जिंदगी के किसी भी परिस्थिति में हताश व मायूस मत होना| harshvardhan jain motivational status inspire
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Statement/ कथन : The importance of a person is not dependent only on one’s status and money. / किसी व्यक्ति का महत्व केवल एक की स्थिति और धन पर निर्भर नहीं है। Conclusion/ निष्कर्ष: I.The goal of most people is just to acquire more money. / अधिकांश लोगों का लक्ष्य सिर्फ अधिक धन प्राप्त करना है। II.There are some factors other than status and money which contribute to the importance of a person. / स्थिति और धन के अलावा कुछ कारक हैं जो किसी व्यक्ति के महत्व में योगदान करते हैं।
एक तीन साल के बच्चे से किसी भी ऐसे विषय पर बातचीत की जा सकती हैं, जो उसके दायरे में आता हो।
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। महात्मा गाँधी- जैसे महान पुरुष की सहधर्मचारिणी के तौर पर पूज्य कस्तूरबा के बारे में राष्ट्र को आदर मालूम होना स्वाभाविक है। राष्ट्र ने महात्मा जी को 'बापू जी' के नाम से राष्ट्रपिता के स्थान पर कायम किया ही है। इसलिए कस्तूरबा-भी 'बा' के एकाक्षरी नाम से राष्ट्रमाता बन सकी हैं। किन्तु सिर्फ महात्मा जी के साथ के सम्बन्ध के कारण ही नहीं, बल्कि अपने आंतरिक सद्गुण और निष्ठा के कारण भी कस्तूरबा राष्ट्रमाता बन पायी हैं। चाहे दक्षिण अफ्रीका में हों या हिन्दुस्तान में, सरकार के खिलाफ लड़ाई के समय जब-जब चारिभ्य का तेज प्रकट करने का मौका आया कस्तूरबा हमेशा इस दिव्य कसौटी से सफलतापूर्वक पार हुई हैं। इससे भी विशेष बात यह है कि बड़ी तेजी से बदलते हुए आज के युग में भी आर्य सती स्त्री का जो आदर्श हिन्दुस्तान ने अपने हृदय में कायम रखा है, उस आवर्श की जीवित प्रतिमा के रूप में राष्ट्र पूज्य कस्तूरबा को पहचानता है। इस तरह की विविध लोकोत्तर योग्यता के कारण आज सारा राष्ट्र कस्तूरबा की पूजा करता है। कस्तूरबा अनपढ़ थीं। हम यह भी कह सकते हैं कि उनका भाषा ज्ञान सामान्य देहाती से अधिक नहीं था। दक्षिण अफ्रीका में जाकर रहीं इसलिए वह कुछ अंग्रेजी समझ सकती थीं और पचीस-तीस शब्द बोल भी लेती थीं। मिस्टर एंडूज-जैसे कोई विदेशी मेहमान घर आने पर उन शब्दों की पूँजी से वह अपना काम चला लेती और कभी-कभी तो उनके उस सम्भाषण से विनोद भी पैदा हो जाता। कस्तूरबा को गीता के ऊपर असाधारण श्रद्धा थी। पढ़नेवाला कोई मिले तो वह भक्तिपूर्वक गीता पड़ने के लिए बैठ जाती। किन्तु उनकी गाड़ी कभी भी बहुत आगे नहीं जा सकी। फिर भी आगांखाँ महल में कारावास के दरमियान उन्होंने बार-बार गीता के पाठ लेने की कोशिश चालू रखी थीं।किस कारण कस्तूरबा राष्ट्रमाता बन पायौं?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। महात्मा गाँधी- जैसे महान पुरुष की सहधर्मचारिणी के तौर पर पूज्य कस्तूरबा के बारे में राष्ट्र को आदर मालूम होना स्वाभाविक है। राष्ट्र ने महात्मा जी को 'बापू जी' के नाम से राष्ट्रपिता के स्थान पर कायम किया ही है। इसलिए कस्तूरबा-भी 'बा' के एकाक्षरी नाम से राष्ट्रमाता बन सकी हैं। किन्तु सिर्फ महात्मा जी के साथ के सम्बन्ध के कारण ही नहीं, बल्कि अपने आंतरिक सद्गुण और निष्ठा के