करंट लगने पर इंसान की मौत क्यों होती हे? #shorts | Hindi Facts | Mr.FactCity
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If a train runs with the speed of 52km/h, it reaches its destination late by 15 minutes. However, if its speed is 65km/h, it is late by 5 minutes only. The right time for the train to cover its journey is: यदि कोई ट्रेन 52 किमी/घंटा की चाल से चलती है, तो यह अपने गंतव्य स्थल पर 15 मिनट की देरी से पहुँचती है | लेकिन, जब इसकी चाल 65 किमी/घंटा होती है, तो यह केवल 5 मिनट देर करती है | ट्रेन को यात्रा पूर्ण करने में लगने वाला सही समय क्या है?
If a train runs at 60 Km/h, it reaches its destination 15 late. But, if it runs at 80 Km/h, it is late by 7 minutes only. The right time for the train to cover its journey is: यदि एक ट्रेन 60 किमी/घंटा की चाल से चलती है तो यह अपने गंतव्य स्थल पर 15 मिनट देर से पहुँचती है | लेकिन, यदि यह 80 किमी/घंटा की चाल से चलती है, तो इसे केवल 7 मिनट की देरी होती है | इस यात्रा को पूर्ण करने में ट्रेन को लगने वाला सही समय ज्ञात करें |
If a train runs with the speed of 36 km/h, it reaches its destination 15 minutes late. However, if its speed is 45 km/h, it is late by only 4 minutes. The correct time to cover its journey in minutes is : यदि एक ट्रेन 36 किमी/घंटा की चाल से चलती है तो यह अपने गंतव्य स्थल पर 15 मिनट देर से पहुँचती है | लेकिन, यदि यह 45 किमी/घंटा की चाल से चलती है, तो इसे केवल 4 मिनट की देरी होती है | इस यात्रा को पूर्ण करने में ट्रेन को लगने वाला सही समय ज्ञात करें |
निम्नलिखित गद्यांश के आधार पर प्रश्नों के सही विकल्प चुनिये इस संसार की यही रीति है। सत्यवादी मारा जाता है। आज से सहस्त्रों वर्ष पूर्व ग्रीस देश में एक दार्शनिक रहा करता था। उसका नाम सुकरात था। उसकी बातें सीधी-सच्ची पर तीखी होती थी। समाज उन्हें सह नहीं सका और उसे कानूनी आज्ञा का पालन करते हुए विष का प्याला पीना पड़ा, इसी प्रकार तत्कालीन शासन-सत्ता तथा सामाजिक और धार्मिक दुराचारों के विरुद्ध आवाज उठाने पर ईसा को सूली पर चढ़ना पड़ा, इसी प्रकार तत्कालीन शासन-सत्ता तथा सामाजिक और धार्मिक दुराचारों के विरुद्ध आवाज उठाने पर ईसा को सूली पर चढ़ना पड़ा। सलीब पर से ईसा का यह आर्तनाद आज भी गूंज रहा है-हे प्रभु, हे पिता, तुम हमें क्यों भूल गए हो? साम्प्रदायिक विष को शान्त करने और लोगों में साम्प्रदायिक सद्भावना फैलाने के लिए गांधीजी अपने जीवन की बाजी लगाकर एक स्थान से दूसरे स्थान घूमते फिरे अन्त में उन्हें गोली का शिकार होना पड़ा। इन दृष्टान्तों की पुनरावृत्ति अभी हाल ही में अमरीका में हुई है वहां के काले लोगों को उनके रंग और जाति के दुर्व्यवहारों से मुक्ति दिलाकर समाज में समुचित स्थान दिलाने को डॉ. किंग ने अहिंसक आन्दोलन खड़ा किया था। उन्होंने चाहा कि अमरीका के गोरे लोगों में हृदय परिवर्तन हो और वे नीग्रो अमरीकनों को नौकरी में और सामाजिक प्रतिष्ठा में वहीं स्थान पाने दें जो श्वेत अमरीकनों को मिलता है, लेकिन उसका भी निर्भीक सच्चाई बरतने का मूल्य अपने प्राण देकर चुकाना पड़ा। आज संसार के सामने वही पुराना प्रश्न फिर खड़ा हो गया है। क्या दुनिया में सच कहने वालों का और इंसाफ मांगने वालों को अन्त इसी प्रकार होता रहेगा? क्या आपसी विद्वेष को समाप्त करने की सम्भावना इस दुनिया में सबको पसन्द नहीं होगी? विष का प्याला सुकरात को क्यों पीना पड़ा