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तुम्हारा भी हुनर बोलेगा ||...

तुम्हारा भी हुनर बोलेगा ||

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दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 35 माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिचन किन्तु फिर भी कर रहा इतना निवेदन थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण। माँ मुझे बलिदान का वरदान दे दो तोड़ता हूँ मोह का बन्धन क्षमा दो आज सीधे हाथ में तलवार दे दो और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो। सुमन अर्पित चमन अर्पित नीड़ का कण-कण समर्पित चाहता हूँ, देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ। 'अकिंचन' का अर्थ है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 35 माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिचन किन्तु फिर भी कर रहा इतना निवेदन थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण। माँ मुझे बलिदान का वरदान दे दो तोड़ता हूँ मोह का बन्धन क्षमा दो आज सीधे हाथ में तलवार दे दो और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो। सुमन अर्पित चमन अर्पित नीड़ का कण-कण समर्पित चाहता हूँ, देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ। 'बलिदान' शब्द से बना विशेषण है

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 35 माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिचन किन्तु फिर भी कर रहा इतना निवेदन थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण। माँ मुझे बलिदान का वरदान दे दो तोड़ता हूँ मोह का बन्धन क्षमा दो आज सीधे हाथ में तलवार दे दो और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो। सुमन अर्पित चमन अर्पित नीड़ का कण-कण समर्पित चाहता हूँ, देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ। 'माँ' सम्बोधन किसके लिए है?

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 35 माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिचन किन्तु फिर भी कर रहा इतना निवेदन थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण। माँ मुझे बलिदान का वरदान दे दो तोड़ता हूँ मोह का बन्धन क्षमा दो आज सीधे हाथ में तलवार दे दो और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो। सुमन अर्पित चमन अर्पित नीड़ का कण-कण समर्पित चाहता हूँ, देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ। कवि निवेदन कर रहा है कि

दिए गए पद्यांश को ध्यान से पढ़िए और उसके आधार पर पूछे गए प्रश्न का यथोचित उत्तर दीजिए। पद्यांश 35 माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिचन किन्तु फिर भी कर रहा इतना निवेदन थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब भी कर दया स्वीकार लेना वह समर्पण। माँ मुझे बलिदान का वरदान दे दो तोड़ता हूँ मोह का बन्धन क्षमा दो आज सीधे हाथ में तलवार दे दो और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो। सुमन अर्पित चमन अर्पित नीड़ का कण-कण समर्पित चाहता हूँ, देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ। 'नीड़ का कण-कण समर्पित' कथन में 'नीड़' का आशय है