कारण भी कस्तूरबा राष्ट्रमाता बन पायी हैं। चाहे दक्षिण अफ्रीका में हों या हिन्दुस्तान में, सरकार के खिलाफ लड़ाई के समय जब-जब चारिभ्य का तेज प्रकट करने का मौका आया कस्तूरबा हमेशा इस दिव्य कसौटी से सफलतापूर्वक पार हुई हैं। इससे भी विशेष बात यह है कि बड़ी तेजी से बदलते हुए आज के युग में भी आर्य सती स्त्री का जो आदर्श हिन्दुस्तान ने अपने हृदय में कायम रखा है, उस आवर्श की जीवित प्रतिमा के रूप में राष्ट्र पूज्य कस्तूरबा को पहचानता है। इस तरह की विविध लोकोत्तर योग्यता के कारण आज सारा राष्ट्र कस्तूरबा की पूजा करता है। कस्तूरबा अनपढ़ थीं। हम यह भी कह सकते हैं कि उनका भाषा ज्ञान सामान्य देहाती से अधिक नहीं था। दक्षिण अफ्रीका में जाकर रहीं इसलिए वह कुछ अंग्रेजी समझ सकती थीं और पचीस-तीस शब्द बोल भी लेती थीं। मिस्टर एंडूज-जैसे कोई विदेशी मेहमान घर आने पर उन शब्दों की पूँजी से वह अपना काम चला लेती और कभी-कभी तो उनके उस सम्भाषण से विनोद भी पैदा हो जाता। कस्तूरबा को गीता के ऊपर असाधारण श्रद्धा थी। पढ़नेवाला कोई मिले तो वह भक्तिपूर्वक गीता पड़ने के लिए बैठ जाती। किन्तु उनकी गाड़ी कभी भी बहुत आगे नहीं जा सकी। फिर भी आगांखाँ महल में कारावास के दरमियान उन्होंने बार-बार गीता के पाठ लेने की कोशिश चालू रखी थीं। प्रस्तुत गद्यांश में विदेशी का क्या नाम था?
गद्यांश को पढ़कर निम्नलिखित में सबसे उचित विकल्प को चुनिए। महात्मा गाँधी- जैसे महान पुरुष की सहधर्मचारिणी के तौर पर पूज्य कस्तूरबा के बारे में राष्ट्र को आदर मालूम होना स्वाभाविक है। राष्ट्र ने महात्मा जी को 'बापू जी' के नाम से राष्ट्रपिता के स्थान पर कायम किया ही है। इसलिए कस्तूरबा-भी 'बा' के एकाक्षरी नाम से राष्ट्रमाता बन सकी हैं। किन्तु सिर्फ महात्मा जी के साथ के सम्बन्ध के कारण ही नहीं, बल्कि अपने आंतरिक सद्गुण और निष्ठा के कारण भी कस्तूरबा राष्ट्रमाता बन पायी हैं। चाहे दक्षिण अफ्रीका में हों या हिन्दुस्तान में, सरकार के खिलाफ लड़ाई के समय जब-जब चारिभ्य का तेज प्रकट करने का मौका आया कस्तूरबा हमेशा इस दिव्य कसौटी से सफलतापूर्वक पार हुई हैं। इससे भी विशेष बात यह है कि बड़ी तेजी से बदलते हुए आज के युग में भी आर्य सती स्त्री का जो आदर्श हिन्दुस्तान ने अपने हृदय में कायम रखा है, उस आवर्श की जीवित प्रतिमा के रूप में राष्ट्र पूज्य कस्तूरबा को पहचानता है। इस तरह की विविध लोकोत्तर योग्यता के कारण आज सारा राष्ट्र कस्तूरबा की पूजा करता है। कस्तूरबा अनपढ़ थीं। हम यह भी कह सकते हैं कि उनका भाषा ज्ञान सामान्य देहाती से अधिक नहीं था। दक्षिण अफ्रीका में जाकर रहीं इसलिए वह कुछ अंग्रेजी समझ सकती थीं और पचीस-तीस शब्द बोल भी लेती थीं। मिस्टर एंडूज-जैसे कोई विदेशी मेहमान घर आने पर उन शब्दों की पूँजी से वह अपना काम चला लेती और कभी-कभी तो उनके उस सम्भाषण से विनोद भी पैदा हो जाता। कस्तूरबा को गीता के ऊपर असाधारण श्रद्धा थी। पढ़नेवाला कोई मिले तो वह भक्तिपूर्वक गीता पड़ने के लिए बैठ जाती। किन्तु उनकी गाड़ी कभी भी बहुत आगे नहीं जा सकी। फिर भी आगांखाँ महल में कारावास के दरमियान उन्होंने बार-बार गीता के पाठ लेने की कोशिश चालू रखी थीं। कस्तूरबा को किसमें असाधारण श्रद्धा थी?
