्रकार के एक विद्यालय में ऐसी शिक्षा संभव हो सके, तो वह अनूठी होगी। आप सभी को यह देखना चाहिए कि इस प्रकार के विद्यालय का निर्माण कितना मूल्यवान होगा। केवल नृत्य, संगीत, गणित और दूसरे पाठों पर ध्यान देना समस्त जीवन नहीं है। शांत बैठना तथा अपने को देखना, सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त करना, अवलोकन करना भी जीवन का अंग है। विचार कैसे किया जाए. किस पर विचार किया जाए, तथा आप विचार क्यों कर रहे हैं, इसको देखना भी आवश्यक है। 'सूक्ष्म' का विलोम
भाषा 'जातीय जीवन और उसकी संस्कृति की सर्वप्रधान रक्षिका है, वह उसके शील का दर्पण है, वह उसके विकास का वैभव है। भाषा जीती, और सब जीत लिया। फिर कुछ भी जीतने के लिए शेष नहीं रह जाता। विजितों का अस्तित्व मिट चलता है। विजितों के मुँह से निकली हुई विजयीजनों की भाषा उनकी दासता की सबसे बड़ी चिन्हानी है। पराई भाषा चरित्र की दृढ़ता का अपहरण कर लेती है, मौलिकता का विनाश कर देती है और नकल करने का स्वभाव बना करके उत्कृष्ट गुणों और प्रतिभा से नमस्कार करा देती है। इसीलिए, जो देश दुर्भाग्य से पराधीन हो जाते हैं, वे उस समय तक, जब तक कि वे अपना सब कुछ नहीं खो देते, अपनी भाषा की रक्षा के लिए सदा लोहा लेते रहना अपना कर्तव्य समझते हैं। अनेक यूरोपीय देशों के इतिहास भाषा-संग्राम की घटनाओं से भरे पड़े हैं। प्राचीन रोम साम्राज्य से लेकर अब तक के रूस, जर्मन, इटैलियन, आस्ट्रियन, फ्रेंच और ब्रिटिश सभी साम्राज्यों ने अपने अधीन देशों की भाषा पर अपनी विजय-वैजयंती फहरायी। भाषा-विजयी का यह काम सहज से नहीं हो गया। भाषा-समरस्थली के एक-एक इंच स्थान के लिए बड़ी-बड़ी लड़ाइयाँ हुई। देश की स्वाधीनता के लिए मर मिटने वाले अनेक वीर-पुंगवों के समयों में इस विचार का स्थान सदा ऊँचा रहा है कि देश की भौगोलिक सीमा की अपेक्षा मातृभाषा की सीमा की रक्षा की अधिक आवश्यकता है। वे अनुभव करते थे कि भाषा बची रहेगी तो देश का अस्तित्व और उसकी आत्मा बची रहेगी, अन्यथा फिर कहीं उसका कुछ भी पता न लगेगा। लेखक के अनुसार जातीय जीवन की रक्षिका कौन है?
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। महात्मा गाँधी ने किसे अगोचर माना है?
गाँधीजी ने माना कि अहिंसा ईश्वर की कल्पना की तरह अनिर्वचनीय एवं अगोचर है, पर जीवन में इसके आभास होते रहते हैं। वर्ष 1940 में कलकत्ता के समीप मलिकन्दा में अपने शीर्षस्थ साथियों की सभा में गाँधीजी ने कहा था, "अहिंसा अगर व्यक्तिगत गुण है, तो यह मेरे लिए त्याज्य है। मेरी अहिंसा की कल्पना व्यापक है मैं तो उसका सेवक हूँ, जो चीज करोड़ों की नहीं हो सकती, वह मेरे लिए त्याज्य है और मेरे साथियों के लिए भी त्याज्य होनी चाहिए। हम तो यह सिद्ध करने के लिए पैदा हुए हैं कि सत्य और अहिंसा केवल व्यक्तिगत आधार के नियम नहीं हैं। यह समुदाय, जाति और राष्ट्र की नीति हो सकती है।" उन्होंने आगे कहा, "मैंने इसी को अपना कर्तव्य माना है। चाहे सारा जगत् मुझे छोड़ दे, तो भी मैं इसे नहीं छोडूंगा। इसे सिद्ध करने के लिए ही मैं जीऊँगा और उसी प्रयल में मैं मरूँगा।" वास्तव में, महानायक बनने में उनके जिस विचार ने सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई वह उनका अहिंसा का ही विचार था। इसलिए देश की आजादी को अति महत्त्वपूर्ण लक्ष्य मानते हुए भी वह उसे अहिंसा को त्यागकर प्राप्त करना नहीं चाहते थे। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंसा के बदले अहिंसा को हथियार बनाने का कारण भी यही था। महात्मा गाँधी के दक्षिण अफ्रीका प्रवास पर यदि हम एक विहंगम दृष्टि डालें, तो स्पष्ट होगा कि एक साधारण से व्यक्ति के रूप में पहुंचे गाँधीजी ने 22 वर्ष की लम्बी लड़ाई में अपमान, भूख, मानसिक सन्ताप व शारीरिक यातनाएँ झेलते हुए न केवल राजनीतिक, बल्कि सामाजिक व नैतिक क्षेत्र में जो उपलब्धियाँ प्राप्त की, उसकी मिसाल अन्यत्र मिलना असम्भव है। उनके भारत लौटने पर गुरुदेव टैगोर ने कहा था-"भिखारी के लिबास में एक महान् आत्मा लौटकर आई है।" सन् 1919 से लेकर 1948 में अपनी मृत्यु तक भारत के स्वाधीनता आन्दोलन के महान् ऐतिहासिक नाटक में गाँधीजी की भूमिका मुख्य अभिनेता की रही। उनका जीवन उनके शब्दों से भी बड़ा था। उनका आचरण विचारों से महान् था और उनकी जीवन प्रक्रिया तर्क से अधिक सृजनात्मक थी। ये सभी महात्मा गाँधी ने स्वयं को किसका सेवक कहा है?
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