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क्यों रखना पड़ा इन्हे राणा जी का भेष || ...

क्यों रखना पड़ा इन्हे राणा जी का भेष || झाला मानसिंह | Jano India #shorts

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वर्ष 1914 तक देश का औद्योगिक विकास बेहद धीमा रहा और साम्राज्यवादी शोषण अत्यन्त तीव्र हो गया। गाँवों की अर्थव्यवस्था पंगु हो गई। सबसे अधिक बुरा प्रभाव कारीगरों, हरिजनों और छोटे किसानों पर पड़ा। ग्रामीण जन साम्राज्य और उनके भारतीय एजेण्ट जमींदारों के दोहरे शोषण की चक्की में पिस रहे थे। ब्रिटिश काल में सूदखोर महाजनों का एक ऐसा वर्ग पैदा हुआ, जिनसे एक बार कर्ज लेने पर गाँव के किसान जीवन-भर गुलामी का पट्टा पहनने पर मजबूर हो जाते थे। उनके हिसाब के सूद का भुगतान करने में असमर्थ किसान महाजनों को खेत बेचने पर मजबूर होकर अपनी ज़मीन पर ही मज़दूर होता गया। इस प्रकार देश में एक ओर तो बड़े किसानों की संख्या बढ़ी, दूसरी ओर ज़मीन जोतने वाला किसान भूस्वामित्व के अधिकार से वंचित होकर खेतिहर मज़दूर होने लगा! भुखमरी से बचने के लिए बड़ी संख्या में ग्रामीण बड़े पैमाने पर रोजी-रोटी की तलाश में शहरों की ओर भागने लगे, परन्तु इन असहाय लोगों का स्वागत करने के लिए वहाँ भी कठिनाइयाँ और समस्याएँ हो थीं। प्रेमचन्द 'गोदान' में होरी और गोबर के माध्यम से इस ऐतिहासिक प्रक्रिया को विस्तार से हमारे सामने प्रस्तुत करते हैं। यह अकेले होरी की ट्रेजिडी नहीं है, पूरे छोटे किसानों के साथ साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के शोषण-तन्त्र का क्रूर मजाक है, जो दूसरे ढंग से आज भी जारी है। 20वीं शताब्दी के आरम्भ में ग्रामीण गरीबी का प्रेमचन्द जो यथार्थ चित्रण करते हैं, यह यूरोप में किसी व्यक्ति के लिए अकल्पनीय है-- "टूटे-फूटे झोंपड़े, मिट्टी की दीवारें, घरों के सामने कूड़े-करकट के ढेर, कीचड़ में लिपटी भैंसें, दुर्बल गायें, हड्डी निकले किसान, जवानी में ही जिन पर बुढ़ापा आ गया है।" ग्रामीण लोग शहरों की ओर क्यों पलायन कर रहे थे?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 13 आम की थी डॉल हरियल में मगनमन झूमता था कई पल्लव और भी थे, उन्हें जी भर घूमता था। देख मेरा हरा यौवन मुस्कुराती नित्य डाली गीत से मन जीत लेते कभी कोयल, कभी माली बाग बस्ती में अचानक हुआ मेरा रंग पीला खिलखिलाना बन्द, बजना बन्द, यह तन पड़ा ढीला। हवा ने ऐसा हिलाया डाल का भी साथ छूटा रह गया परिवार पीछे, एक पल्लव हाया टूटा। जब हवा की गोद में कुछ दूर बगिया से बहा देवता हो तुम पवन मेरी सुनो मैने कहा। जन्मभूमि बाग मेरी मूल माँ के चरण चूमूँ खाद बनकर करूँ सेवा फिर किसी डाली पे झूमूँ पवन की करुणा-कृपा से बाग में उड़ लौट आया वृक्ष के चरणों में पल्लव खाद बनकर मुस्कुराया। 'यौवन' शब्द का विलोम लिखिए