भारतीय साहित्य भारतीय संस्कृति के आधार पर विकसित हुआ है। इस संस्कृति में भारतीयता के बीज समाहित हैं। जब कभी-भी भारतीय अपनी पहचान का व्याख्यान करने को उत्सुक होता है, उसे अपनी जड़ से जोड़कर देखना चाहता है। यह केवल भारत व भारतीय के लिए ही आवश्यक नहीं है, बल्कि किसी भी देश के प्रान्त से जुड़ा हुआ मसला है। अपने को अन्य से 5 जोड़कर तर्क दिए जाते हैं। उसे अपनी जड़ से जोड़कर ही देखते हैं। वर्तमान में भारतीय संस्कृति व सभ्यता के बीच उपजी हुई विषय वस्तु को ही आधार बनाकर अपनी पहचान को जोड़ते हैं, जिसके कारण दक्षिण भारतीय या उत्तर भारतीय सभी भारतीय संस्कृति को टूटी कड़ियों से जोड़कर अपने आपको अलग स्थापित करते हैं। इसका परिणाम भारतीय स्तर पर विखण्डन के रूप में भी देखने को मिलता है। इस परिणाम के तहत भाषा व संस्कृति के आधार पर विभिन्न प्रान्तों का निर्माण भी सम्भव हो गया। यदि यही विखण्डित समाज भारतीय संस्कृति के मूल से जोड़कर अपने।को देखता होता तो भाषायी एकता भी बनती और क्षेत्रवाद का काला धुआँ, जो भारतीय आकाश पर मण्डरा रहा है, उसकी उत्पत्ति ही सम्भव नहीं हो पाती। इस सन्दर्भ में भारतीयता व उसके समीप उपजे साहित्य को सीमाओं में जाँचना जरूरी है। इसकी प्रकृति की खोज और इसके परिणामों की व्याख्या भारतीय साहित्य व भारतीयता के सन्दर्भ में खोजनी होंगी। भारतीयता के सन्दर्भ में साहित्य और समाज के सम्बन्धों को समझना आवश्यक है। साहित्य का जन्म समाज में ही सम्भव हो सकता है, इसलिए मानवीय संवेदनाओं को हम उनकी अभिव्यक्ति के माध्यम से समझ सकते हैं। यह अभिव्यक्ति समाज और काल में अलग-अलग रूपों में प्रकट हुई है। यदि हम पाषाण काल के खण्डों और उसके वन में ही रहने वालों की स्थिति को देखें, तो उनके विचार शब्दों में नहीं, बल्कि रेखाचित्रों में देखने को मिलते हैं। कई गुफाओं में इन समाजों की अभिव्यक्ति को पत्थर पर खुदे निशानों में देख सकते हैं। ये निशान उनके जन-जीवन में घटने वाली घटनाओं को प्रदर्शित करते नजर आते हैं। उनमें शिकार करते आदिमानव को देख सकते हैं, जो जीवन-यापन के साधन हैं। उन चित्रों में हल चलाने वाले किसानों की अभिव्यक्ति नहीं मिलती। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि वह समाज वनाचरण व्यवस्था में ही सिमटी या उनका जीवन-यापन शिकार पर ही केन्द्रित या सभ्यता के विकास की गाथा उसके जीवन में नहीं गाई जा रही थी, लेकिन समय की पहली धारा में जो प्रभाव देखे जाते हैं, वह सभ्यता के रूप में गिरे पड़े टूटे-फूटे प्राप्त ऐतिहासिक खोज में देख सकते हैं। भारतीयता को समझने के लिए निम्नलिखित में से किसे समझना आवश्यक है?
