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Battle Of Plassey 1757(प्लासी की लड़ाई 1...

Battle Of Plassey 1757(प्लासी की लड़ाई 1757)|Battle Of Buxar 1764(बक्सर की लड़ाई 1764)|Summary

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The Battle Of Plassey|OMR|Summary

The Famous battle of Plassey in 1757 was fought in which region of India?

Who betrayed Siraj-ud-Daula in the Battle of Plassey in 1757 ?

The breadth of a rectangle is four times of its length. If the area of the rectangle is 1764, then what is the breadth of the rectangle? एक आयत की चौड़ाई इसकी लंबाई का चार गुना है। यदि आयत का क्षेत्रफल 1764 है, तो आयत की चौड़ाई क्या है?

After the battle of ………in 1757, the British achieved plitical power in India.

REVISION|आज़ादी के कारण |आपतिजनक कर |नवीन टैक्स स्टैंप ऐक्ट 1765 / Townshand ऐक्ट / चीनी क़ानून 1764 /क्वाटरीरी ऐक्ट |लेखकों एवं प्रचारकों की भूमिका |जार्ज तृतीया की निरंकुश नीतिया |क्रांति का समापन |परिणाम

Before a battle there were the ratio of captains to soldiers was 2: 7. During the war 25 captains and 100 soldiers were martyred. The new ratio of captions to soldiers became 3 : 10. What is the number of soldiers after the war? युद्ध से पहले कैप्टन और सिपाहियों का अनुपात 2:7 था। युद्ध के दौरान और 25 कैप्टन और 100 सिपाही शहीद हुए। कैप्टन और सिपाहियों का नया अनुपात 3 : 10 हो गय।॥ युद्ध के बाद सिपाहियों की संख्या क्या होगी?

After the battle of ……………in 1757, the British achieved political power in india.

स्वामी विवेकानन्द जी एक ऐसे सन्त थे जिनका रोम-रोम राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत था। उनके सारे चिन्तन का केन्द्र बिन्दु राष्ट्र था। अपने राष्ट्र की प्रगति एवं उत्थान के लिए जितना चिन्तन एवं कर्म इस तेजस्वी संन्यासी ने किया उतना पूर्ण समर्पित राजनीतिज्ञों ने भी सम्भवतः नहीं किया। अन्तर यह है कि इन्होंने सीधे राजनीतिक धारा में भाग नहीं लिया किन्तु इनके कर्म एवं चिन्तन की प्रेरणा से हजारों ऐसे कार्यकर्ता तैयार हुए जिन्होंने राष्ट्र-रथ को आगे बढ़ाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इन्होंने निजी मुक्ति को जीवन का लक्ष्य नहीं बनाया था बल्कि करोड़ों देशवासियों के उत्थान को ही अपना जीवन-लक्ष्य बनाया। राष्ट्र के दीन-हीन जनों की सेवा को ही वे ईश्वर की सच्ची पूजा मानते थे। सत्य की अनवरत खोज उन्हें दक्षिणेश्वर के सन्त श्री रामकृष्ण परमहंस तक ले गई और परमहंस ही वह सच्चे गुरु सिद्ध हुए जिनका सान्निध्य पाकर इनकी ज्ञान-पिपासा शान्त हुई। 39 वर्ष के संक्षिप्त जीवनकाल में स्वामी जी जो कार्य कर गए, वे आने वाली अनेक शताब्दियों तक पीढ़ियों का मार्गदर्शन करते रहेंगे। 30 वर्ष की आयु में इन्होंने शिकागो, अमेरिका के विश्व धर्म-सम्मेलन में हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व किया और इसे सार्वभौमिक पहचान दिलवाई। तीन वर्ष तक वे अमेरिका में रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्त्व-ज्ञानकी अद्भुत ज्योति प्रदान की। “अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा" यह स्वामी जी का दृढ़ विश्वास था। वे केवल सन्त ही नहीं, एक महान् देशभक्त, वक्ता, विचारक, लेखक और मानव-प्रेमी भी थे। अमेरिका से लौटकर उन्होंने आजादी की लड़ाई में योगदान देने के लिए देशवासियों का आह्वान किया और जनता ने स्वामी जी की पुकार का उत्तर दिया। गाँधी जी को आजादी की लड़ाई में जो जन-समर्थन मिला था, वह स्वामी जी के आह्वान का ही फल था। 19वीं सदी के आखिरी दौर में वे लगभग सशक्त क्रान्ति के जरिए भी देश को आजाद कराना चाहते थे परन्तु उन्हें जल्द ही यह विश्वास हो गया था कि परिस्थितियाँ उन इरादों के लिए अभी परिपक्व नहीं हैं। इसके बाद ही उन्होंने. एक परिव्राजक के रूप में भारत और दुनिया को खंगाल डाला। स्वामी जी इस बात से आश्वस्त थे कि धरती की गोद में यदि कोई ऐसा देश है जिसने मनुष्य की हर तरह की बेहतरी के लिए ईमानदार कोशिशें की हैं, तो वह भारत ही है। उनकी दृष्टि में हिन्दू धर्म के सर्वश्रेष्ठ चिन्तकों के विचारों का निचोड़ पूरी दुनिया के लिए अब भी आश्चर्य का विषय है। स्वामी जी ने संकेत दिया था कि विदेशों में भौतिक समृद्धि तो है और उसकी भारत को जरूरत भी है लेकिन हमें याचक नहीं बनना चाहिए। हमारे पास उससे ज्यादा बहुत कुछ है जो हम पश्चिम को दे सकते हैं और पश्चिम को उसकी बेसाख्ता जरूरत है। स्वामी विवेकानन्द जी का शिकागो विश्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने कोउद्देश्य था

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