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 13 आम की थी डॉल हरियल में मगनमन झूमता था कई पल्लव और भी थे, उन्हें जी भर घूमता था। देख मेरा हरा यौवन मुस्कुराती नित्य डाली गीत से मन जीत लेते कभी कोयल, कभी माली बाग बस्ती में अचानक हुआ मेरा रंग पीला खिलखिलाना बन्द, बजना बन्द, यह तन पड़ा ढीला। हवा ने ऐसा हिलाया डाल का भी साथ छूटा रह गया परिवार पीछे, एक पल्लव हाया टूटा। जब हवा की गोद में कुछ दूर बगिया से बहा देवता हो तुम पवन मेरी सुनो मैने कहा। जन्मभूमि बाग मेरी मूल माँ के चरण चूमूँ खाद बनकर करूँ सेवा फिर किसी डाली पे झूमूँ पवन की करुणा-कृपा से बाग में उड़ लौट आया वृक्ष के चरणों में पल्लव खाद बनकर मुस्कुराया। 'हरियल' शब्द का अर्थ है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 13 आम की थी डॉल हरियल में मगनमन झूमता था कई पल्लव और भी थे, उन्हें जी भर घूमता था। देख मेरा हरा यौवन मुस्कुराती नित्य डाली गीत से मन जीत लेते कभी कोयल, कभी माली बाग बस्ती में अचानक हुआ मेरा रंग पीला खिलखिलाना बन्द, बजना बन्द, यह तन पड़ा ढीला। हवा ने ऐसा हिलाया डाल का भी साथ छूटा रह गया परिवार पीछे, एक पल्लव हाया टूटा। जब हवा की गोद में कुछ दूर बगिया से बहा देवता हो तुम पवन मेरी सुनो मैने कहा। जन्मभूमि बाग मेरी मूल माँ के चरण चूमूँ खाद बनकर करूँ सेवा फिर किसी डाली पे झूमूँ पवन की करुणा-कृपा से बाग में उड़ लौट आया वृक्ष के चरणों में पल्लव खाद बनकर मुस्कुराया। 'मैं' किसका प्रतीक है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 13 आम की थी डॉल हरियल में मगनमन झूमता था कई पल्लव और भी थे, उन्हें जी भर घूमता था। देख मेरा हरा यौवन मुस्कुराती नित्य डाली गीत से मन जीत लेते कभी कोयल, कभी माली बाग बस्ती में अचानक हुआ मेरा रंग पीला खिलखिलाना बन्द, बजना बन्द, यह तन पड़ा ढीला। हवा ने ऐसा हिलाया डाल का भी साथ छूटा रह गया परिवार पीछे, एक पल्लव हाया टूटा। जब हवा की गोद में कुछ दूर बगिया से बहा देवता हो तुम पवन मेरी सुनो मैने कहा। जन्मभूमि बाग मेरी मूल माँ के चरण चूमूँ खाद बनकर करूँ सेवा फिर किसी डाली पे झूमूँ पवन की करुणा-कृपा से बाग में उड़ लौट आया वृक्ष के चरणों में पल्लव खाद बनकर मुस्कुराया। 'रह गया परिवार पीछे' में परिवार किसे कहा गया है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 13 आम की थी डॉल हरियल में मगनमन झूमता था कई पल्लव और भी थे, उन्हें जी भर घूमता था। देख मेरा हरा यौवन मुस्कुराती नित्य डाली गीत से मन जीत लेते कभी कोयल, कभी माली बाग बस्ती में अचानक हुआ मेरा रंग पीला खिलखिलाना बन्द, बजना बन्द, यह तन पड़ा ढीला। हवा ने ऐसा हिलाया डाल का भी साथ छूटा रह गया परिवार पीछे, एक पल्लव हाया टूटा। जब हवा की गोद में कुछ दूर बगिया से बहा देवता हो तुम पवन मेरी सुनो मैने कहा। जन्मभूमि बाग मेरी मूल माँ के चरण चूमूँ खाद बनकर करूँ सेवा फिर किसी डाली पे झूमूँ पवन की करुणा-कृपा से बाग में उड़ लौट आया वृक्ष के चरणों में पल्लव खाद बनकर मुस्कुराया। बिछड़े पत्ते की चाह क्या थी?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 13 आम की थी डॉल हरियल में मगनमन झूमता था कई पल्लव और भी थे, उन्हें जी भर घूमता था। देख मेरा हरा यौवन मुस्कुराती नित्य डाली गीत से मन जीत लेते कभी कोयल, कभी माली बाग बस्ती में अचानक हुआ मेरा रंग पीला खिलखिलाना बन्द, बजना बन्द, यह तन पड़ा ढीला। हवा ने ऐसा हिलाया डाल का भी साथ छूटा रह गया परिवार पीछे, एक पल्लव हाया टूटा। जब हवा की गोद में कुछ दूर बगिया से बहा देवता हो तुम पवन मेरी सुनो मैने कहा। जन्मभूमि बाग मेरी मूल माँ के चरण चूमूँ खाद बनकर करूँ सेवा फिर किसी डाली पे झूमूँ पवन की करुणा-कृपा से बाग में उड़ लौट आया वृक्ष के चरणों में पल्लव खाद बनकर मुस्कुराया। 'आम की हरियल डाली' किसकी प्रतीक है?