भारतीय साहित्य भारतीय संस्कृति के आधार पर विकसित हुआ है। इस संस्कृति में भारतीयता के बीज समाहित हैं। जब कभी-भी भारतीय अपनी पहचान का व्याख्यान करने को उत्सुक होता है, उसे अपनी जड़ से जोड़कर देखना चाहता है। यह केवल भारत व भारतीय के लिए ही आवश्यक नहीं है, बल्कि किसी भी देश के प्रान्त से जुड़ा हुआ मसला है। अपने को अन्य से 5 जोड़कर तर्क दिए जाते हैं। उसे अपनी जड़ से जोड़कर ही देखते हैं। वर्तमान में भारतीय संस्कृति व सभ्यता के बीच उपजी हुई विषय वस्तु को ही आधार बनाकर अपनी पहचान को जोड़ते हैं, जिसके कारण दक्षिण भारतीय या उत्तर भारतीय सभी भारतीय संस्कृति को टूटी कड़ियों से जोड़कर अपने आपको अलग स्थापित करते हैं। इसका परिणाम भारतीय स्तर पर विखण्डन के रूप में भी देखने को मिलता है। इस परिणाम के तहत भाषा व संस्कृति के आधार पर विभिन्न प्रान्तों का निर्माण भी सम्भव हो गया। यदि यही विखण्डित समाज भारतीय संस्कृति के मूल से जोड़कर अपने।को देखता होता तो भाषायी एकता भी बनती और क्षेत्रवाद का काला धुआँ, जो भारतीय आकाश पर मण्डरा रहा है, उसकी उत्पत्ति ही सम्भव नहीं हो पाती। इस सन्दर्भ में भारतीयता व उसके समीप उपजे साहित्य को सीमाओं में जाँचना जरूरी है। इसकी प्रकृति की खोज और इसके परिणामों की व्याख्या भारतीय साहित्य व भारतीयता के सन्दर्भ में खोजनी होंगी। भारतीयता के सन्दर्भ में साहित्य और समाज के सम्बन्धों को समझना आवश्यक है। साहित्य का जन्म समाज में ही सम्भव हो सकता है, इसलिए मानवीय संवेदनाओं को हम उनकी अभिव्यक्ति के माध्यम से समझ सकते हैं। यह अभिव्यक्ति समाज और काल में अलग-अलग रूपों में प्रकट हुई है। यदि हम पाषाण काल के खण्डों और उसके वन में ही रहने वालों की स्थिति को देखें, तो उनके विचार शब्दों में नहीं, बल्कि रेखाचित्रों में देखने को मिलते हैं। कई गुफाओं में इन समाजों की अभिव्यक्ति को पत्थर पर खुदे निशानों में देख सकते हैं। ये निशान उनके जन-जीवन में घटने वाली घटनाओं को प्रदर्शित करते नजर आते हैं। उनमें शिकार करते आदिमानव को देख सकते हैं, जो जीवन-यापन के साधन हैं। उन चित्रों में हल चलाने वाले किसानों की अभिव्यक्ति नहीं मिलती। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि वह समाज वनाचरण व्यवस्था में ही सिमटी या उनका जीवन-यापन शिकार पर ही केन्द्रित या सभ्यता के विकास की गाथा उसके जीवन में नहीं गाई जा रही थी, लेकिन समय की पहली धारा में जो प्रभाव देखे जाते हैं, वह सभ्यता के रूप में गिरे पड़े टूटे-फूटे प्राप्त ऐतिहासिक खोज में देख सकते हैं। भारतीय साहित्य किसके आधार पर विकसित हुआ है?
भारतीय साहित्य भारतीय संस्कृति के आधार पर विकसित हुआ है। इस संस्कृति में भारतीयता के बीज समाहित हैं। जब कभी-भी भारतीय अपनी पहचान का व्याख्यान करने को उत्सुक होता है, उसे अपनी जड़ से जोड़कर देखना चाहता है। यह केवल भारत व भारतीय के लिए ही आवश्यक नहीं है, बल्कि किसी भी देश के प्रान्त से जुड़ा हुआ मसला है। अपने को अन्य से 5 जोड़कर तर्क दिए जाते हैं। उसे अपनी जड़ से जोड़कर ही देखते हैं। वर्तमान में भारतीय संस्कृति व सभ्यता के बीच उपजी हुई विषय वस्तु को ही आधार बनाकर अपनी पहचान को जोड़ते हैं, जिसके कारण दक्षिण भारतीय या उत्तर भारतीय सभी भारतीय संस्कृति को टूटी कड़ियों से जोड़कर अपने आपको अलग स्थापित करते हैं। इसका परिणाम भारतीय स्तर पर विखण्डन के रूप में भी देखने को मिलता है। इस परिणाम के तहत भाषा व संस्कृति के आधार पर विभिन्न प्रान्तों का निर्माण भी सम्भव हो गया। यदि यही विखण्डित समाज भारतीय संस्कृति के मूल से जोड़कर अपने।को देखता होता तो भाषायी एकता भी बनती और क्षेत्रवाद का काला धुआँ, जो भारतीय आकाश पर मण्डरा रहा है, उसकी उत्पत्ति ही सम्भव नहीं हो पाती। इस सन्दर्भ में भारतीयता व उसके समीप उपजे साहित्य को सीमाओं में जाँचना जरूरी है। इसकी प्रकृति की खोज और इसके परिणामों की व्याख्या भारतीय साहित्य व भारतीयता के सन्दर्भ में खोजनी होंगी। भारतीयता के सन्दर्भ में साहित्य और समाज के सम्बन्धों को समझना आवश्यक है। साहित्य का जन्म समाज में ही सम्भव हो सकता है, इसलिए मानवीय संवेदनाओं को हम उनकी अभिव्यक्ति के माध्यम से समझ सकते हैं। यह अभिव्यक्ति समाज और काल में अलग-अलग रूपों में प्रकट हुई है। यदि हम पाषाण काल के खण्डों और उसके वन में ही रहने वालों की स्थिति को देखें, तो उनके विचार शब्दों में नहीं, बल्कि रेखाचित्रों में देखने को मिलते हैं। कई गुफाओं में इन समाजों की अभिव्यक्ति को पत्थर पर खुदे निशानों में देख सकते हैं। ये निशान उनके जन-जीवन में घटने वाली घटनाओं को प्रदर्शित करते नजर आते हैं। उनमें शिकार करते आदिमानव को देख सकते हैं, जो जीवन-यापन के साधन हैं। उन चित्रों में हल चलाने वाले किसानों की अभिव्यक्ति नहीं मिलती। इससे इस बात की पुष्टि होती है कि वह समाज वनाचरण व्यवस्था में ही सिमटी या उनका जीवन-यापन शिकार पर ही केन्द्रित या सभ्यता के विकास की गाथा उसके जीवन में नहीं गाई जा रही थी, लेकिन समय की पहली धारा में जो प्रभाव देखे जाते हैं, वह सभ्यता के रूप में गिरे पड़े टूटे-फूटे प्राप्त ऐतिहासिक खोज में देख सकते हैं। भारतीय अपनी पहचान के व्याख्यान के लिए क्या करता है?